भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषासंहिता ॥ १९

मृतान्तानग्निहोत्रेण दाहयेद्विधिपूर्वकम् । दाहयेदविलम्बेन भार्याञ्चात्रव्रजेत्तसा ॥ ५५ ॥ इति श्रीवेदव्यासीये धर्म्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ नित्यंनैमित्तिकंकाम्यमितिकर्म्मत्रिधामतम् । त्रिविधंतच्चवक्ष्यामि गृहस्थस्यावधार्यताम् ॥ १ ॥ यामिन्याःपश्चिमेयामे त्यक्तनिद्रोहरिंस्मरेत् । आलोक्यमङ्गलद्रव्यं कर्म्मावश्यकमाचरेत् ॥ २ ॥ कृतशौचोनिषेव्याग्नीन्दन्तान्प्रक्षाल्यवारिणा । स्नात्वापास्यद्विजःसन्ध्यां देवादींश्चैवतर्पयेत् ॥३॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणि इतिहासानिचाभ्यसेत् । अध्यापयेन्नसच्छिष्यान् सद्दिप्रांश्चद्विजोत्तमः ॥ ४ ॥ अलब्धंप्रापयेल्लब्ध्वा क्षणमात्रंसमापयेत् ।


अग्नि में विधिपूर्वक दाह करे और ऐसे लोगों की पत्नी पहिले मरे तो उसका भी उसी अग्निहोत्र के अग्नि से दाह करे तो वह भी स्वर्ग में जाती है ॥५५॥

श्रीवेदव्यासीय धर्मशास्त्र के द्वितीय अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ ॥

गृहस्थ पुरुष का नित्य नैमित्तिक काम्य यह तीन प्रकार का कर्म शास्त्र में कहा है वह तीनों प्रकार का कर्म हम कहते हैं तुम लोग सुनो ॥१॥ ब्राह्मणादि द्विज पुरुष रात्रि के पिछले चौथे पहर में उठकर विष्णु का स्मरण करे [ हरि का ग्रहण उपलक्षणार्थ है तिस से शम्भु आदि अन्य देवों का भी स्मरण जानो ] फिर मङ्गल द्रव्य (गौ आदि) को देखकर शौचादि आवश्यक काम को करे ॥२॥ मल मूत्र त्यागादि शौच, अग्नि की सेवा, जल से दांतों का धोना, और स्नान करने पश्चात् संध्या करके देव ऋषि और पितरों का तर्पण करें ॥ ३ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण वेद, वेदाङ्ग, छः शास्त्र और इतिहासों का अभ्यास किया करे । अच्छे शिष्य और उत्तम ब्राह्मणों को वेदादि पढ़ाया करे ॥ ४ ॥

अप्राप्त ( जो अपने यहां न हो ) वस्तु की प्राप्ति का उपाय करै और उस वस्तु को पाकर कुछ थोड़े काल ठहर जावे फिर अन्य अप्राप्त की प्राप्ति का उपाय करे । विद्यादि गुणों में समर्थ होकर किसी धनादि से समर्थ राजा रईसादि के यहां अपने गुण को अप्रकट करके न बसे । किन्तु