भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 444

भाषार्थसहिता ॥ १९

तस्मादहरहर्वेदं द्विजोऽधीयीतवाग्यतः ॥ ११ ॥
धर्मशास्त्रेतिहासादि सर्वेषांशक्तितःपठेत् ।
प्रथमंकृतस्वाध्यायस्तर्पयेच्चाथदेवताः ॥ १२ ॥
जान्वाच्यदक्षिणंदर्भैः प्रागग्रैःसयवैस्तिलैः ।
एकैकाञ्जलिदानेन प्रकृतिस्थोपवीतकः ॥ १३ ॥
समजानुद्वयोब्रह्म सूत्रहारउदङ्मुखः ।
तिर्यग्दर्भैश्चवामाग्रैर्यवैस्तिलविमिश्रितैः ॥ १४ ॥
अम्भोभिरुत्तरक्षिप्तैः कनिष्ठामूलनिर्गतैः ।
द्वाभ्यांद्वाभ्यामञ्जलिभ्यां मनुष्यांस्तर्पयेत्ततः ॥ १५ ॥
दक्षिणाभिमुखःसव्यं जान्वाच्यद्विगुणैःकुशैः ।
तिलैर्जलैश्चदेशिन्या मूलदर्भाद्विनिःसृतैः ॥ १६ ॥
दक्षिणांसोपवीतस्यान् क्रमेणाञ्जलिभिस्त्रिभिः ।
सन्तर्पयेत्तुदिव्यान्पितॄंस्तत्परांश्चपितॄन्स्वकान् ॥ १७ ॥


न बोलता हुआ वेद को पढ़े ॥ ११ ॥ और धर्मशास्त्र इतिहासादि का भी थोड़ा २ भाग अपनी शक्ति के अनुसार पढ़े इस प्रकार प्रथम स्वाध्याय करके देवताओं का आगे लिखे प्रकार से तर्पण करे ॥ १२ ॥ दहिने घोटू [ जानु ] को भूमि पर नवाय कर पूर्व को है अग्रभाग जिन का ऐसे कुश जौ, और तिल लेकर सव्य यज्ञोपवीत धारण किये पूर्वाभिमुख बैठा एक २ अंजलि देता हुआ तर्पण करे ॥ १३ ॥ दोनों जानु बराबर रख जनेऊ कंठ में कर उत्तर को मुख कर,-बांयी ओर अग्रभाग जिन का ऐसे तिरछे कुश और तिल मिले हुये जौ से ॥ १४ ॥ कनिष्ठा अंगुली के मूल से उत्तर में जो गिरें ऐसे जलों से दो २ अंजलियों से सनकादि मनुष्यों [ऋषियों] का तर्पण करे ॥१५॥ दक्षिण को मुख करके बायां जानु (घोंटू) भूमि पर टेक कर द्विगुण कुश तिल, और प्रदेशिनी (तर्जनी) के मूल पर रक्खे कुशों से गिरते हुए जलों से ॥ १६ ॥ दहिने कन्धे पर जनेऊ रक्खे हुये क्रम से तीन २ अंजली देता हुआ दिव्य पितरों का तर्पण करके अपने पिता, पितामह, प्रपितामह पितरों का तर्पण क्रम से करे ॥ १७ ॥