भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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२० व्यासस्मृतिः ॥

मातृमातामहांस्तद्वत् त्रीनेवंस्त्रिभिस्त्रिभिः । मातामहस्ययेऽप्यन्ये गोत्रिणोदाहवर्जिताः ॥ १८ ॥ तानेकाञ्जलिदानेन तर्पयेच्चपृथक्पृथक् । असंस्कृतप्रमीताये प्रेतसंस्कारवर्जिताः ॥ १९ ॥ वस्त्रनिष्पीडिताम्भोभिस्तेषामाप्यायनंभवेत् । अतर्पितेषुपितृषु वस्त्रंनिष्पीडयेत्तुयः ॥ २० ॥ निराशाःपितरस्तस्य भवन्तिसुरमानुषैः । पयोदर्भस्वधाकार गोत्रनामतिलैर्भवेत् ॥ २१ ॥ सुदत्तंतत्पुनस्तेषामेकेनापिविनावृथा । अन्यचित्तेनयद्दत्तं यद्दत्तंविधिवर्जितम् ॥ २२ ॥ अनासनस्थितेनापि तज्जलंरुधिरायते । एवंसन्तर्पिताःकामैस्तर्पकांस्तर्पयन्तिच ॥ २३ ॥ ब्रह्मविष्णुशिवादित्यमित्रावरुणनामभिः ।


पितादि के तुल्य माता, पितामही, और प्रपितामही इन तीनों का तर्पण करके मातामह (नाना) प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह इन तीनों का भी इसी प्रकार तीन २ अञ्जुलियों से तर्पण करे—और नाना के गोत्र के अन्य जो लोग मर गये हों जिन का दाह कर्म नहीं हुआ हो ॥ १८ ॥ उन का भी एक २ अञ्जलि देकर पृथक् २ तर्पण करे और जो उपनयनादि संस्कार हुए विना ही मरे हैं तथा जिन का दशगात्रादि प्रेत संस्कार भी नहीं हुआ ॥१९॥ उन को वस्त्र (अंगोछा) निचोड़ने के जल से तृप्ति होजाती है। जो पुरुष पितरों के तर्पण से पहिले वस्त्र को निचोड़ता है ॥२०॥ उस के पितर; देवता और मनुष्यों सहित निराश हो जाते हैं। जल, कुश, स्वधा, गोत्र नाम और तिल इन सब के सहित जो तर्पण किया जाता है ॥ २१ ॥ वह जलदान उत्तम है। उन जलादि में से एक भी कोई वस्तु न हो तो किया हुआ तर्पण वृथा हो जाता है। अन्य विचार मन में रख कर वा विधिपूर्वक जो तर्पण नहीं किया ॥ २२ ॥ अथवा आसन पर बैठे विना जो जल दिया वह सब रुधिर के समान है। इस प्रकार तृप्त किये पितर तर्पण करने वालों की कामनाओं की पूर्ति से तृप्त करते हैं ॥२३॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आदित्य, मित्रावरुण, इन देवताओं