अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२
भाषार्थसहिता ॥
शूद्रवृत्त्यातुजीवन्ति नक्षात्रंधर्ममाचरेत् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण्यांवैश्यसंसर्गाज्जातोमागधउच्यते ।
वंदित्वंब्राह्मणानां च क्षत्रियाणांविशेषतः ॥ ७ ॥
प्रशंसावृत्तिकोजीवेद्वैश्यप्रेष्यकरस्तथा ।
ब्राह्मण्यांशूद्रसंसर्गाज्जातश्चांडालउच्यते ॥ ८ ॥
सीसमाभरणंतस्य कार्ष्णायसमथापिवा ।
वध्रींकण्ठेसमाबध्य महल्लरींकक्षतोपिवा ॥ ९ ॥
मलापकर्षणंग्रामे पूर्वाह्नेपरिशुद्धिकम् ।
नपराह्ने प्रविशेपि बहिर्ग्रामाच्चनैऋते ॥ १० ॥
पिण्डीभूताभवंत्यत्र नोचेद्वध्याविशेषतः ।
चांडालाद्वैश्यकन्यायां जातःश्वपचउच्यते ॥ ११ ॥
श्वमांसभक्षणंतेषां श्वानएवचतद्बलम् ।
नृपायांवैश्यसंसर्गादायोगवइतिस्मृतः ॥ १२ ॥
तंतुवायाभवंत्येव वसुकांस्योपजीविनः ।
शोलिकाःकेचिदत्रैव जीवनंवस्त्रनिर्मितै ॥ १३ ॥
६॥क होकर शूद्र की वृत्ति से जीते हैं वेभी क्षत्रिय धर्म का आचरण न करें ॥ ६ ॥ ब्राह्मणी में जो वैश्य के संसर्ग ( मेल ) से उत्पन्न हो उसे मागध (भाट) कहते हैं ये ब्राह्मणों का तथा विशेष कर क्षत्रियों का बंदी ( स्तुति करने वाला) होता है ॥७॥ प्रशंसा वृत्ति (अन्यों की स्तुति प्रशंसा कर धन प्राप्त करना) उसकी जीविका है अथवा वैश्य की सेवा करे ब्राह्मणी में जो शूद्र के संसर्ग (मेल) से उत्पन्न हो उसे चांडाल कहते हैं ॥८॥ इस के सीसे अथवा लोहे के आभरण (गहने) होते हैं और कंठ में वधी (चमड़े का पट्टा) और कोख में झालरी बांध कर ॥९॥ दोपहर से पूर्व गांव में शुद्धता के अर्थ मल को उठावे और मध्यान्ह के पश्चात ग्राम में न घुसे किन्तु गांव से बाहर नैऋंत दिशा में रहा करे ॥१०॥ और वे सब एक ही जगह रहें और जो एकत्र न रहें तो अवश्य वध के योग्य हैं चांडाल से जो वैश्य की कन्या में पुत्र उत्पन्न हो उसे श्वपच कहते हैं ॥११॥ कुत्ते का मांस ही उनका भोजन है और कुत्ता ही उन का बल है क्षत्रिय की कन्या में जो वैश्य से पुत्र उत्पन्न हो वह आयोगव (कोरी) कहाता है ॥१२॥