अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ | भाषार्थसहिता ॥
वैश्यायांरंजकाज्जातो नर्त्तकोगायकोभवेत् ॥ १९ ॥
वैश्यायांशूद्रसंसर्गाज्जातोवैदेहकःस्मृतः ।
अजानांपालनंकुर्यान्महिषीणांगवामपि ॥ २० ॥
दधिक्षीराज्यतक्राणां विक्रयाज्जीवनंभवेत् ।
वैदेहिकात्तुविप्रायां जातश्चर्मोपजीविनः ॥ २१ ॥
नृपायामिवतस्यैव सूचिकःपाचिकःस्मतः
वैश्यायांशूद्रतश्चौर्याज्जातश्चक्रीचउच्यते ॥ २२ ॥
तैलपिष्टकजीवीतु लवणंभावयन्पुनः ।
विधिनाब्राह्मणःप्राप्य नृपायांतुसमन्त्रकम् ॥ २३ ॥
जातःसुवर्णइत्युक्तः सानुलोमद्विजस्मृतः ।
अथवर्णक्रियांकुर्वन्नित्यनैमित्तिकींक्रियाम् ॥ २४ ॥
अश्वरथंहस्तिनंच वाहयेद्वानृपाज्ञया ।
सैनापत्यंचभैषज्यं कुर्याज्जीवेत्तुवृत्तिषु । २५ ॥
नृपायांविप्रतश्चौर्यात्संजातोयोभिषक्स्मृतः ।
कथक ) कहते हैं ॥१९॥ वैश्य की कन्या में शूद्र के संसर्ग से जो पैदा हो उसे वैदेहिक (गड़रिया) कहते हैं वह बकरी-भैंस-गौ इन को पाले ॥२०॥ और दही दूध-घी-मठा इनका बेचना उस की जीविका है-वैदेहिक से ब्राह्मणी में जो पुत्र उत्पन्न हों वे चर्मोपजीवी होते हैं अर्थात् चाम बेच कर जीते हैं ॥२१॥ वैदेहिक से क्षत्रिय की कन्यामें जो पैदा हो उसे सूचिक (दरजी) अथवा पाचक (रसोइया) कहते हैं शूद्रसे जो वैश्य की कन्यामें चोरी से पैदा हो उसे चक्री (तेली) कहते हैं ॥२२॥ यह तिल वा खल अथवा लवण से जीता है-विधि से ब्राह्मण ने विवाही जो क्षत्रिय की कन्या उस से जो उत्पन्न होता है ॥२३॥ वह अनुलोम सुवर्ण द्विज कहाता है वह नित्य (संध्यादि ) नैमित्तिक (जात कर्मादि) क्रिया को करता हुआ ॥ २४ ॥ राजा की आज्ञा से घोड़ा-रथ हाथी इन को चलाता है और सेनापति बनकर अथवा औषधों से अपना निर्वाह करे ॥२५॥ क्षत्रिय की कन्या में चोरी से जो ब्राह्मण से पुत्र उत्पन्न होता है उसे भिषक्