अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ १९
दर्भासीनोदर्भपाणि-र्ब्रह्मयज्ञविधानतः ॥ ५२॥ प्राङ्मुखोब्रह्मयज्ञं तु कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः ॥ ततोर्घ्यंभानवेद्यात्तिलपुष्पाक्षतान्वितम् ॥ ५३ ॥ उत्थायमूर्द्धपर्य्यतं हंसःशुचिषदित्यृचा । ततोदेवंनमस्कृत्य गृहंगच्छेत्ततःपुनः ॥ ५४ ॥ विधिनापुरुषसूक्तस्य गत्वाविष्णुंसमर्चयेत् । वैश्वदेवंततःकुर्याद्वलिकर्मविधानतः ॥ ५५ ॥ गोदोहमात्रसाकांक्षेदातिथिंप्रतिवैगृही । अदृष्टपूर्वमज्ञातमतिथिंप्राप्तमर्चयेत् ॥ ५६ ॥ स्वागतासनदानेन प्रत्युत्थानेनचांबुना । स्वागतेनाग्नयस्तुष्टा भवन्तिगृहमेधिनः ॥ ५७ ॥ आसनेनतुदत्तेन प्रीतोभवतिदेवराट् । पादशौचेनपितरः प्रीतिमायान्तिदुर्लभाम् ॥ ५८ ॥ अन्नदानेनयुक्तेन तृप्यतेहिप्रजापतिः ।
कुशाओं पर बैठ कर और कुशाओं को हाथ में लेकर ॥५२॥ और पूर्वाभिमुख हो के श्रद्धा से ब्रह्म यज्ञ करे फिर तिल पुष्प तथा अक्षतों से युक्त अर्घ्य सूर्यनारायण को देवे॥५३॥अंजुली में भरे अर्घ्य जल को मस्तक पर्यन्त उठाकर (हंसःशुचिषत्०-) इत्यादि ऋचा से सूर्य के सम्मुख छोड़े तदन्तर सूर्यदेव को नमस्कार करके घरको जावे ॥५४॥ घर जाकर विधि से पुरुष सूक्त (सहस्रशीर्षा०) से विष्णु का पूजन करे पश्चात् गृह्यसूक्तोक्त विधान से देवयज्ञादि चारो महायज्ञ करे ॥५५॥ जितने समय में गौ दुही जाय उतने समय तक गृहस्थी अतिथि की प्रतीक्षा करे । जिस को प्रथम नहीं देखा हो ऐसे अज्ञात (बेजाने) आये अतिथि को पूजे ॥ ५६ ॥ स्वागत करना-आसन देना-देख कर उठना-जल देना-इस प्रकार अतिथि का आदर करने से गृहस्थी के आवसथ्य गार्हपत्यादि अग्नि प्रसन्न होते हैं ॥ ५७ ॥ आसन देने से इन्द्रदेव प्रसन्न होते चरणों के धोने से दुर्लभ प्रीति को पितर प्राप्त होते ॥ ५८ ॥ और श्रेष्ठ अन्न के देने से ब्रह्मा प्र-