अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ भाषार्थसहिता ॥
जपेनदेवतानित्यं स्तूयमानाप्रसीदति ॥४५॥
प्रसन्ने विपुलान्गोत्रान्प्राप्नुवन्तिमनोषिणः ।
राक्षसाःश्वपिशाचाश्च महासर्पाश्चभीषणाः ॥४६॥
जपितान्नोपसर्पन्ति दूरादेवप्रयांतित ।
छंदऋष्यादिविज्ञाय जपेन्मन्त्रमतंद्रितः ॥४७॥
जपेदहरहर्ज्ञात्वा गायत्रींमनसाद्वीजः ।
सहस्रपरमांदेवीं शतमध्यांदशावराम् ॥४८॥
गायत्रींयोजपेन्नित्यं सनपापेनलिप्यते ॥
अथपुष्पांजलिंकृत्वा भानवेचोर्ध्वबाहुकः ॥४९॥
उदुत्यंचजपेत्सूक्तं तच्चक्षुरितिचापरम्
प्रदक्षिणमुपावृत्य नमस्कुर्याद्दिवाकरम् ॥५०॥
ततस्तीर्थेनदेवाद्दीनद्भिः संतर्पयेद् द्विजः॥
स्नानवस्त्रं तुनिष्पीड्य पुनराचमनंचरेत् ॥५१॥
तद्वद्भक्तजनस्येह स्नानंदानंप्रकीर्तितम् ॥
हुआ देवता प्रसन्न होता है ॥ ४५ ॥ देवता के प्रसन्न होने पर बुद्धिमान् मनुष्य बहुत से वंश की वृद्धि को प्राप्त होते हैं । राक्षस, पिशाच, और भयानक बड़े २ सर्प ॥ ४६ ॥ जप करने से समीप नहीं आते किन्तु वे दूर से ही भाग जाते हैं । मन्त्रों के छंद और ऋषि आदि को जान कर आलस्य को त्याग के मंत्र को जपे ॥४७॥ ब्राह्मण छंद आदि को जानकर प्रति दिन मन से गायत्री को जपे १००० हजार गायत्रीका जप श्रेष्ठ है १०० का जपमध्यम और दश का जप अधम है ॥४८॥ जो नित्य गायत्री को जपता है वह पापसे लिप्त नहीं होता । फिर ऊपर को भुजा उठाकर अर्थात पुष्पों सहित अर्घ्य देके सूर्य की ओर हाथ जोड़ के ॥४९॥ (उदुत्यं०) और (तच्चक्षुः०) इन सूक्तों को जपे फिर प्रदक्षिणा करके सूर्य को नमस्कार करे ॥ ५० ॥ फिर ब्राह्मण तीर्थ के जल से देव आदि का तर्पण करे । पीछे स्नान के वस्त्र (धोती) को निचोड़ कर आचमन करे ॥ ५१ ॥ इसी प्रकार यहां भक्त जन का स्नान और दान कहा।