अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ १७
अनेनविधिनाचम्य ब्राह्मणःशुद्धमानसः । कुर्वीतदर्भपाणिस्तूदङ्मुखःप्राङ्मुखोऽपिवा ॥३६॥ प्राणायामत्रयंधीमान्यथान्यायमतंद्रितः । जपयज्ञंततःकुर्याद् गायत्रींवेदमातरम् ॥ ४० ॥ त्रिविधोजपयज्ञःस्यात्तस्यतत्वंनिबोधत । वाचिकश्चउपांशुश्च मानसश्चत्रिधाकृतिः ॥ ४१ ॥ त्रयाणामपियज्ञानां श्रेष्ठःस्यादुत्तरोत्तरः । यदुच्चनीचोच्चरितैः शब्दैःस्पष्टपदाक्षरैः ॥४२॥ मंत्रमुच्चारयन्वाचा जपयज्ञस्तु वाचिकः । शनैरुच्चारयन्मंत्रं किंचिदोष्ठौप्रचालयेत् ॥४३॥ किंचिच्छ्रवणयोग्यःस्यात् सउपांशुर्जपःस्मृतः । धियांपदाक्षरश्रेण्या अवर्णमपदाक्षरम् ॥४४॥ शब्दार्थचिन्तनाभ्यांतु तदुक्तं मानसंस्मृतम् ।
शुद्ध मन वाला ब्राह्मण इस विधि से आचमन करके कुशा हाथ में लेकर उत्तर वा पूर्व को मुख करके ॥३९॥ आलस्य को छोड़ के विधि पूर्वक तीन प्राणायाम करे फिर वेद माता गायत्री का जपयज्ञ करे ॥४०॥ तीन प्रकार का जपयज्ञ होता है उस के स्वरूप को तुम सुनो ! वाणी से साफ २ बोले उपांशु-धीमी वाणी से बोले और मन से ये तीन उस के भेद हैं ॥४१॥ इन तीनों यज्ञों में पिछला २ श्रेष्ठ है। जो उदात्त अनुदात्त स्वरित स्वरों सहित स्पष्ट पद और अक्षरों सहित ॥४२॥ वाणी से मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए जप किया जाता है वह वाचिक जप यज्ञ कहाता है और कुछ २ होठों को चला कर अति समीप के मनुष्य को सुनने योग्य धीरे २ मंत्र का उच्चारण कर के ॥४३॥ जो जप किया जाय उसे उपांशु जप कहते हैं—और जिस में वर्ण (पदों के अक्षर) प्रतीत न हों केवल बुद्धि से ही पदों के अक्षरों के सिलसिले से ॥४४॥ शब्द अर्थ का विचार जिस में हो उस जप यज्ञ को मानस कहते हैं। जप यज्ञ से स्तुति किया
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