भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१६ | भाषार्थसहिता ॥

स्योनापृथिवीतिमृद्गात्रे इदंविष्णुरितिद्विजाः ॥ ३१ ॥
ततोनारायणंदेवं संस्मरेत्प्रतिमज्जनम् ।
निमज्ज्यांतर्जलेसम्यक् क्रियतेचाघमर्षणम् ॥ ३२ ॥
स्नात्वाक्षततिलैस्तद्वद्देवर्षिपितृभिःसह ।
तर्पयित्वाजलंतरमान्निष्पीड्यचसमाहितः ॥ ३३ ॥
जलतीरंसमासाद्य तत्रशुक्लेनवाससी ।
परिधायोत्तरीयं च कुर्यात्केशान्नधूनयेत् ॥ ३४ ॥
नरक्तमुल्वणंवासो ननीलंचप्रशस्यते ।
मलाक्तंगंधहीनंच वर्जयेदंबरंबुधः ॥ ३५ ॥
ततःप्रक्षालयेत्पादौ मृत्तोयेनविचक्षणः ।
दक्षिणंतुकुरंकृत्वा गोकर्णाकृतिवत्पुनः ॥ ३६ ॥
त्रिःपिबेदीक्षितंतोयमास्यं द्विःपरिमार्जयेत् ।
पादौशिरस्ततोऽभ्युक्ष्य त्रिभिरास्यमुपस्पृशेत् ॥३७॥
अंगुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुषीसमुपस्पृशेत् ।
तथैवपंचभिर्मूर्ध्नि स्पृशेदेवंसमाहितः ॥ ३८ ॥


पृथिवी० ) इस मंत्र से अथवा (इदंविष्णु ०) इस मंत्र से देह में गट्टी लगावे ॥३१॥ हर एक गोता लगाने में नारायण देव कास्मरण करे और जल के भीतरगो-ता लगाये हुए अघमर्षण मंत्र ( ऋतंचसत्यंचा० ) को जपै ॥ ३२ ॥ स्नान करके और वस्त्र को निचोड़ कर ॥३३॥ जल के किनारे पर आके सफेद वस्त्र (धोती) को पहन कर अंगोछा कन्धे पर डाल के केशों को न कंपावे ॥ ३४ ॥ अधिक लाल, नील वस्त्र श्रेष्ठ नहीं कहा है तथा मैले और गंधहीन वस्त्र को वर्जेद ३५ फिर विचारशील पुरुष मट्टी और जल से पग धोके दहिने हाथ को गौके कान के समान करके ॥३६॥ देखे हुए जल से तीन बार आचमन करे फिर दोबार मुख का मार्जन करे फिर पग और शिर पर जल का मार्जन कर बीच की तीन अंगुलियों से मुख का स्पर्श करे ॥ ३७ ॥ अंगूठा और अनामिका से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे इसी प्रकार सावधान होकर पांचों अंगुलियों से मस्तक का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥