अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
हारीतस्मृतिः ॥
२७
मलाक्ताःसर्वउच्यंते यतयः कांस्यभोजिनः ॥ १६ ॥
कांस्यभांडेषुयत्पाको गृहस्थस्यतथैवच ।
कांस्येभोजयतःसर्व्वं किल्विषंप्राप्नुयात्तयोः ॥ १७ ॥
भुक्त्वापात्रंयतिर्नित्यं क्षालयेन्मंत्रपूर्वकम् ।
नदुष्यतेचतत्पात्रं यज्ञेषुचमसाइव ॥ १८ ॥
अथाचम्यनिदिध्यास्य उपतिष्ठेतभास्करम् ।
जपध्यानेतिहासैश्च दिनशेषंनयेद्बुधः ॥ १९ ॥
कृतसंध्यस्ततोरात्रीं नयेद्देवगृहादिषु ।
हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायेदात्मानमव्ययम् ॥ २० ॥
यदिधमंरतिःशांतः सर्वभूतसमोवशी ।
प्राप्नोतिपरमंस्थानं यत्प्राप्यननिवर्तते ॥ २१ ॥
त्रिदंडभूत्वाहिपृथक्समाचरेच्छनैःशनैर्यस्तु बहिर्मुखाक्षः।
में कभी भी भोजन न करे-और कांसे के पात्र में भोजन करने वाले संन्यासी मलिन कहे हैं ॥१६॥ कांसे के पात्रमें पकाने वाले और जिमाने वाले गृहस्थी को जो पाप है उन दोनों के पाप को कांसे के पात्रमें भोजन करने वाला संन्यासी प्राप्त होता है ॥१७॥ संन्यासी जिस पात्र में भोजन करे उस को मंत्रों से धोडा ले। यज्ञों में सोम पीने के चमसों के तुल्य संन्यासी का वह पात्र दूषित (अशुद्ध) नहीं होता ॥ १८ ॥ इस के अनन्तर आचमन और ध्यान कर के सूर्य्य देव की स्तुति करे और शेष दिन को जप ध्यान तथा उत्तम इतिहासों के कहने सुनने में बितावे॥ १९॥ फिर संध्या करके इसी प्रकार घर आदि में रात्रि को बितावे-अपने कमल रूपी हृदय में अविनाशी आत्मा का ध्यान करे ॥ २० ॥ जो संन्यासी धर्म में तत्पर, शांत, सब भूतों में सम, वशी ( इन्द्रिय जिस के वश में हों ऐसा ) हो तो वह उस उत्तम स्थान को प्राप्त होता है जहां जा- कर फिर नहीं लौटते ॥ २१ ॥ जो त्रिदण्डी हो सब से पृथक विचरे और धीरे २ जिस के इन्द्रिय संसार के विषयों से विरक्त हुए हों वह संसार के सब
२८
भाषार्थसहिता ॥
संमुच्य संसारसमस्तबंधनात्सयातिविष्णोरमृतात्मनः पदं
इति हारीतेधर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच कथितंधर्मलक्षणम् ।
येनस्वर्गापवर्गौच प्राप्नुवंतिद्विजातयः ॥ १ ॥
योगशास्त्रंप्रवक्षामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्
यस्यचश्रवणाद्यान्ति मोक्षंचैवमुमुक्षवः ॥ २ ॥
योगाभ्यासबलेनैव नश्येयुःपातकानितु ।
तस्माद्योगपरोभूत्वा ध्यायेन्नित्यक्रियापरः ॥ ३ ॥
प्राणायामेनवचनंप्रत्याहारेणचेन्द्रियम् ।
धारणाभिर्वशेकृत्वा पूर्वंदुर्धर्षणंमनः ॥ ४ ॥
एकाकारमनामंदबुधैरुपमलाचयम् ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरंध्यायेज्जगदाधारमुच्यते ॥ ५ ॥
आत्मनोबहिरन्तस्थं शुद्धचामीकरप्रभम् ।
रहस्येकान्तमासीनो ध्यायेदामरणान्तिकम् ॥६॥
बंधनों को तोड़ कर अमृत रूपी विष्णु के पद को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ६ अध्याय भाषा समाप्त ॥
वर्ण और आश्रम के धर्मों का स्वरूप कहा द्विज लोग जिस धर्म से स्वर्ग वा मोक्ष को पाते हैं ॥ १ ॥ अब संक्षेप से योग शास्त्र का उत्तम सार कहते हैं कि जिस के सुनने से मोक्ष चाहने वाले मुक्त होते हैं ॥ २ ॥ योगाभ्यास के बल से ही पाप नष्ट होते हैं इस से योग में तत्पर होकर उत्तम आचरण से नित्य ध्यान करे ॥ ३ ॥ प्रथम प्राणायाम से वाणी को प्रत्याहार (विषयों से इन्द्रियों को हटाने) द्वारा उपस्थेन्द्रिय को धारणा (किसी खास वस्तु में मन को बांधने) से वश करने अयोग्य मन को वश में करके ॥ ४ ॥ एकाग्र चित्त होकर देवताओं को भी अगम्य (प्राप्ति के अयोग्य) और सूक्ष्म जो जगत् का आश्रय भगवान् तिस का ध्यान करे ॥ ५ ॥ जो ब्रह्म अपने स्वरूप से बाहर और भीतर स्थित है और शुद्ध सोने के समान जिस की कांति है ऐसे ब्रह्म का मरण पर्यन्त एकान्त में एकाग्र बैठ कर ध्यान करे ॥ ६ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २६
यत्तत्सर्वप्राणिहृदयं सर्वेषांचहृदिस्थितम् ।
यच्चसर्वजनैर्ज्ञेयं सोऽहमस्मीतिचिंतयेत् ॥ ७ ॥
आत्मलाभसुखंयाव-त्तपोध्यानमुदीरितम् ।
श्रुतिस्मृत्यादिकंधमं तद्विरुद्धंनचाचरेत् ॥ ८ ॥
यथारथोऽश्वहीनस्तु यथाश्वोरथिहीनकः ।
एवंतपश्चविद्याच संयुतेभेषजंभवेत् ॥ ९ ॥
यथान्नंमधुसंयुक्तं मधुवान्नेनसंयुतम् ।
उभाभ्यामपिपक्षाभ्यां यथाखेपक्षिणांगतिः ॥ १० ॥
तथैवज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यतेब्रह्मशाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यांसंपन्नो ब्राह्मणोयोगतत्परः ॥ ११ ॥
देहद्वयंविहायाशु मुक्तोभवतिबंधनात् ।
नतथाक्षीणदेहस्य विनाशोविद्यते क्वचित् ॥ १२ ॥
मयातु कथितःसर्वो वर्णाश्रमविभागशः ।
जो सब प्राणियों का हृदय है और जो सब के हृदय में स्थित है और जो सब जनों के जानने योग्य है वही मैं हूं ऐसा चिंतन ( स्मरण ) करै ॥ ७ ॥
जब तक आत्मप्राप्ति का सुख न हो तब तक ध्यान करे यह शास्त्रकारों ने कहा है । आत्मलाभ का अविरोधी जो श्रुति और स्मृति का धर्म उस को करे किन्तु गृहस्थादि का धर्म न करे ॥ ८ ॥
जैसे घोड़े के विना रथ और सारथि के विना घोड़ा नहीं चल सकते और दोनों परस्पर सहायक हैं-इसी प्रकार तप नाम कर्मकाण्ड विद्या ( ज्ञान ) दोनों मिलकर संसार रोग की औषध हैं ॥ ९ ॥
जैसे मीठे से मिला अन्न तथा मीठा और जैसे दोनों ही पंखों से आकाश में पक्षियों की गति ( उड़ना ) होती है ॥ १० ॥
तैसे ही ज्ञान और तप से युक्त और योग में तत्पर ब्राह्मण ॥ ११ ॥
दोनों ( स्थूल—सूक्ष्म ) देहों को शीघ्र छोड़कर बन्धनों से छूट जाता है । इस प्रकार जिस का देह नष्ट होगया हो उस का कभी भी नाश ( कुगति ) नहीं होता ॥ १२ ॥
हे ऋषि मुनियो ! हमने वर्ण और आश्रम के भेद और संक्षेप
३० भाषार्थसहिता ॥
संक्षेपेणद्विजश्रेष्ठा धर्मस्तेषांसनातनः ॥ १३ ॥
श्रुत्वैवंमुनयोधर्मं स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्यतमृषिं जग्मुर्मुदिताःस्वंस्वमाश्रमम् ॥ १४ ॥
धर्मशास्त्रमिदंसर्वं हारीतमुखनिःसृतम् ।
अधीत्यकुरुतेधर्मं सयातिपरमांगतिम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मणस्यतुयत्कर्म कथितंबाहुजस्यच ।
ऊरुजस्यापियत्कर्म कथितंपादजस्यच ॥ १६ ॥
अन्यथावर्तमानस्तु सद्यःपततिजातितः ।
योयस्याभिहितोधर्मः सतुतस्यतथैवच ॥ १७ ॥
तस्मात्स्वधर्मंकुर्वीत द्विजोनित्यमनापदि ।
राजेन्द्रवर्णाश्चत्वारश्चत्वारश्चापिचाश्रमाः ॥१८॥
स्वधर्मं येनुतिष्ठंति तेयांतिपरमांगतिम् ।
स्वधर्मेणयथानृणां नारसिंहःप्रसीदति ॥१९॥
से उन का सनातन सब धर्म तुम से कहा ॥ १३ ॥ स्वर्ग और मोक्षरूपदाता धर्म को इस प्रकार सुन कर उन हारीत मुनि को नमस्कार करके प्रसन्न हुए सब मुनि अपने २ आश्रम को चलेगये ॥ १४ ॥ हारीत मुनि के मुख से निकले इस सब धर्मशास्त्र को पढ़कर जो धर्म करता है वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को जो कर्म इस में कहा है ॥ १६ ॥ उस के विरुद्ध जो बर्ताव करता है वह शीघ्र जाति से पतित होता है । जो जिस वर्ण का धर्म कहा है वह वैसा ही उस वर्ण का धर्म है उस में लौट पौट कुछ में की जाय तो वह उस का धर्म न होगा ॥ १७ ॥ आपत्काल को छोड़ कर प्रति दिन द्विज लोग अपने २ धर्म को करें राजा है मुख्य जिन में ऐसे-चार वर्ण और चार ही आश्रम हैं ॥ १८ ॥ अपने धर्म को जो करते हैं वे परम गति को प्राप्त होते हैं जैसे अपने धर्म से मनुष्यों पर नरसिंह भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १९ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ ३१
नतुष्यतितथान्येन कर्मणामधुसूदनः अतःकुर्वन्निजंकर्म यथाकालमतन्द्रितः ॥२०॥ सहस्रानीकदेवेशं नारसिंहंचसालयम् । उत्पन्नवैराग्यबलेनयोगी ध्यायेत्परंब्रह्मसदाक्रियावान् । सत्यंसुखरूपमनंतमाद्यं विहायदेहंपदमेतिविष्णोः ॥२२॥
इतिहारीते धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
वैसे अन्य वर्गों के धर्म से प्रसन्न नहीं होते इससे नित्य आलस्य को छोड़ कर समय पर अपना धर्म करता हुआ मनुष्य ॥२०॥ सहस्रों देवों के स्वामी भगवान् को प्राप्त होता है ॥२१॥ उत्पन्न हुए वैराग्य के बल से जो सदाचारी धर्म कर्म निष्ठ योगी परब्रह्म का ध्यान करता है वह देह को त्याग कर सत्य सुखरूप अनन्त (अविनाशी) आद्य जो विष्णु का पद उस को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्म-शास्त्रे ७ अध्याय भाषा समाप्ता ।
समाप्तं चेदं धर्मशास्त्रम् ॥
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अथौशनसस्मृतिः ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि जातिवृत्तिविधानकम् ।
अनुलोमविधानंच प्रतिलोमविधिंतथा ॥१॥
सांतरालकसंयुक्तं सर्वं संक्षिप्यचोच्यते ।
नृपाद्ब्राह्मणकन्यायां विवाहेष्वसमन्वयात् ॥२॥
जातःसूतोऽत्रनिर्दिष्टः प्रतिलोमविधिद्विजः ।
वेदानर्हस्तथाचैषां धर्म्माणामनुवोधकः ॥३॥
सूताद्विप्रप्रसूतायां सुतोवेणुकउच्चयते ।
नृपायामेवतस्यैव जातोयश्चर्मकारकः ॥४॥
ब्राह्मण्यांक्षत्रियाच्चौर्याद्रथकारःप्रजायते ।
वृत्तंचशूद्रवत्तस्य द्विजत्वंप्रतिषिध्यते ॥५॥
यानानांयेचवोढारस्तेषांचपरिचारकः ।
अब आगे उत्तर जातियों की और जीविका विधान कहेंगे तथा अनुलोम (नीच वर्ण की कन्या में ऊंचे वर्ण से उत्पन्न) की और प्रतिलोम (ऊँचे वर्ण की कन्या में नीच वर्ण से उत्पन्न हुए) की विधि कहते हैं ॥१॥ अन्तरालक (जो इन के बीच में पैदा हुए हैं पुलिंद आदि) उन सहित सब संक्षेप से कहा जाता है। ब्राह्मण की कन्या में विवाह होने पर जो सन्तान क्षत्रिय से ॥ २ ॥ उत्पन्न होता है वह सूत कहा है वह प्रतिलोम विधि का द्विज है। यह सूत वेदका अधिकारी नहीं यह केवल वेद के धर्मों को इतिहासादि द्वारा उपदेष्टा (बतलानेवाला) होता है ॥ ३ ॥ सूत से ब्राह्मण की कन्या में जो हो उसे वेणुक (भाट) कहते हैं क्षत्रिय कन्या में जो सूत से पैदा हो वह चमार कहाता है ॥ ४ ॥ ब्राह्मण की कन्या में जो क्षत्रिय से गुप्त व्यभिचार द्वारा पैदा हो वह रथकार (बढ़ई) कहाता है इसका धर्म वही है जो शूद्र का और यह द्विज नहीं होता ॥ ५ ॥ जो यान (सवारी) के चलाने वाले हैं अथवा जो गाड़ी चलाने वालों के
२
भाषार्थसहिता ॥
शूद्रवृत्त्यातुजीवन्ति नक्षात्रंधर्ममाचरेत् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण्यांवैश्यसंसर्गाज्जातोमागधउच्यते ।
वंदित्वंब्राह्मणानां च क्षत्रियाणांविशेषतः ॥ ७ ॥
प्रशंसावृत्तिकोजीवेद्वैश्यप्रेष्यकरस्तथा ।
ब्राह्मण्यांशूद्रसंसर्गाज्जातश्चांडालउच्यते ॥ ८ ॥
सीसमाभरणंतस्य कार्ष्णायसमथापिवा ।
वध्रींकण्ठेसमाबध्य महल्लरींकक्षतोपिवा ॥ ९ ॥
मलापकर्षणंग्रामे पूर्वाह्नेपरिशुद्धिकम् ।
नपराह्ने प्रविशेपि बहिर्ग्रामाच्चनैऋते ॥ १० ॥
पिण्डीभूताभवंत्यत्र नोचेद्वध्याविशेषतः ।
चांडालाद्वैश्यकन्यायां जातःश्वपचउच्यते ॥ ११ ॥
श्वमांसभक्षणंतेषां श्वानएवचतद्बलम् ।
नृपायांवैश्यसंसर्गादायोगवइतिस्मृतः ॥ १२ ॥
तंतुवायाभवंत्येव वसुकांस्योपजीविनः ।
शोलिकाःकेचिदत्रैव जीवनंवस्त्रनिर्मितै ॥ १३ ॥
६॥क होकर शूद्र की वृत्ति से जीते हैं वेभी क्षत्रिय धर्म का आचरण न करें ॥ ६ ॥ ब्राह्मणी में जो वैश्य के संसर्ग ( मेल ) से उत्पन्न हो उसे मागध (भाट) कहते हैं ये ब्राह्मणों का तथा विशेष कर क्षत्रियों का बंदी ( स्तुति करने वाला) होता है ॥७॥ प्रशंसा वृत्ति (अन्यों की स्तुति प्रशंसा कर धन प्राप्त करना) उसकी जीविका है अथवा वैश्य की सेवा करे ब्राह्मणी में जो शूद्र के संसर्ग (मेल) से उत्पन्न हो उसे चांडाल कहते हैं ॥८॥ इस के सीसे अथवा लोहे के आभरण (गहने) होते हैं और कंठ में वधी (चमड़े का पट्टा) और कोख में झालरी बांध कर ॥९॥ दोपहर से पूर्व गांव में शुद्धता के अर्थ मल को उठावे और मध्यान्ह के पश्चात ग्राम में न घुसे किन्तु गांव से बाहर नैऋंत दिशा में रहा करे ॥१०॥ और वे सब एक ही जगह रहें और जो एकत्र न रहें तो अवश्य वध के योग्य हैं चांडाल से जो वैश्य की कन्या में पुत्र उत्पन्न हो उसे श्वपच कहते हैं ॥११॥ कुत्ते का मांस ही उनका भोजन है और कुत्ता ही उन का बल है क्षत्रिय की कन्या में जो वैश्य से पुत्र उत्पन्न हो वह आयोगव (कोरी) कहाता है ॥१२॥
औशनसस्मृतिः ॥ ३
आयोगवेनविप्रायां जातास्ताम्रोपजीविनः ।
तस्यैवनृपकन्यायां जातःसूनिकउच्यते ॥ १४ ॥
सूनिकस्यनृपायांतु जाताउद्बंधकाःस्मृताः ।
निर्णेजयेयुर्वस्त्राणि अस्पृश्याश्चभवन्त्यतः ॥ १५ ॥
नृपायांवैश्यतश्चौर्यात् पुलिंदःपरिकीर्तितः ।
पशुवृत्तिर्भवेत्तस्य हन्युस्तान्दुष्टसत्त्वकान् ॥ १६ ॥
नृपायांशूद्रसंसर्गाज्जातः पुल्कसउच्यते ।
सुरावृत्तिंसमारुह्य मधुविक्रयकर्म्मणा ॥ १७ ॥
कृतकानांसुराणांच विक्रे तायाचको भवेत् ।
पुल्कसाद्वैश्यकन्यायां जातोरजकउच्यते ॥ १८ ॥
नृपायांशूद्रतश्चौर्याज्जातोरंजक उच्यते ।
ये वस्त्र वियनने और कांसे के व्यापार से जीविका करें तथा इन में जो वस्त्र पर रचे सूत रेशम आदि के कसीदे से जीते हैं वे शीलिन कहते हैं ॥ १३ ॥
आयोगव (कोरी) से जो ब्राह्मण की कन्या में उत्पन्न होते हैं वे ताम्रोपजीवी (तांबे आदि से जीविका करने वाले) होते हैं और आयोगव (कोरी) व क्षत्रिय कन्या में जो उत्पन्न हो उसे सूनिक (सोनी) कहते हैं ॥ १४ ॥
सूनिक से जो क्षत्रिय की कन्या में उत्पन्न हों उन्हें उद्बंधक कहते हैं ये वस्त्रों को धोवें और स्पर्श करने के योग्य नहीं होते ॥ १५ ॥
क्षत्रिय की कन्या में जो छिप कर व्यभिचार द्वारा वैश्य से पैदा हो उस को पुलिंद कहते हैं और ये दुष्ट जीवों को मार पशुवृत्ति (मांसवृत्ति) होते हैं ॥ १६ ॥
क्षत्रिय की कन्या में जो शूद्र से उत्पन्न हो उसे पुल्कश (कजाल) कहते हैं वह सुरा (मदिरा) की जीवका के निमित्त मधुर मीठा को बेचता है ॥ १७ ॥
और बनी हुई मदिरा को बेचता और पकाता भी है और पुल्कश से वैश्य की कन्या में जो पैदा हो उसे रजक कहते हैं ॥ १८ ॥
क्षत्रिय की कन्या में शूद्र से चोरी (व्यभिचार) से जो पैदा हो उसे रंजक (रंगरेज) कहते हैं तथा रंजक से जो वैश्य की कन्या में पैदा हो उसे शतंक (नट) वा गायक
४ | भाषार्थसहिता ॥
वैश्यायांरंजकाज्जातो नर्त्तकोगायकोभवेत् ॥ १९ ॥
वैश्यायांशूद्रसंसर्गाज्जातोवैदेहकःस्मृतः ।
अजानांपालनंकुर्यान्महिषीणांगवामपि ॥ २० ॥
दधिक्षीराज्यतक्राणां विक्रयाज्जीवनंभवेत् ।
वैदेहिकात्तुविप्रायां जातश्चर्मोपजीविनः ॥ २१ ॥
नृपायामिवतस्यैव सूचिकःपाचिकःस्मतः
वैश्यायांशूद्रतश्चौर्याज्जातश्चक्रीचउच्यते ॥ २२ ॥
तैलपिष्टकजीवीतु लवणंभावयन्पुनः ।
विधिनाब्राह्मणःप्राप्य नृपायांतुसमन्त्रकम् ॥ २३ ॥
जातःसुवर्णइत्युक्तः सानुलोमद्विजस्मृतः ।
अथवर्णक्रियांकुर्वन्नित्यनैमित्तिकींक्रियाम् ॥ २४ ॥
अश्वरथंहस्तिनंच वाहयेद्वानृपाज्ञया ।
सैनापत्यंचभैषज्यं कुर्याज्जीवेत्तुवृत्तिषु । २५ ॥
नृपायांविप्रतश्चौर्यात्संजातोयोभिषक्स्मृतः ।
कथक ) कहते हैं ॥१९॥ वैश्य की कन्या में शूद्र के संसर्ग से जो पैदा हो उसे वैदेहिक (गड़रिया) कहते हैं वह बकरी-भैंस-गौ इन को पाले ॥२०॥ और दही दूध-घी-मठा इनका बेचना उस की जीविका है-वैदेहिक से ब्राह्मणी में जो पुत्र उत्पन्न हों वे चर्मोपजीवी होते हैं अर्थात् चाम बेच कर जीते हैं ॥२१॥ वैदेहिक से क्षत्रिय की कन्यामें जो पैदा हो उसे सूचिक (दरजी) अथवा पाचक (रसोइया) कहते हैं शूद्रसे जो वैश्य की कन्यामें चोरी से पैदा हो उसे चक्री (तेली) कहते हैं ॥२२॥ यह तिल वा खल अथवा लवण से जीता है-विधि से ब्राह्मण ने विवाही जो क्षत्रिय की कन्या उस से जो उत्पन्न होता है ॥२३॥ वह अनुलोम सुवर्ण द्विज कहाता है वह नित्य (संध्यादि ) नैमित्तिक (जात कर्मादि) क्रिया को करता हुआ ॥ २४ ॥ राजा की आज्ञा से घोड़ा-रथ हाथी इन को चलाता है और सेनापति बनकर अथवा औषधों से अपना निर्वाह करे ॥२५॥ क्षत्रिय की कन्या में चोरी से जो ब्राह्मण से पुत्र उत्पन्न होता है उसे भिषक्
औशनसस्मृतिः ॥ ५
अभिषिक्तनृपस्याज्ञां परिपालयेत्तुवैद्यकम् ॥२६॥ आयुर्वेदमथाष्टांगं तन्त्रोक्तं धर्ममाचरेत् । ज्योतिषंगणितंवापि कायिकींवृत्तिमाचरेत् ॥ २७ ॥ नृपायांविधिनाविप्राज्जातो नृपहतिस्मृतः । नृपायांनृपसंसर्गात्प्रमादाद्गूढजातकः ॥ २८ ॥ सोऽपिक्षत्रियएवस्या-दभिषेकेचवर्जितः । अभिषेकंविनाप्राप्य गोजङ्गत्यभिधायकः ॥ २९ ॥ सर्वंतुराजवृत्त्य शस्यतेपदवंदनम् । पुनर्भूकरणेराज्ञानृपकालीनएवच ॥ ३० ॥ वैश्यायांविधिनाविप्राज्जातो ह्यंबष्ठउच्यते । कृष्यजीवीभवेत्तस्य तथैवाग्नेयवृत्तिकः ॥ ३१ ॥ ध्वजिनीजीविकावापि ह्यंबष्ठाःशस्त्रजीविनः । वैश्यायांचिप्रतश्चौर्यात्कुंभकारसउच्यते ॥ ३२ ॥ कुलालवृत्त्याजीवेत्तु नापितावाभवन्त्यतः ।
कहते हैं वह राजा की आज्ञा से वैद्यक करता है ॥ २६॥ वह अष्टांग आयुर्वेद अथवा तंत्र के कहे धर्मों को करै ज्योतिष वा गणित विद्या से अपना निर्वाह करे ॥ २७ ॥ क्षत्रिय की कन्या में जो ब्राह्मण से पैदा हो वह नृप और इस नृप से क्षत्रिय कन्या में जो पुत्र पैदा हो वह गूढ़ कहलाता है ॥ २८ ॥ और वह भी क्षत्रिय होता परन्तु अभिषेक (राज तिलक) के योग्य नहीं होता अभिषेक की अयोग्यता से इसे गोज (गोल) कहते हैं ॥ २९ ॥ सब प्रकार से राजा के चरणों की वंदना (नमस्कार) श्रेष्ठ है और यह गोज राजाओं के पुनर्भू करण (द्वितीय विवाह करने) में राजा के समान है अर्थात् इस के यहां राजा द्वितीय विवाह करले ॥ ३० ॥ विधि से विवाही वैश्य कन्या में जो ब्राह्मण से हो वह अंबष्ठ कहलाता है खेती अथवा आग्नेय (लकड़ी) उस की जीविका होती है ॥ ३१ ॥ सेना की अथवा शस्त्र की जीविका अंबष्ठों की है—और वैश्य की कन्या में जो चोरी से ब्राह्मण से पैदा हो उसे कुंभकार (कुम्हार) कहते हैं ॥ ३२ ॥ यह कुलाल की वृत्ति (मट्टी के पात्र बनाने) से जीवे
भाषार्थसहिता ॥
सूतकेप्रेतकेवापि दीक्षाकालेऽथवापनम् ॥ ३३ ॥ नाभेरूर्ध्वंतुवपनं तस्मान्नापितउच्यते । कायस्थइतिजीवेत्तु विचरेच्चइतस्ततः ॥ ३४ ॥ काकाल्लोहं यंयमात्क्रौर्यंस्थपतेरथकृंतनम् । आद्यक्षराणिसंगृह्य कायस्थइतिकीर्तितः ॥ ३५ ॥ शूद्रायांविधिनाविप्राज्जातः पारशवोमतः । भद्रकादीन्समाश्रित्य जीवेयुःपूतकाःस्मृताः ॥ ३६ ॥ शिवाद्यागमविद्यावैस्तथामंडलवृत्तिभिः । तस्यांवैचौरसोवृत्तो निषादोजातउच्यते ॥ ३७ ॥ वनेदुष्टमृगान्हत्वा जीवनंमांसविक्रयः । नृपाज्जातोथवैश्यायां गृह्यायांविधिनास्मृतः। वैश्यवृत्त्यातुजीवेत क्षत्रधर्मंनचारयेत् ॥ ३८ ॥ तस्यांतस्यैवचौरेण मणिकारःप्रजायते ।
इसी से नापित (नाई) होते हैं जन्मसूतक अथवा मरणसूतक में अथवा दीक्षा (मंत्र का उपदेश) काल में ये केशों का छेदन करते हैं ॥ ३३ ॥ नाभी के ऊपर के केश काटने से नापित कहाता है और यह कायस्थ नाम से इधर उधर विचरता हुआ जीविका करता है ॥ ३४ ॥ काक (कौआ) से चंचलता-यमराज से क्रूरता-स्थपति (कारीगर) से काटना इन तीनों अर्थ के जताने के लिये इन तीनों शब्दों के पहिले २ अक्षर लेकर इसको कायस्थ कहा है ॥ ३५ ॥ विधि से विवाही शूद्र की कन्या में जो ब्राह्मण से पैदा हो वह पारशव (पारधी) माना है ये भद्रक (अच्छे) आदि पहाड़ों पर रह कर जीवें और पूतक कहाते हैं ॥ ३६ ॥ शिवादि आगम विद्या (पंचरात्र आदि) ओं से अथवा मंडलवृत्ति से ये जीवें उसी जाति में (स्त्री पुरुष दोनों पारशवों ) जो चौरस पुत्र है उसे निषाद कहते हैं ॥ ३७ ॥ वन में दुष्ट मृगों को मार कर मांस बेचना उन की जीविका है विधि से विवाही वैश्य कन्या में जो पुत्र क्षत्रिय से पैदा हो वह वैश्यवृत्ति से जीवे और क्षत्रिय के धर्म को न करे ॥ ३८ ॥ वैश्य की कन्या में क्षत्रिय से चोरी करके जो पैदा हो वह मणिकार (मीनाकार)
औशनसस्मृतिः ॥ ९
मणीनांराजतांकुर्यान्मुक्तानांवेधनक्रियाम् ॥ ३९ ॥ प्रवालानांचसूत्रित्वं शाखानांवलयक्रियाम् । शूद्रस्यविप्रसंसर्गाज्जातउग्रइतिस्मृतः ॥ ४० ॥ नृपस्यदंडधारःस्यादृढंदंड्येषुसंचरेत् । तस्यैवचौर्य्यसंवृत्या जातःशुण्डिकउच्यते ॥ ४१ ॥ जातदुष्टान्समारोप्य शुंडाकर्मणियोजयेत् । शूद्रायांवैश्यसंसर्गाद्विधिनासूचिकःस्मृतः ॥ ४२ ॥ सचक्राद्विप्रकन्यायां जातस्तक्षकउच्यते । शिल्पकर्माणिचान्यानिप्रासादलक्षणंतथा ॥ ४३ ॥ नृपायामेवतस्यैव जातोयोमत्स्यबंधकः । शूद्रायांवैश्यतश्चौर्यात्कटककारइतिस्मृतः ॥ ४४ ॥ वशिष्ठशापात्त्रेतायां केचित्पारशवारतथा ।
होता है मणियों का रंगना वा मोतियों का बींधना इस का काम है ॥३९॥ अथवा मूंगों की माला वा कड़े बनाना इसका काम है शूद्र के घर ब्राह्मण के संसर्ग से जो पैदा हो वह उग्र कहाता है ॥ ४०॥ यह राजा का दंडधार होता है और दंड के योग्यों को दंड देता है और जो ब्राह्मण से शूद्री में चोरी से हो उसे शुंडिक कहते हैं ॥ ४१ ॥ जन्मते ही दुष्टों के ऊपर अधिपति बना-कर उस शुंडी को शुंडा कर्म ( सूली देना ) में राजा नियुक्त करे विधि से विवाही शूद्र कन्या में जो वैश्य से पैदा हो उसे सूचिक ( दरजी ) कहते हैं॥४२ सूचिक से ब्राह्मण की कन्या में जो पैदा हो उसे तक्षक (बढ़ई) कहते हैं शिल्प कर्म ( कारीगरी ) वा प्रासाद लक्षण ( मकान बनाने का प्रकार ) काम को करता है ॥ ४३ ॥ क्षत्रिय की कन्या में जो सूचिक से पैदा हो वह मत्स्यबंधक ( धीवर ) होता है शूद्र की कन्या में चोरी से जो वैश्य से पैदा हो वह कटकार कहाता है ॥ ४४ ॥ त्रेतायुग में वशिष्ठजी के शाप से भी कोई एक पार-
८ भाषार्थसहिता ४
वैखानसेनकेचित्तु केचिद्भागवतेनच ॥ ४५ ॥
वेदशास्त्रावलम्बास्ते भविष्यंतिकलीयगे ॥
कटकारास्ततः पश्चान्नारायणगणाः स्मृताः ॥ ४६ ॥
शाखावैखानसेनोक्तातंत्रमार्गविधिक्रियाः ।
निषेकाद्याःश्मशानांताः क्रियाःपूजांगसूचिकाः ॥४७॥
पंचरात्रेणवाप्राप्तं प्रोक्तंधर्मं समाचरेत् ।
शूद्रादेव तुशूद्रायां जातः शूद्रइतिस्मृतः ॥४८॥
द्विजशुश्रूषणपरः पाकयज्ञपरान्वितः ।
सच्छूद्रंतंविजानीयादसच्छूद्रस्ततोऽन्यथा ॥४९॥
चौर्यात्काकवचोज्ञेयश्चाश्वानांतृणवाहकः ।
एतत्सक्षेपतःप्रोक्तं जातिवृत्तिविभागशः ॥५०॥
जान्त्यन्तराणिदृश्यन्ते सङ्कल्पादितएवतु ॥ ५१ ॥
इत्यौशनसं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥
शय होते हैं वे वैखानस (हरिकाराना) से अथवा परमेश्वर की भक्ति से॥४५॥ वे शापवाले पारशव कलियुग में वेदशास्त्र के जानने वाले होंगे तिस के पीछे वे कटकारानाम के नारायण के गण कहायेंगे ॥४६॥ तंत्रमार्गके विधान से कर्म जिनमें है ऐसी शाखा वैखानस ऋषि ने कही है और गर्भ से लेकर श्मशानतक १६ संस्कार भी इन के होते हैं इसीसे ये सूचिक पूज्य (श्रेष्ठ) हैं ॥ ४७ ॥ नारद पंचरात्र में कहे हुए धर्म को ये करें—शूद्र की कन्या में शूद्रसे शूद्रही होता है ॥४८॥ जो शूद्र द्विज (तीनवर्ण) की सेवा में पाकयज्ञ के कर्म में सावधानरहे उस शूद्र को उत्तम शूद्र जानो और जो न रहे उसे असत् (निंदाकेयोग्य) जानना ॥४९॥ शूद्रकी कन्या में चोरी से जो शूद्रसे पैदा हो वह घोड़ोंका घास लानेहारा तृणवाहक काकवच कहाता है—यह संक्षेप से जाति और जीविका के अनुसार भिन्न २ हमने कहा ॥ ५०॥ मनुके संकल्प से इनमें से ही और २ जातिभी दीखती हैं ॥ ५१ ॥
इत्यौशनशं धर्मशास्त्रं समाप्तम्
॥ श्रीगणेशायनमः ॥
अंगिरःस्मृतिप्रारंभः
गृहाश्रमेशुधर्मेषु वर्णानामनुपूर्वशः ।
प्रायश्चित्तविधिंदृष्ट्वा ह्यंगिरामुनिरब्रवीत् ॥१॥
अन्त्यानामपिसिद्धान्नं भक्षयित्वा द्विजातयः ।
चान्द्रंकृच्छ्रं तदर्धंतु ब्रह्मक्षत्रविशांविदुः ॥२॥
रजकश्चर्मकरश्चैव नटोबुरुडएवच ।
कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैतेचान्त्यजाः स्मृताः ॥३॥
अन्त्यजानांगृहेतोयं भांडेपर्युषितंचयत् ।
तद्विजेनयदापीतं तदैवहिसमाचरेत् ॥४॥
चांडालकूपभाण्डेषु त्वज्ञानात्पियतेयदि ।
प्रायश्चित्तंकथंतेषां वर्णेवर्णोविधीयते ॥५॥
चरेत्सांतपनंविप्रः प्राजापत्यंतुभूमिपः ।
तदर्धंतुचरेद्वैश्यः पादंशूद्रेषुदापयेत् ॥६॥
अज्ञानात्पियतेतोयं ब्राह्मणस्त्वंत्यजातिषु ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥७॥
गृहस्थाश्रम के धर्मों में यथाक्रम चारों वर्णों के प्रायश्चित्त विधि को देख अंगिरा मुनि बोले॥१॥ अंत्यजों के पकाये हुए अन्नको भक्षण कर ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य क्रमशः चांद्रायण-कृच्छ्र-और आधाकृच्छ्र करें ॥२॥ रजक (धोबी)-चमार-नट-बुरुड-कैवर्त्त-मेद-भील ये सात अंत्यज कहाते हैं ॥३॥ अंत्यजों के घर में जल और उनके पात्र में रक्खा हुआ बासा जल-उसको यदि द्विज पीलेतो उसी समय शास्त्र विहित प्रायश्चित्त को करे ॥४॥ यदि चांडाल के कूप अथवा पात्रके जल को अज्ञान से द्विजाति पीले तो उन २ वर्णों का प्रायश्चित्त कैसे हो ! ॥५॥ ब्राह्मण सांतपन-क्षत्रिय प्राजापत्य-वैश्य आधा प्राजापत्य-और शूद्र चौथाई प्राजापत्यव्रत को क्रम से करे ॥६॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से अंत्यज जातियों के जल को पीले तो एक दिन उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥७॥
२
भाषार्थसहिता ॥
विप्रो विप्रेण संस्पृष्ट उच्छिष्टेन कदाचन ।
आचांत एव शुद्धेत अंगिरामुनिरब्रवीत् ॥८॥
क्षत्रियेण यदा स्पृष्ट उच्छिष्टेन कदाचन ।
स्नानं जप्यं तु कुर्वीत दिनस्यार्द्धेन शुद्ध्यति ॥९॥
वैश्येन तु यदा स्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः ।
उपोष्य रजनीमेकां पंचगव्येन शुद्ध्यति ॥१०॥
अनुच्छिष्टेन संस्पृष्टः स्नानं येन विधीयते ।
तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥११॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नीलीशौचस्य वै विधिम् ।
स्त्रीणां क्रीडार्थसंभोगे शयनीये न दुष्यति ॥ १२ ॥
पालनं विक्रयश्चैव सद्वृत्त्या उपजीवनम् ।
पतितस्तु भवेद्विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्यपोहति ॥ १३ ॥
स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।
स्पृष्ट्वा तस्य महापापं नीलीवस्त्रस्य धारणम् ॥ १४ ॥
ना कभी उच्छिष्ट ब्राह्मण-ब्राह्मण का स्पर्श करले तो आचमन कर के शुद्ध होता है यह अंगिरा मुनि ने कहा है ॥८॥ जो कभी उच्छिष्ट क्षत्रिय ब्राह्मण को स्पर्श करले तो स्नान और जप करता हुआ आधे दिनमें शुद्ध होता है ॥९॥ जो उच्छिष्ट वैश्य शूद्र और कुत्ता, ये तीनों ब्राह्मण को स्पर्श करलें तो एक रात्री भर उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है ॥१०॥ जिस अनुच्छिष्ट (जूठे मुख न हो) के स्पर्श करनेसे स्नान कहा है उसी उच्छिष्टके स्पर्श करने पर प्राजापत्य व्रतको करे ॥११॥ इनसे आगे नीली (नील) के शौच की विधि कहते हैं—स्त्रियों की क्रीड़ा के अर्थ भोग करने की शय्या पर नीला कपड़ा दूषित नहीं है ॥१२॥ नील का पालना-बेचना और नीलके व्यापार से जीविका करने से ब्राह्मण पतित होता है पुनः तीन कृच्छ्रव्रत करके उस पाप से शुद्ध होता है ॥१३॥ नीलेवस्त्र धारण करने वाले पुरुष का स्पर्श करके जो स्नान दान जप-होम=वेदपाठ-और पितरों का तर्पण करता है उसको महान् (बड़ा) पाप होता है ॥१४॥
अङ्गिरःस्मृतिः ॥ ३
नीलीरक्तं यदा वस्त्र-मज्ञानेनतुधारयेत् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १५ ॥
नीलीदारुयदाभिंद्याद् ब्राह्मणंवैप्रमादतः ।
शोणितंदृश्यतेयत्र द्विजश्चांद्रायणंचरेत् ॥ १६ ॥
नीलीवृक्षेणपक्वं तु अन्नमश्नातिचेद्द्विजः ।
आहारवमनंकृत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १७ ॥
भक्षेत्प्रमादतोनीलीं द्विजातिस्त्वसमाहितः ।
त्रिषुवर्णेषुसामान्यं चांद्रायणमितिस्थितम् ॥ १८ ॥
नीलीरक्ते नवस्त्रेण यदन्नमुपदीयते ।
नोपतिष्ठतिदातारं भोक्ताभुंक्ते तुकिल्बिषम् ॥ १९ ॥
नीलीरक्ते नवस्त्रेण यत्पाकंप्रपितंभवेत् ।
तेनभुक्तेनविप्राणां दिनमेकमभोजनम् ॥ २० ॥
मृतेभर्तरियानारी नीलीवस्त्रंप्रधारयेत् ।
भर्तातुनरकंयाति सानारोतदनन्तरम् ॥ २१ ॥
नीलके रंगे वस्त्र को जो अज्ञानसे धारण करताहै वह एक रात दिन उपवास कर और पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ १५ ॥ जो नील की लकड़ी से ब्राह्मण के शरीर में प्रमाद से घाव हो जाय और रुधिर दिखलाई दे तो ब्राह्मण चान्द्रायण व्रत करे ॥ १६ ॥ यदि ब्राह्मण नील की लकड़ियों में पके हुए अन्न को खावे तो उस अन्न को वमन कर पुनः पंचगव्य के पीने से शुद्ध होता है ॥ १७ ॥ द्विजाति प्रमाद और असावधानी से नील को खाले तो तीनों वर्णों को सामान्य चांद्रायण व्रत का प्रायश्चित्त होता है ॥ १८ ॥ नील के वस्त्र को धारण कर जो अन्न दिया जाता है उस का फल दाता को नहीं मिलता और भोजन करने वाला भी पापी होता है ॥ १९ ॥ नीले वस्त्र को धारण कर जो भोजन बनाया जाता है उस को खाकर ब्राह्मण एक दिन ( उपवास ) करे ॥ २० ॥ पति के मरने के पश्चात् जो स्त्री नीले कपड़े धारण करती है उस का पति नरक में जाता और पीछे से वह स्त्री भी नरक में जाती है ॥ २१ ॥
५ | भाषाधर्मसंहिता ॥
नील्याचोपहतेक्षेत्रे सस्यंयत्तत्प्ररोहति ।
अभोज्यंतद्द्विजातीनां भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ॥ २२ ॥
देवद्रोणेष्वृषोत्सर्गे यज्ञेदानेतथैवच ।
अत्रस्नानंनकर्त्तव्यं दूषिताचवसुंधरा ॥ २३ ॥
वापितायत्रनीलीस्या-त्तावद्भूरशुचिर्भवेत् ।
यावद्द्वादशवर्षाणि अतऊर्ध्वंशुचिर्भवेत् ॥ २४ ॥
भोजनेचैवपानेच तथाचौषधभेषजैः ।
एवंम्रियन्तेयागावः पादमेकंसमाचरेत् ॥ २५ ॥
घंटाभरणदोषेण यत्रगौर्विनिपीड्यते ।
चरेद्वृषव्रतंतेषां भूषणार्थंतुयत्कृतम् ॥ २६ ॥
दमनेदामनिरोधे अवघातेचवैकृते ।
गवांप्रभवताघातैः पादोनंव्रतमाचरेत् ॥ २७ ॥
अंगुष्ठपर्वमात्रस्तु बाहुमात्रप्रमाणतः ।
पूर्वै नील जिस खेत में बोया हो उस खेत में जो अन्न पैदा होता है वह द्विजातियों को अभक्ष्य है और उस को भक्षण करके चांद्रायण करे ॥ २२ ॥ देवद्रोण (तीर्थ) में वृषोत्सर्ग-यज्ञ-और दान - इस में नील के वस्त्रको धारण कर स्नान नहीं करना चाहिये क्योंकि इतने स्थानों में नील के प्रभाव से पृथिवी दूषित होती है ॥ २३ ॥ जिस खेत में नील बोया हो उस खेत की भूमि तब तक अशुद्ध रहती है जब तक बारह वर्ष न बीतें इस के पश्चात् शुद्ध होती है ॥ २४ ॥ भोजन कराने से जल पिलाने से अथवा औषध देने से यदि गौ का मरण होजाय तो गोहत्या का चतुर्थांश प्रायश्चित्त करे ॥ २५ ॥ घंटा बांधने के दोष से जहां गौ मर जाय वहां वही व्रत करे यदि उस के भूषण के लिये घंटा बांधा हो तो ॥ २६ ॥ दमन करने और कराने रोकने तथा मारने पर गौओं के जन्म समय के आघातों से-चौथाई व्रत करे ॥ २७ ॥ अंगुष्ठ २ पर जिस में गांठें हों दो हाथ का जिस का प्रमाण हो और पत्ते तथाअग्रभाग भी जिस में हो उसे दंड कहते हैं ॥ २८ ॥
अङ्गिरःस्मृतिः ॥ ५
सपल्लवञ्चसाग्रञ्च दंडइत्यभिधीयते ॥ २८ ॥ दंडादुक्ताद्यदान्येन पुरुषाःप्रहरन्तिगाम् । द्विगुणं गोव्रतन्तेषांप्रायश्चित्तं विशोधनम् ॥ २९ ॥ शृंगभंगेत्वस्थिभंगे चर्मनिर्मोचने तथा । दशरात्रंचरेत्कृच्छ्रं यावत्स्वस्थोभवेन्नदा ॥ ३० ॥ गोमूत्रेणतुसंमिश्रं यावकंचोपजायते । एतद्देवाहिकृच्छ्र-मित्थ मंगिरसास्मृतम् ॥ ३१ ॥ असमर्थस्यवालस्य पितावायदिवागुरुः । यमुद्दिश्यचरेद्धर्मं पापंतस्यनविद्यते ॥ ३२ ॥ अशीतिर्यस्यवर्षाणि वालोवाप्यूनषोडशः । प्रायश्चित्तार्द्धमर्हंति स्त्रियोरोगिणएवच ॥ ३३ ॥ मूर्च्छितेपतितेचापि गविद्यष्टिप्रहारिते । गायत्र्यष्टसहस्रंतु प्रायश्चित्तंविशोधनम् ॥ ३४ ॥ स्नात्वारजस्वलाचैव चतुर्थेऽह्निविशुद्ध्यति । कुर्याद्रजसिनिर्वृत्ते निवृत्तेनकथंचन ॥ ३५ ॥
उस दंडसे अथवा अन्य दंडसे जब पुरुषगौको ताड़ना देनेपर गोहत्या होजानेसे उन को द्विगुणगोव्रत से शुद्धि होती है॥२९॥यदि ताड़नासे गौकाशींग और हाड़ टूटजाय अथवाचमड़ा उखड़जाय तो दशरात्रतक कृच्छ्रव्रत करे वाजब तक वे सींग आदि अच्छे हों ॥३०॥ गोमूत्र से मिले जो जौ होते हैं यही कृच्छ्र है यह अंगिराऋषिने कहा है ॥३१॥ जिस असमर्थ बालकके बदले पिता अथवा गुरु जिसको उद्देश में रखकर धर्म का आचरण करें उस लड़के को वह पाप नहीं होता ॥३२॥ अस्सी वर्षका पुरुष अथवा सोलह वर्ष की अवस्था सेन्यून का बालक और स्त्री वा रोगी ये आधे प्रायश्चित्तके योग्य हैं ॥३३॥ जो लाठी के प्रहार से गौ को मूर्च्छा हो जाय अथवा गौ गिरपड़े तो आठ हजार गायत्री का जपरूप जो प्रायश्चित्त उससेशुद्धि होती है ॥३४॥ रजस्वला स्त्री चतुर्थ दिन स्नान करके शुद्ध होती है और वह स्त्री रजोधर्म न की निवृत्ति पर ही स्नान करें निवृत्ति के बिना स्नान न करे ॥ ३५ ॥
६ | भाषाधर्मसंहिता ४
रोगेणयद्रजःस्त्रीणा-मत्यर्थंहिप्रवर्त्तते ।
अशुद्धास्तानतेनस्यु-स्तासांवैकारिकंहितत् ॥ ३६ ॥
साध्वाचारानतावत्स्या-द्रजोयावत्प्रवर्त्तते ।
वृत्तेरजसिगम्यास्त्री-गृहकर्मणिचेंद्रिये ॥ ३७ ॥
प्रथमेऽहनिचांडाली द्वितीयेब्रह्मघातिनी ।
तृतीयेरजकीप्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुध्यति ॥ ३८ ॥
रजस्वलायदास्पृष्टा शुनाशूद्रेणचैवहि ।
उपोष्यरजनीमेकां पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ३९ ॥
द्वावेतावशुचीस्यातां दंपती शयनंगतौ ।
शयनादुत्थितानारी शुचिःस्यादशुचिःपुमान् ॥४०॥
गंडूषंपादशौचंच नकुर्यात् कांस्यभाजने ।
भस्मनाशुद्ध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेनशुद्ध्यति ॥४१॥
रजसाशुद्ध्यतेनारी नदीवेगेनशुद्ध्यति ।
रोग से जो स्त्रियों के अत्यंत रज निकलता है उससे वे अशुद्ध नहीं होतीं क्योंकि वह उनका विकारी रज है ॥ ३६ ॥ जब तक रज की प्रवृत्ति रहे तब तक उत्तम आचरण न करे और रज की निवृत्ति होने पर पुरुष का संग और घरका कार्य करे ॥ ३७ ॥ रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चांडाली द्वितीय दिन ब्रह्महत्यारी-तृतीय दिन रजकी (धोबिन) होती है पुनः चौथेदिन शुद्ध होती है ॥ ३८ ॥ यदि रजस्वला स्त्रीको श्वान अथवा शूद्र स्पर्श करले तो एकरात्रि उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होती है ॥ ३९ ॥ शय्या पर सोते समय स्त्री और पुरुष दोनों अशुद्ध होते हैं शय्या से उठ कर स्त्री शुद्ध होजाती है और पुरुष अशुद्ध होता है ॥ ४०॥ कांसे के पात्र से न तो कुल्ले करे और न पैर धोवे यदि करे तो वह अशुद्ध कांसे का पात्र भस्म से और तांबे का पात्र खटाई से शुद्ध होता है ॥ ४१ ॥ स्त्री रजोदर्शन से और नदी वेग से-तथा अत्यंत बिगड़ा वस्तु (पात्र आदि) भूमि में छः महीने र-