अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ | भाषाधर्मसंहिता ४
रोगेणयद्रजःस्त्रीणा-मत्यर्थंहिप्रवर्त्तते ।
अशुद्धास्तानतेनस्यु-स्तासांवैकारिकंहितत् ॥ ३६ ॥
साध्वाचारानतावत्स्या-द्रजोयावत्प्रवर्त्तते ।
वृत्तेरजसिगम्यास्त्री-गृहकर्मणिचेंद्रिये ॥ ३७ ॥
प्रथमेऽहनिचांडाली द्वितीयेब्रह्मघातिनी ।
तृतीयेरजकीप्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुध्यति ॥ ३८ ॥
रजस्वलायदास्पृष्टा शुनाशूद्रेणचैवहि ।
उपोष्यरजनीमेकां पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ३९ ॥
द्वावेतावशुचीस्यातां दंपती शयनंगतौ ।
शयनादुत्थितानारी शुचिःस्यादशुचिःपुमान् ॥४०॥
गंडूषंपादशौचंच नकुर्यात् कांस्यभाजने ।
भस्मनाशुद्ध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेनशुद्ध्यति ॥४१॥
रजसाशुद्ध्यतेनारी नदीवेगेनशुद्ध्यति ।
रोग से जो स्त्रियों के अत्यंत रज निकलता है उससे वे अशुद्ध नहीं होतीं क्योंकि वह उनका विकारी रज है ॥ ३६ ॥ जब तक रज की प्रवृत्ति रहे तब तक उत्तम आचरण न करे और रज की निवृत्ति होने पर पुरुष का संग और घरका कार्य करे ॥ ३७ ॥ रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चांडाली द्वितीय दिन ब्रह्महत्यारी-तृतीय दिन रजकी (धोबिन) होती है पुनः चौथेदिन शुद्ध होती है ॥ ३८ ॥ यदि रजस्वला स्त्रीको श्वान अथवा शूद्र स्पर्श करले तो एकरात्रि उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होती है ॥ ३९ ॥ शय्या पर सोते समय स्त्री और पुरुष दोनों अशुद्ध होते हैं शय्या से उठ कर स्त्री शुद्ध होजाती है और पुरुष अशुद्ध होता है ॥ ४०॥ कांसे के पात्र से न तो कुल्ले करे और न पैर धोवे यदि करे तो वह अशुद्ध कांसे का पात्र भस्म से और तांबे का पात्र खटाई से शुद्ध होता है ॥ ४१ ॥ स्त्री रजोदर्शन से और नदी वेग से-तथा अत्यंत बिगड़ा वस्तु (पात्र आदि) भूमि में छः महीने र-