अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअङ्गिरःस्मृतिः ॥ ३
भूमौनिःक्षिप्यषण्मास-मत्यंतोपहतंशुचि ॥ ४२ ॥
गवाघ्रातानिकांस्यानि शूद्रोच्छिष्टानियानितु ।
भस्मनादशभिःशुद्ध्ये-त्काकेनोपहतेतथा ॥ ४३ ॥
शौचं सौवर्णरौप्याणां वायुनाकेंदुरश्मिभिः ।
रजस्पृष्टंशवस्पृष्ट-माविकंचनशुद्ध्यति ॥ ४४ ॥
अद्भिर्मुदाचतन्मात्रं प्रक्षाल्यचविशुद्ध्यति ।
शुष्कमन्नमविप्रस्य भुक्त्वासप्ताहपृच्छति ॥ ४५ ॥
अन्नंव्यंजनसंयुक्त-मर्द्धमासेनशुद्ध्यति ।
पयोदधिचमासेन षण्मासेनघृतंतथा ॥ ४६ ॥
तैलंसंवत्सरेणैव कोष्ठेजीर्यतिमानवे ।
योभुंक्तेह्यवशूद्रान्नं मासमेकंनिरंतरम् ॥ ४७ ॥
इहजन्मनिश्शूद्रत्वं मृतःश्वाचाभिजायते ।
शूद्रान्नंशूद्रसंपर्कः शूद्रेणचसहासनम् ॥ ४८ ॥
शूद्राज्ज्ञानागमःकश्चि-ज्ज्वलंतमपिपातयेत् ।
खने से शुद्ध होते हैं ॥ ४२ ॥ गौने जिन को सूंघलिया हो अथवा जिन में शू-द्र ने खाया हो अथवा जिनको काक ने छू लिया हो ऐसे कांसे के पात्र दश दिन पर्यन्त भस्म से मांजने से शुद्ध होते हैं ॥ ४३ ॥ सोना और चांदी के पात्र वायु और सूर्य-तथा चन्द्रमा की किरणों से शुद्ध होते हैं-और स्त्री का रज तथा शव (मुर्दा) का स्पर्श जिन में हुआ हो ऐसा ऊन का वस्त्र शुद्ध नहीं होता ४४॥
मृत्तिका और जल से जितने ऊन के वस्त्र में उक्त अशुद्धि हुई हो उतने को ही धोने से शुद्ध होता है-ब्राह्मण से भिन्न के सूखे अन्न को भक्षण कर सात दिन व्रत करे ॥ ४५ ॥ व्यंजन (भाजी) संयुक्त अन्न खाकर पन्द्रह दिन के व्रत से और दूध वा दही खाकर एक मास के व्रत से और घी खाकर छः मास के व्रत से शुद्धि होती है ॥ ४६ ॥ मनुष्य के उदर में तेल एक वर्ष में पचता है जो निरन्तर एकमास पर्यन्त शूद्र के अन्न को खाता है ॥ ४७ ॥ वह इसी जन्म में शूद्र होता है तथा मर कर कुत्ता होता है-शूद्र का अन्न शूद्र का संग और शूद्र के संग एक आसन पर बैठना ॥ ४८ ॥ तथा शूद्र से किसी विद्या