भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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६ भाषार्थसहिता ॥

अप्रणामंगतैशूद्रैस्स्वस्तिकुर्व्वन्तियेद्विजाः ॥ ४९ ॥
शूद्रोपिनरकंयाति ब्राह्मणोपितथैवच ।
दशाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो द्वादशाहेनभूमिपः ॥५०॥
पाक्षिकंवैश्यएवाहुः शूद्रोमासेनशुद्ध्यति ।
अग्निहोत्रीतुयोविप्रः शूद्रान्नंचैवभोजयेत् ॥५१॥
पंचतस्यप्रणश्यन्ति चात्मावेदास्त्रयोऽग्नयः ।
शूद्रान्नेनतुभुक्तेन योद्विजोजनयेत्सुतान् ॥५२॥
यस्यान्नंतस्यतेपुत्रा अन्नाच्छुक्रंप्रवर्त्तते ।
शूद्रेणस्पृष्टमुच्छिष्टं प्रमादादथपाणिना ॥५३॥
तद्द्विजेभ्योनदातव्य-मापस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः ।
ब्राह्मणस्यसदाभुङ्क्ते क्षत्रियस्यचपर्व्वसु ॥५४॥
वैश्यंश्चापत्सुभुञ्जीत नशूद्रेपिकदाचन ।
ब्राह्मणान्नेदरिद्रत्वं क्षत्रियान्नेपशुस्तथा ॥५५॥


को ग्रहण करना ये तेजस्वी मनुष्य को भी पतित करते हैं शूद्र को प्रणाम कि- ये बिना ही जो द्विज आशीर्वाद देते हैं ॥ ४९ ॥ वह शूद्र और ब्राह्मण दोनों नरक में जाते हैं—दशदिन में ब्राह्मण बारह दिन में क्षत्री ॥५०॥ पन्द्रह दिन में वैश्य और एक मास में शूद्र जन्म और मृतक सम्बन्धी अशुद्धि से शुद्ध होते हैं—जो अग्निहोत्री ब्राह्मण शूद्र के अन्न को भक्षण करे ॥ ५१ ॥ उस का आत्मा-वेद और तीनों अग्नि--ये पांचों नष्ट होते हैं शूद्र के अन्नको खाकर जो द्विज पुत्रों को उत्पन्न करता है ॥५२॥ सो वे पुत्र उस के ही हैं जिस का अन्नथा क्योंकि अन्न से ही वीर्य उत्पन्न होता है, शूद्र ने प्रमाद से अपने हाथ से जिस अन्न का स्पर्श कर लिया हो उस छुये हुये को ॥५३॥ ब्राह्मणों को न दे यह आपस्तम्ब मुनि ने कहा है—ब्राह्मण के अन्न को सदा खावे— और क्षत्रिय के अन्न को पर्व में ॥ ५४ ॥ आपत्तिकाल में वैश्य के अन्न को परन्तु शूद्र के अन्न को कदापि न खावे ब्राह्मण के अन्न भक्षण करने से दरिद्री और क्षत्रिय के अन्न खाने से पशु ॥५५॥