अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
६ भाषार्थसहिता ॥
अप्रणामंगतैशूद्रैस्स्वस्तिकुर्व्वन्तियेद्विजाः ॥ ४९ ॥
शूद्रोपिनरकंयाति ब्राह्मणोपितथैवच ।
दशाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो द्वादशाहेनभूमिपः ॥५०॥
पाक्षिकंवैश्यएवाहुः शूद्रोमासेनशुद्ध्यति ।
अग्निहोत्रीतुयोविप्रः शूद्रान्नंचैवभोजयेत् ॥५१॥
पंचतस्यप्रणश्यन्ति चात्मावेदास्त्रयोऽग्नयः ।
शूद्रान्नेनतुभुक्तेन योद्विजोजनयेत्सुतान् ॥५२॥
यस्यान्नंतस्यतेपुत्रा अन्नाच्छुक्रंप्रवर्त्तते ।
शूद्रेणस्पृष्टमुच्छिष्टं प्रमादादथपाणिना ॥५३॥
तद्द्विजेभ्योनदातव्य-मापस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः ।
ब्राह्मणस्यसदाभुङ्क्ते क्षत्रियस्यचपर्व्वसु ॥५४॥
वैश्यंश्चापत्सुभुञ्जीत नशूद्रेपिकदाचन ।
ब्राह्मणान्नेदरिद्रत्वं क्षत्रियान्नेपशुस्तथा ॥५५॥
को ग्रहण करना ये तेजस्वी मनुष्य को भी पतित करते हैं शूद्र को प्रणाम कि- ये बिना ही जो द्विज आशीर्वाद देते हैं ॥ ४९ ॥ वह शूद्र और ब्राह्मण दोनों नरक में जाते हैं—दशदिन में ब्राह्मण बारह दिन में क्षत्री ॥५०॥ पन्द्रह दिन में वैश्य और एक मास में शूद्र जन्म और मृतक सम्बन्धी अशुद्धि से शुद्ध होते हैं—जो अग्निहोत्री ब्राह्मण शूद्र के अन्न को भक्षण करे ॥ ५१ ॥ उस का आत्मा-वेद और तीनों अग्नि--ये पांचों नष्ट होते हैं शूद्र के अन्नको खाकर जो द्विज पुत्रों को उत्पन्न करता है ॥५२॥ सो वे पुत्र उस के ही हैं जिस का अन्नथा क्योंकि अन्न से ही वीर्य उत्पन्न होता है, शूद्र ने प्रमाद से अपने हाथ से जिस अन्न का स्पर्श कर लिया हो उस छुये हुये को ॥५३॥ ब्राह्मणों को न दे यह आपस्तम्ब मुनि ने कहा है—ब्राह्मण के अन्न को सदा खावे— और क्षत्रिय के अन्न को पर्व में ॥ ५४ ॥ आपत्तिकाल में वैश्य के अन्न को परन्तु शूद्र के अन्न को कदापि न खावे ब्राह्मण के अन्न भक्षण करने से दरिद्री और क्षत्रिय के अन्न खाने से पशु ॥५५॥
अङ्गिरःस्मृतिः ॥ ९
वैश्यान्नेनतुशूद्रत्वं शूद्रान्नेनरकंध्रुवम् । अमृतंब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयःस्मृतम् ॥५६॥ वैश्यस्यचान्नमेवान्नं शूद्रान्नं रुधिरंध्रुवम् । दुष्कृतंहिमनुष्याणा-मन्नमाश्रित्यतिष्ठति ॥५७॥ योयस्यान्नं समश्नाति सतस्याश्नातिकिल्विषम् । सूतकेषुयदाविप्रो ब्रह्मचारीजितेन्द्रियः ॥५८॥ पिबेत्पानीयमज्ञानाद्- भुङ्क्तेभक्तमथापिवा । उत्तार्याचम्यउदक-मवतीर्यउपस्पृशेत् ॥५९॥ एवंहिसमुदाचारो वरुणेनाभिमन्त्रितः । अग्न्यागारेगवांगोष्ठे देवब्राह्मणसन्निधौ ॥६०॥ आहारेजपकालेच पादुकानांविसर्जनम् । पादुकासनमारूढो गेहात्पंचगृहंव्रजेत् ॥ ६१ ॥ छेदयेत्तस्यपादौतु धार्मिकःपृथिवीपतिः । अग्निहोत्रीतपस्वीच श्रोत्रियोवेदपारगः ॥ ६२ ॥
वैश्य के अन्नखाने से शूद्र और शूद्र के अन्नखाने से निश्चय नरक होता है—ब्राह्मण का अन्न अमृतकेतुल्य है और क्षत्रिय का अन्न दूध के सदृश है ॥५६॥ वैश्य का अन्न अन्न के तुल्यहैऔर शूद्र का अन्न निश्चय करकेरुधिर के तुल्य है मनुष्य का किया हुआ पाप अन्न में रहता है ॥५७॥ जो जिस के अन्न को भक्षण करता है वह उस के पाप को खाता है—यदि जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी ब्राह्मण सूतकों में ॥५८॥ अज्ञान से जल पीले अथवा भात खाले तो जल निकाल (वमन) कर आचमन करे पुनः प्राणायाम करके आचमन करे ॥५९॥ इस प्रकार सम्यक् वरुण के मन्त्रों से देह को अभिमन्त्रित करके अग्निकी शाला, गोशाला, देव तथा ब्राह्मणोंके समीप ॥६०॥ भोजन करने और जप करने के समय खड़ाउंओं को त्याग दे । यदि खड़ाउं पर चढ़कर सामान्य गृहस्थी पुरुष स्वगृह से अन्यपांचगृहों तक जावे ॥६१॥ तो धर्मिष्ठ राजा उसके पैरों को छेदन करे क्योंकि अग्निहोत्री, तपस्वी, वेदोक्तकर्मों का कर्त्ता और वेद का ज्ञाता ॥ ६२ ॥
१० भाषाधर्मसंहिता ॥
एतेवैपादुकेर्यान्ति शेषान्दण्डेनताडयेत् । जन्मप्रभृतिसंस्कारे चूडांतेभोजनंनवम् ॥ ६३ ॥
असपिंडेनभोक्तव्यं चूडस्यांतेविशेषतः । याचकान्नंनवश्राद्ध-मपिसूतकभोजनम् ॥ ६४ ॥
नारीप्रथमगर्भेषु भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् । अन्यदत्तातुकन्या पुनरन्यस्यदीयते ॥ ६५ ॥
तस्याश्चान्नंनभोक्तव्यं पुनर्भूःसाप्रगीयते । पूर्वञ्चस्रावितोयश्च गर्भोयश्चाप्यसंस्कृतः ॥ ६६ ॥
द्वितीयगर्भसंस्कार-स्तेनशुद्धिर्विधीयते । राजाद्यैर्दशभिर्मासैर्यावत्तिष्ठतिगुर्विणी ॥ ६७ ॥
तावद्रक्षाविधातव्या पुनरन्योविधीयते । भर्तुःशासनमुल्लंघ्य याचस्त्रीविप्रवर्तते ॥ ६८ ॥
तस्याश्चैवनभोक्तव्यं विज्ञेयाकामचारिणी ।
ये ही खड़ाऊं पर चलें इतर मनुष्यों को राजा दंड से ताड़ना करै—जन्म आदि जातकर्मादि संस्कार में चूड़ा कर्म में तथा अन्नप्राशन में ॥ ६३ ॥ अपने असपिंड के घर भोजन न खावै और चूड़ाकर्म में तो विशेष कर न करै—भिखारी का अन्न—नवश्राद्ध और सूतकका अन्न ॥ ६४ ॥ तथा स्त्री के पहिले गर्भाधान में भोजन कर चान्द्रायण प्रायश्चित करै—जो कन्या अन्य को देकर पुनः अन्य को दी जाती है ॥ ६५॥ उस का अन्न भी नहीं खाना चाहिये क्योंकि उसको पुनर्भू कहते हैं—यदि पहिला गर्भ या गर्भ गिरा दिया हो जिस का संस्कार न हुआ हो वह पात होजाय।६६॥ तो द्वितीय गर्भके संस्कार से शुद्धि विहित है जब तक वह स्त्री गर्भवती रहे तब तक राज आदि दश मासों तक ॥ ६७ ॥ रक्षा करनी चाहिये पुनः अन्य गर्भ होता है—पति की आज्ञा का उल्लङ्घन करके जो स्त्री बर्ताव करती ॥६८॥ और उस को कामचारिणी जानना
अङ्गिरःस्मृतिः ॥ १९
अनपत्या तु या नारी नाश्नीयात्तद्गृहेऽपि वै ॥ ६९ ॥ अथ भुंक्तं तु यो मोहात्पूयसं नरकं व्रजेत् । स्त्रिया धनं तु ये मोहादुपजीवंति मानवाः ॥ ७० ॥ स्त्रिया यानानि वासांसि ते पापा यांत्यधोगतिम् । राज्ञान्नं हरते तेजः शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ॥ ७१ ॥ सूतकेषु च यो भुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् ॥ सूतकेषु च यो भुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् ॥ ७२ ॥
इत्यंगिरसाप्रणीतं धर्मशास्त्रं संपूर्णम् ॥
चाहिये तथा जो स्त्री बंध्या हो उसके घर भी नहीं खावे ॥ ६९ ॥ तथा मोह से भोजन करता है तो वह पूय (पीब) नरक में जाता है स्त्री के धन से जो मनुष्य मोह से जीते (खाते) हैं ॥ ७० ॥ जो स्त्री का यान (सवारी) वस्त्रों को वर्तते हैं वे पापी अधोगति को प्राप्त होते हैं राजा का अन्न तेज को हरता है और शूद्र का अन्न ब्रह्मतेजको ॥ ७१ ॥ और जो सूतकों में किसी घर भोजन करता है वह पृथिवी के मल को खाता है ॥
इत्यंगिरसाप्रोक्तंधर्मशास्त्रं समाप्तम्
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अथयमस्मृतिप्रारंभः
श्रुतिस्मृत्युदितंधर्मं वर्णानामनुपूर्वशः ।
प्राब्रवीदृषिभिःपृष्टो मुनीनामग्रणीर्यमः ॥ १ ॥
योभुंजानोऽशुचिर्वापि चांडालपतितंस्पृशेत् ।
क्रोधादज्ञानतोवापि तस्यवक्ष्यामिनिष्कृतिम् ॥ २ ॥
षड्ररात्रंवात्रिरात्रंवा यथासंख्यंसमाचरेत् ।
स्नात्वात्रिषवणंविप्रः पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ३ ॥
भुंजानस्यतुविप्रस्य कदाचित्स्रवतेगुदम् ।
उच्छिष्टत्वेऽशुचित्वेच तस्यशौचंवनिर्दिशेत् ॥४॥
पूर्वं कृत्वाद्विजःशौचं पश्चादापउपस्पृशेत् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥५॥
निगिरन्यदिमेहेत भुक्त्वावामेहनेकृते ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा जुहुयात्सर्पिषाहुतिम् ॥ ६ ॥
यदाभोजनकालेस्या-दशुचिर्ब्राह्मणःक्वचित् ।
चारों वर्णों के श्रुति और स्मृति में कहे धर्म को ऋषियों के पूछने पर मुनियों में मुख्य यम ने क्रम से कहा ॥१॥ जो भोजन करता हुआ अथवा अशुद्ध दशा में पतित चांडाल को क्रोध अथवा अज्ञान से स्पर्श करले उसका प्रायश्चित्त कहते हैं ॥२॥ छः दिन अथवा तीन दिन क्रमशः प्रायश्चित्त करे तीन बार स्नान करके पंचगव्य पीने से ब्राह्मण की शुद्धि होती है ॥३॥ भोजन करते हुए ब्राह्मण की गुदा से मल निकल जाय तो उच्छिष्ट और अशुद्धि के निवारण के लिये शुद्धि करे ॥४॥ प्रथम ब्राह्मण गुद शुद्धि करके जल से स्नान करे और पुनः एक दिन और रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है ॥५॥ भोजन करते हुये अथवा भोजन करके शुद्धि से यदि पेशाब करे तो एक रात्रि दिन उपवास कर घीकी आहुति से होम करे ॥६॥ जो ब्राह्मण भोजन के समय कभी अशुद्ध
२ भाषार्थसहिता ॥
भूमौनिधायतद्ग्रासं स्नात्वाशुद्धिमवाप्नुयात् ॥ ७ ॥
भक्षयित्वातुतद्ग्रास-मुपवासेनशुद्ध्यति ।
अशित्वाचैवत्तत्सर्वं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ ८ ॥
अश्नतश्चेद्धिरेकःस्या-दस्वस्थस्त्रिशतंजपेत् ।
स्वस्थस्त्रीणिसहस्राणि गायत्र्याःशोधनंपरम् ॥९॥
चांडालैःश्वपचैःस्पृष्टो विण्मूत्रेचकृतेद्विजः ।
त्रिरात्रंतुप्रकुर्वीत भुक्त्वोच्छिष्टःषडाचरेत् ॥ १० ॥
उदक्यांसूतिकांवापि संस्पृशेदंत्यजोयदि ।
त्रिरात्रेणविशुद्धिःस्या-दितिशातातपोऽब्रवीत् ॥११॥
रजस्वलातुसंस्पृष्टा श्वमातंगादिवायसैः ।
निराहाराशुचिस्तिष्ठे त्कालस्नानेनशुद्ध्यति ॥१२॥
रजस्वलेयदानार्या-वन्योन्यंस्पृशतःक्वचित् ।
शुद्ध्यतःपंचगव्येन ब्रह्मकूर्चेनचोपरि ॥१३॥
होजावे तो उस कौर को पृथ्वी पर रखकर स्नान कर शुद्धि को प्राप्त होता है ॥७॥ जो उस ग्रास को भी खाले तो एक उपवास कर शुद्ध होता है और सब अन्न को खाले तो तीन दिन तक अशुद्ध रहता है ॥८॥ जो भोजन करते हुए वमन हो जाय तो अस्वस्थ (रोगी) तीन सौ गायत्री और स्वस्थ (नीरोग) तीन हजार गायत्री जपे यह गायत्री से परम शुद्धि होती है ॥९॥ जो विष्ठा और मूत्र त्यागने के पश्चात् चांडाल अथवा श्वपच द्विज का स्पर्श करलें तो तीन दिन और स्पर्श के अनन्तर भोजन करले तो छः दिन उपवास करे ॥१०॥ रजस्वला अथवा सूतिका स्त्रीको यदि अन्त्यज स्पर्श कर ले तो तीन दिन व्रत करने से शुद्धि होती है यह शातातप ऋषि ने कहा है ॥ ११॥ यदि रजस्वला स्त्री को कुत्ता हाथी वा कौआ स्पर्श करले तो अशुद्ध अवस्था में निराहार रहे और ४ थे दिन के स्नान से शुद्ध होती है ॥ १२ ॥ जो दो रजस्वला स्त्रीं परस्पर एकदूसरी का स्पर्श करलें तो पंचगव्य के पीने तथा ब्रह्मकूर्च (कुशाओं के मोटक) से पंचगव्य को अपने शरीर पर छिड़कने से शुद्ध होती हैं ॥ १३ ॥
यमस्मृतिः ॥ ३
उच्छिष्टेनचसंस्पृष्टा कदाचित्स्त्रीरजस्वला ।
कृच्छ्रेणशुद्धिमाप्नोति शूद्रादानोपवासतः ॥१४॥
अनुच्छिष्टेनसंस्पृष्टे दानंयेनविधीयते ।
तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥१५॥
ऋतौतुगर्भशंकित्वा स्नानमैथुनिनःस्मृतम् ।
अनृतौतुस्त्रियंगत्वा शौचंमूत्रपुरीषवत् ॥१६॥
उभावप्यशुचीस्यातां दंपतीशयनेगतौ ।
शयनादुत्थितानारी शुचिःस्यादशुचिःपुमान् ॥१७॥
भर्तुःशरीरशुश्रूषां दौरात्म्यादप्रकुर्वती ।
दंयाद्वादशकंनारी वर्षंत्याज्याधनंविना ॥१८॥
त्यजन्तोऽपतितान्बंधू-न्दंड्याउत्तमसाहसम् ।
पिताहिपतित कामं नतुमाताकदाचन ॥१९॥
कदाचित् जो रजस्वला स्त्री को उच्छिष्ट पुरुष स्पर्श करले तो द्विजां की स्त्री कृच्छ्र व्रत करने से और शूद्र की स्त्री दान तथा उपवास से शुद्धि को प्राप्त होती है ॥ १४ ॥ जिस अनुच्छिष्ट के स्पर्श करने से स्नान करना विधान किया है यदि वही उच्छिष्ट होकर स्पर्श करले तो प्राजापत्य व्रत प्रायश्चित्त करे ॥ १५ ॥ ऋतुकाल में गर्भ की इच्छा से जो मैथुन करता है उसे स्नान करना कहा है और ऋतु से भिन्न समय में स्त्री का संग करने से मल मूत्र के सदृश शुद्धि होती है। शय्या पर सोते हुए दोनों स्त्री और पुरुष अशुद्ध होते हैं शय्या से पृथक् होने पर स्त्री शुद्ध, और पुरुष अशुद्ध रहता है ॥१७॥ पति के शरीर की सेवा जो स्त्री कुबुद्धि से नहीं करती वह स्त्री बारह वर्ष तक धन के बिना त्याग देनी चाहिये ॥ १८॥ जो पतित हुये बिना ही बन्धु-ओं को त्याग देते हैं उन को राजा १ सहस्र पणा का दंड दे और पतित पिता भी यथेच्छ त्यागने योग्य है परन्तु माता कभी भी त्यागने योग्य नहीं ॥१९॥
२
४ भाषाथंसंहिता ॥
आत्मानंघातयेद्यस्तु रज्ज्वादिभिरुपक्रमैः ।
मृतोमेध्येनलेप्तव्यो जीवतोद्विशतंदमः ॥२०॥
दण्ड्यास्तत्पुत्रमित्राणि प्रत्येकंपणिकंदमम् ।
प्रायश्चित्तंततःकुर्यु-र्यथाशास्त्रप्रचोदितम् ॥२१॥
जलायुद्वंधनभ्रष्टाः प्रव्रज्यानाशनच्युताः ।
विषात्प्रपतनंप्रायः शस्त्रघातहताश्चये ॥ २२ ॥
नचैतेप्रत्यवसिताः सर्वलोकबहिष्कृताः ।
चांद्रायणेनशुद्ध्यंति तप्तकृच्छ्रद्वयेनवा ॥ २३ ॥
उभयावसितःपापः श्यामाच्छबलकाच्च्युतः ।
चांद्रायणाभ्यांशुद्धयेत दत्वाधेनुंतथावृषम् ॥ २४ ॥
श्वशृगालप्लवंगायै-र्मानुषैरचरतिंविना ।
दष्टःस्नात्वाशुचिःसद्यो दिवासन्ध्यासुरात्रिषु ॥ २५ ॥
अज्ञानाद्ब्राह्मणोभुक्त्वा चांडालात्नंकदाचन ।
जो पुरुष गले में फांसी लगाकर अथवा किसी अन्य प्रकार से आत्मघात करे और वह मरजाय तो उसे मलिन स्थल में गाड़ दे और न मरे तो उस पर दोसौ रुपये दंड करना चाहिये २०॥ तथा उस के पुत्र और मित्रों को भी एक २ पणिक (मुद्रा) दंडदे फिर वे सब शास्त्रविहित प्रायश्चित्त करें ॥२१॥ जलमेंडूबनेसे अथवा फांसी से जो बचगये और संन्यास धर्म के नाशक तथा उसके जो त्यागी हैं अथवाविष भक्षण से ऊंचे से गिरने से और शस्त्र के लगने से जो मरते२ बच गये हैं ॥२२॥ येपुरुष सर्व लोकों से बहिष्कृत और भोजन के योग्य नही रहते पुनः चांद्रायण अथवा तप्तकृच्छ्र व्रत से शुद्ध होते हैं ॥२३॥ उक्त पापियों के घर में भोजन करने वाला वा रहने वाला पापी पुरुष दो चान्द्रायण करे अथवा श्याम और शबल (कबरा) से भिन्न गौ वा बैल का दान करे ॥ २४ ॥ कुत्ता-सियार-वानर आदि जो मनुष्यों के संग क्रीड़ा के बिना काटें तो उसी समय दिन संध्या अथवा रात्रि में स्नान ही से शुद्ध होता है ॥ २५ ॥ कदाचित् अज्ञान से
यमस्मृतिः ॥ ५
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ २६ ॥
गोब्राह्मणगृहंदग्ध्वा मृतंचोद्वन्धनादिना ।
पाशंछित्त्वावथातस्य कृच्छ्रमेकंचरेद्विजः ॥ २७ ॥
चांडालपुल्कसानांच भुक्त्वागत्वाचयोषितम् ।
कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञाना-दज्ञानाद्दैवद्वयम् ॥ २८ ॥
कपालिकान्नभोक्तॄणां तन्नारीगामिनांतथा ।
कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञाना-दज्ञानाद्दैवद्वयम् ॥ २९ ॥
अगम्यागमनेविप्रोमद्यगोमांसभक्षणे ।
तप्तकृच्छ्रपरिक्षिप्तो मौर्वीहोमेनशुद्ध्यति ॥ ३० ॥
महापातककर्त्तार-श्चत्वारोथविशेषतः ।
अग्निंप्रविश्यशुद्ध्यंति स्थित्वावामहतिक्रतौ ॥ ३१ ॥
रहस्यकरणेष्वेवं मासमभ्यस्यपूरुषः ।
चाण्डाल के अन्न को ब्राह्मण खालेतो गोमूत्र और जौ को खाने से पंद्रह दिन में शुद्ध होता है ॥ २६ ॥ गोशाला और ब्राह्मण के घर को जो जला दे तथा फांसी लगाकर जो मरा हो उस को जो जलावे अथवा उसकी फांसी का छेदन करे तो वह द्विज एक कृच्छ्रव्रत करै ॥ २७ ॥ चांडाल वा पुल्कस ( चंडालका भेद ) के यहां जानकर भोजन करले अथवा इन की स्त्रियों का संग करे तो एक वर्ष तक कृच्छ्र व्रत करे और अज्ञान से भोजन करै तो दो चान्द्रायण व्रत करे ॥ २८ ॥ ज्ञान से कापालिकों का अन्न खाले अथवा उनकी स्त्रियों को भोगे तो एक वर्ष तक कृच्छ्र करे औ अज्ञान से दो चान्द्रायणव्रत करै ॥ २९ ॥ भगिनी आदि अगम्या स्त्री के संग गमन करने और मदिरा तथा गो मांस के खाने पर तप्तकृच्छ्र करके मौर्वी ( सूत्र ) के होम से ब्राह्मण शुद्ध होता है ॥ ३० ॥ ब्रह्महत्यादि चारों महापातक करने वाले विशेष कर तो अग्नि में प्रवेश करके अथवा बड़े यज्ञ ( अश्वमेध आदि ) करके शुद्ध होते हैं ॥ ३१ ॥ छिप कर भी इस प्रकार का महापात को पुरुष अघमर्षण सूक्त का एक मास
६ भाषार्थसहिता ॥
अघमर्षणसूक्तंवा शुद्धयेदंतर्जलेस्थितः ॥ ३२ ॥
रजकश्चर्मकश्चैव नटोबुरुडएवच ।
कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैतेऽन्त्यजाःस्मृताः ॥३३॥
भुक्त्वाचैषांस्त्रियोगत्वा पीत्वापःप्रतिगृह्यच ।
कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञाना-दज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥ ३४ ॥
मातरंगुरुपत्नींच स्वसृर्दुहितरंस्नुषाम् ।
गत्वाताःप्रविशेद्ग्निं नान्याशुद्धिर्विधीयते ॥ ३५ ॥
राज्ञींप्रत्रजितांधात्रीं तथावर्णोत्तमामपि ।
कृच्छ्रद्वयं प्रकुर्वीत सगोत्रामभिगम्यच ॥ ३६ ॥
अन्यासूपितृगोत्रासु मातृगोत्रगतास्वपि ।
परदारेषुसर्वेषु कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ ३७ ॥
वेश्याभिगमनेपापं व्यपोहंतिद्विजातयः ।
पीत्वासकृत्सुतप्तंच पंचरात्रंकुशोदकम् ॥ ३८ ॥
गुरुतल्पव्रतंकेचि-त्केचिद्ब्रह्महणोव्रतम् ।
पर्यन्त जल में बैठ कर जप करे तो शुद्ध होता है ॥ ३२ ॥ धोबी-चमार-नट बुरह-कैवर्त्त-मेद-भील-ये सात अंत्यज कहाते हैं ॥ ३३ ॥ इन के यहां भोजन-इनकी स्त्रियों के संग गमन-इन के घर का जल पान-ज्ञान से करके अथवा इन से दान लेकर एक वर्ष भर कृच्छ्र व्रत करे और अज्ञान से दो चान्द्रायण व्रत करे ॥ ३४ ॥ माता-गुरू की स्त्री-भगिनी पुत्री लड़के की स्त्री इनके संग गमन करके अग्नि में प्रवेश करे (मर जाय) अन्य शुद्धि नहीं है ॥३५॥ राणी-संन्यासिनी-धाय-और उत्तम वर्णों की स्त्री तथा अपने गोत्र की स्त्री इन के संग गमन करके दो कृच्छ्र करे ॥ ३६ ॥ अन्य जो माता और पिता के गोत्र की स्त्री है अथवा अन्य की स्त्री, इन सब के संग गमन करके सांतपन कृच्छ्र करे ॥३७॥ वेश्या के संग गमन करने के पाप को तीनों द्विजाति अत्यन्त तपे हुए कुशा के जल को पांच दिन तक प्रतिदिन एक बार पीकर व्रत करते हुए दूर करते हैं ॥ ३८ ॥ कोई ऋषि लोग गुरुपत्नी के गमन का कोई ब्रह्म
यमस्मृतिः ॥ ९
गोधनस्यकेचिदिच्छंति केचिच्चैवावकीर्णिनः ॥३९॥ दंडादूर्ध्वप्रहारेण यस्तुगांवनिपातयेत् । द्विगुणं गोव्रतंतस्य प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ४० अंगुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रप्रमाणकः । ॥ सार्द्रश्चसपलाशश्च गोदंडःपरिकीर्तितः ॥ ४१ ॥ गवांनिपातनेचैव गर्भोपिसंपतेद्यदि । एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं यथापूर्वंतथापुनः ॥ ४२ ॥ पादमृत्पन्नमात्रेतु द्वौपादौगात्रसंभवे । पा दोनंकृच्छ्रमाचष्टे हत्वागर्भमचेतनम् ॥ ४३ ॥ अंगप्रत्यंगसं पूर्णे गर्भेरेतः समन्विते । एकैकशश्चरेत्कृच्छ्र-मेषागोघ्नस्यनिष्कृतिः ॥ ४४ ॥ बंधनेरोधनेचैव पोषणेत्रागवांरुजा । संपद्यतेचेन्मरणं निमित्तीनैवलिप्यते ॥ ४५ ॥ मूर्छितःपतितोवापि दंडैनाभिहतस्तथा ।
हत्या का—कोई गोहत्या के व्रत का, और कोई अवकीर्णी (जो ब्रह्मचर्य से पतित हो) के व्रत का प्रायश्चित्त वेश्यागामी पुरुष के लिये मानते हैं ॥३९॥ दंड के प्रहार से जो गौ को मारे उसे गोहत्या का दूना प्रायश्चित्त बतावे॥४०॥ अंगूठे के समान मोटा और दो हाथ का जिस का प्रमाण हो ऐसा जो गीला और पत्तों समेत दंड उसे गोदंड कहते हैं ॥ ४१ ॥ गौओं के मारने से जो गौ-का गर्भ गिरजाय तो तीनों द्विजाति क्रम से एक २ कृच्छ्र करें ॥ ४२ ॥ गर्भ रहते ही जो गर्भपातहोजाय तो चौथाईकृच्छ्र और गर्भ की देह बने पर जो पात होय तो आधाकृच्छ्र और अचेतन गर्भ का पात होजाय तो पौन कृच्छ्र करै ॥ ४३ ॥ तथा यदि गौ को मारने से अंग (हाथ आदि)-प्रत्यंग (नखरोम आदि) से पूरा सचेत गर्भ गिर जाय तो तीनों वर्ण एक २ कृच्छ्र क-रैं, यह गोहत्या का प्रायश्चित्त कहा ॥ ४४ ॥ यदि गौओं के बांधने, रोकने, पा-लन पोषण करने, से रोग हो कर यदि गौ मरजाय तो बांधना आदि करने वाले को पाप नहीं लगता ॥४५॥ मूर्छाको प्राप्त अथवा गिरा हुआ—क्रोध के
भाषार्थसहिता ॥
उत्थायषट्पदंगच्छे-त्सप्तपंचदशापिवा ॥ ४६ ॥
ग्रासंवायदिगृह्णीया-त्तोयंवापिपिबेद्यदि ।
पूर्वव्याधिप्रणष्टानां प्रायश्चित्तन्नविद्यते ॥ ४७॥
काष्ठलोष्टाश्मभिर्गाव शस्त्रैर्वानिहतायदि ।
प्रायश्चित्तंकथंतत्र शस्त्रेशस्त्रेनिगद्यते ॥ ४८ ॥
काष्ठेसांतपनंकुर्यात् प्राजापत्यंतुलोष्टके ।
तप्तकृच्छ्रं तुपाषाणे शस्त्रेचाप्यतिकृच्छ्रकम् ॥४९ ॥
औषधंस्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषुच ।
दीयमानेविपत्तिःस्यात्प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ५० ॥
तैलभैषजपानेच भेषजानांचभक्षणे ।
निःशल्यकरणेचैव प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ५१ ॥
वत्सानांकंठबंधेन क्रियायाभेषजेनतु ।
सायंसंगोपनार्थंच नदोषोरोधबन्धयोः ॥ ५२ ॥
बिनाही चलानेके अर्थदंडसे धमकाने परगिरा कोई पशुयदि उठकरछः सात-पांच अथवा दश पग चलदे । ४६। अथवा ग्रास को खाले वा जल पीले, और पूर्व व्याधि से मर जाय तो उस का प्रायश्चित नहीं है ॥ ४७ ॥ काठ-डेला-पत्थर-वा-शस्त्रोंसे यदि गौ को मारे तो वहां शस्त्र२ के प्रति प्रायश्चित्त कहते हैं ॥४८॥ काठ से मारने पर सांतपन-डेले से प्राजापत्य-पत्थर मे तप्त-कृच्छ्र करे ॥४९॥ गौ और ब्राह्मण को औषध- स्नेह ( घी आदि ) पिलाते समय वा भोजन देने समय-यदि विपत्ति ( मरण वा कष्ट ) होजाय तो-प्रायश्चित्त नहीं है ॥५०॥ तैल अथवा औषध पिलाने-और औषध खिलाने-अथवा कांटा आदि निकालने के समय गौ को जो कष्ट होता है उसका भी प्रायश्चित्त नहीं है ॥ ५१ ॥ बछड़ों के गला बांधने में औषध के देनेमें और रक्षा के लिये संध्या को रोकने और बांधने में भी दोष नहीं है ॥ ५२ ॥
पादेचैवास्यरोमाणि द्विपादेश्मश्रु केवलम् ।
यमस्मृतिः ॥ ९
पादेचैवास्यरोमाणि द्विपादेश्मश्रु केवलम् ।
त्रिपादेतुशिखावर्जं मूलेसर्वंसमाचरेत्॥ ५३ ॥
सर्वांन्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदंगुलद्वयम् ।
एवमेवतुनारीणां मुंडमुंडायनंस्मृतम् ॥५४॥
नस्त्रियावपनंकार्यन्नचवीरासनंस्मृतम् ।
नचगोष्ठेनिवासास्ति नगच्छंतीमनुव्रजेत् ॥५५॥
राजावाराजपुत्रोवा ब्राह्मणोवाबहुश्रुतः ।
अकृत्वावपनंतेषां प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥५६॥
केशानांरक्षणार्थंच द्विगुणं व्रतमादिशेत् ।
द्विगुणेतुव्रतेचीर्णे द्विगुणैवतुदक्षिणा॥ ५७॥
द्विगुणं चेन्नदत्तं हि केशांश्चपरिरक्षयन् ।
पापं नक्षीयतेहंतुर्दाताचनरकंव्रजेत् ॥५८ ॥
अश्रौतस्मार्तविहितं प्रायश्चित्तंवदंतिये ।
तान्धर्मविघ्नकर्तॄंश्च राजादंडेिनपीडयेत् ॥५९॥
चौथाई कृच्छ्र करने में केवल रोमों का, और अर्द्धकृच्छ्र में केवल डाढी का और पौन कृच्छ्र में चोटी के विना सब तथा पूरा कृच्छ्र करने में चोटी सहित सब केशों का मुंडन पुरुष करावे ॥ ५३॥ स्त्रियां का मुंडन और मुंडवाना यह कहा है कि सब केशों को ऊपरको उभार कर दो २ अंगुल काट दे ॥५४ क्योंकि स्त्रियों का मुंडन और वीरासन से बैठना--और गोशालामें वास नहीं है और चलती गौके पीछे भी स्त्री न चलै ॥ ५५॥ राजा का पुत्र अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण इन का मुंडन नहीं करा कर प्रायश्चित्त बता देवे ॥५६॥ केशों को न मुंडाने की दशा में दूना व्रत करावे और दूना व्रत पूरा करने पर दूनी ही दक्षिणा देवे ॥५७॥ दूनी दक्षिणा दिये बिना यदि केशों की रक्षा करे तो मारने वाले का पाप नष्ट नहीं होता और प्रायश्चित्त देने वाला नरकमें जाता है ५८॥ वेद और धर्मशास्त्र में जो प्रायश्चित्त नहीं कहा है उस को जो पुरुष बतावें धर्म में विघ्न करने वाले उन पुरुषों को राजा दंड देवे ॥ ५९ ॥
९०
भाषार्थसहिता ॥
नचेत्तान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः ।
तत्पापंशतधाभूत्वा तमेवपरिसर्पति॥६०॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्।
विंशतिंगांवृषंचैकं दद्यात्तेषांचदक्षिणाम् ॥६१॥
कृमिभिर्व्रणसंभूतैर्मक्षिकाभिश्चपातितैः ।
कृच्छ्राद्धंसंप्रकुर्वीत शक्त्यादद्याच्चदक्षिणाम् ॥६२॥
प्रायश्चित्तंचकृत्वावै भोजयित्वाद्विजोत्तमान् ।
सुवर्णमाषकंदद्यात्ततःशुद्धिर्विधीयते ॥६३॥
चंडालश्वपचैःस्पृष्टे निशिस्नानंविधीयते ।
नवसेत्तत्ररात्रौतु सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ ६४ ॥
अथवसेद्यदारात्रौ अज्ञानाद्विचक्षणः ।
तदातस्यतुतत्पापं शतधापरिवर्त्तते ॥ ६५ ॥
उद्गच्छंतिहिनक्षत्राण्युपरिष्टाच्चयेग्रहाः ।
संस्पृष्टेरश्मिभिस्तेषामुदकेस्नानमाचरेत् ॥ ६६ ॥
यदि राजा अपने मोहवश होकर उनको दण्ड न दे तो वह पाप सौगुना होकर उस राजा को लगता है ॥६०॥
फिर प्रायश्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को जिमावे और बीशगौ और एक बैल उन ब्राह्मणों को दक्षिणा दे ॥६१॥
यदि किसी मनुष्य के शरीर में मक्खी बैठने से घाव में कीड़े पड़जायं तो अर्द्धकृच्छ्र प्रायश्चित्तकरे और यथाशक्ति दक्षिणा भी दे ॥ ६२ ॥
प्रायश्चित्त करके और ब्राह्मणों को जिमा कर एकमासा सोना देने से शुद्धि होती है ॥६३॥
चांडाल अथवा श्वपच रात में यदि छूले तो स्नान करना चाहिये । वहां रात में न बसे और शीघ्र स्नानकरनेसे शुद्ध होता है जो॥६४॥
मूर्खरात्रि को अज्ञान से बसे तो उस समय वह पाप सौ गुना उसको लगता है ॥ ६५ ॥
जो तारे वा ग्रह टूटते हुए ऊपर को जाते हैं उन तारों अथवा ग्रहों की किरणों से स्पर्श हो जाय तो जल में स्नान करे ॥ ६६ ॥
६
यमस्मृतिः ॥ १९
कुड्यांतर्जलवल्मीक मूषिकोत्करवत्मसु श्मशानेशौचशेषेषु नग्राह्याःसप्तमृत्तिकाः ॥६७॥ इष्टापूर्त्तन्कर्त्तव्यं ब्राह्मणेनप्रयत्नतः । इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्त्तेमोक्षंसमश्नुते ॥६८॥ वित्तापेक्षंभवेदिष्टं तडागंपूर्त्तमुच्यते । आरामञ्चविशेषेण देवद्रोण्यस्तथैवच ॥ ६९ ॥ वापीकूपतडागानि देवतायतनानिच पतितान्युद्धरेद्यस्तु सपूर्त्तफलमश्नुते ॥ ७० ॥ शुक्लायामूत्रंगृह्णीया-त्कृष्णायागोःशकृत्तथा । ताम्रायाश्चपयोग्राह्यं श्वेतायादधिचोच्यते ॥ ७१ ॥ कपिलायाघृतंग्राह्यं महापातकनाशनम् । सर्वतीर्थेनदीतोये कुशैर्र्व्यंपृथक्पृथक् ॥ ७२ ॥ आहृत्यप्रणवेनैव उत्थाप्यप्रणवेनच । प्रणवेनसमालोड्य प्रणवेनतुसंपिबेत् ॥ ७३ ॥
दीवाल के भीतर की-जल के मध्यकी-वामीकी-मूसों की खोदी-मार्ग की-श्मशान की और शौच की बची हुई इन सात स्थानों की मट्टी शुद्धि के लिये ग्रहण नहीं करनी चाहिये ॥६७॥ इष्ट (यज्ञ आदि) और पूर्त्त (कूप आदि) ब्राह्मण को बड़े प्रयत्न से करने चाहिये। इष्ट से स्वर्ग और पूर्त्त से मोक्ष प्राप्त होता है ॥६८॥ जैसा धन होवैगा ही यज्ञ होसकता है। और तालाब और विशेष कर बाग तथा देव द्रोणी (तीर्थ वा प्याव) इन्हें पूर्त कहते हैं ॥ ६९ ॥ बावड़ी-कुआ-तालाब और देवमंदिर-इतने यदि पतित (टूटे फूटे) हों तो इनका जो उद्धार (मरम्मत) कराने वाला है वह भी पूर्त के फल (मोक्ष) को भोगता है ॥ ७० ॥ सफेद गौका मूत्र-कालीका गोबर-लालका दूध-श्वेतका दही ॥७१॥ और कपिला का घी ले तो यह पंचगव्य महापातकों को नष्ट करता है-सब तीर्थों में वा नदीके जलमें इन गोमूत्र आदि द्रव्योंको पृथक् २ कुशाओं से ॥ ७२ ॥ प्रणव का जपकर इकट्ठा करै प्रणव पढ़ पढ़के उठाये और प्रणव का उच्चारण कर के ही पीवै ॥ ७३ ॥
द्वितीयेनास्तिदोषस्तु प्रथमेनैवशुद्ध्यति ॥ ७५ ॥
१२ माधवार्यसंहिता ॥
पलाशमध्यमेपर्णे भांडैताम्रमयेतथा । पिबेन्पुष्करपर्णेवा ताम्रेवामृन्मये शुभे ॥ ७४ ॥ सूतकेतुसमुत्पन्ने द्वितीयेसमुपस्थिते । द्वितीयेनास्तिदोषस्तु प्रथमेनैवशुद्ध्यति ॥ ७५ ॥ जातेनशुद्ध्यतेजातं मृतेनमृतकतथा । गर्भसंस्रवणेमासे त्रीण्यहानिविनिर्दिशेत् ॥ ७६ ॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभि-र्गर्भस्रावेविशुद्ध्यति । रजस्युपरतेसाध्वी स्नानेनस्त्रीरजस्वला ॥ ७७ ॥ स्वगोत्राद्भ्रश्यतेनारी विवाहात्सप्तमेपदे । स्वामिगोत्रेणकर्त्तव्या-स्तस्याःपिंडोदकक्रियाः ॥ ७८ ॥ द्वेपितुःपिंडदानंस्या--त्पिंडंपिंडद्विनाम ता । षण्णांदेयास्त्रयःपिंडा एवं दातानमुह्यति ॥ ७९ ॥ स्वेनभर्त्रासहश्राद्धं माताभुङ्क्त्वासदैवतम् ।
ढाक के बीचके पत्ते में वा तांबे के पात्र में वा कमल के पत्ते में अथवा लाल मिट्टी के पात्र में उस पंचगव्य को पीवे ॥७४॥ सूतक के होनेपर यदि दूसरा सूतक हो जाय तो दूसरे सूतक का दोष नहीं होता प्रथम के साथ उन की भी शुद्धि हो जाती है ॥७५॥ जन्म अशौच के संग जन्म अशौच की और सूतक अशौच के संग सूतक अशौच की शुद्धि हो सकती है । एक महीने के गर्भपात में तीन दिन की अशुद्धि होती है ॥७६॥ जितने मास का गर्भपात हो उतनी ही रात्रियों में शुद्धि होती है-और रज की निवृत्ति हुये पर सुपवित्रा रजस्वला स्त्री स्नान से शुद्ध होती है ॥७७॥ स्त्री विवाह के अनन्तर सप्तपदी होने पर अपने मा बाप के गोत्र से पृथक हो जाती है उस के बाद वह मर जावे तो पतिके गोत्र में ही उस का पिंड और जलदान आदि कर्म करना चाहिये ॥७८॥ पिता को दो पिण्ड दे और प्रत्येक पिण्ड में दो नाम (अपरलोक) आते हैं छः को तीन पिण्ड देने चाहिये ऐसे करने से पिण्डों का दाता मोहित नहीं होता ॥ ७९ ॥ माता और पितामही (दादी) और प्रपितामही (पड़दादी) ये तीनों अपने पतियों के संग देवता (विश्वेदेवा) समेत
यमस्मृतिः ॥ १३
पितामह्यापिस्वेनैव स्वेनैवप्रपितामही ॥ ८० ॥ वर्षेवर्षेतु कुर्वीत मातापित्रोस्तुसत्कृतिम् । अदैवंभोजयेच्छ्राद्धं पिंडमेकंतुनिर्वपेत् ॥ ८१ ॥ नित्यंनैमित्तिककाम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम् । पार्वणंचेतिविज्ञेयं श्राद्धंपंचविधंबुधैः ॥ ८२ ॥ ग्रहोपरागेसंक्रांतौ पर्वोत्सवेमहालये । निर्वपेत्त्रीन्नरःपिण्डा-नेकमेवमृतेहनि ॥ ८३ ॥ अनूढानपृथक्कन्या पिंडेगोत्रेचसूतके । पाणिग्रहणमन्त्राभ्यां स्वगोत्राद्भ्रश्यतेततः ॥ ८४ ॥ येनयेनतुवर्णेन याकन्यापरिणीयते । तत्समंसूतकंत्यत्ति तथापिंडोदकेपिच ॥ ८५ ॥ विवाहेचैवसंप्राप्ते चतुर्थेहनिरात्रिषु । एकत्वंसाभवेद्भर्तुः पिंडेगोत्रेचसूतके ॥ ८६ ॥ प्रथमेन्हिद्वितीयेवा तृतीयेवाचतुर्थके । अस्थिसंचयनंकार्यं बंधुभिर्हितबुद्धिभिः ॥८७ ॥
श्राद्ध को भोगती हैं ॥८०॥ (प्रतिवर्ष) माता और पिता का सत्कार (श्राद्ध) करे देवता (विश्वेदेवा) के बिना श्राद्ध जिमावे और एक पिण्ड दे ॥८१॥ नित्य नैमित्तिक काम्य वृद्धिश्राद्ध और पार्वण यह पांच प्रकार का श्राद्ध बुद्धिमान् जाने। ग्रहण-संक्रांति-पर्व-उत्सव-और महालय (कनागत) इनमें मनुष्यतीन पिण्ड दे और जिस दिन माता पिता आदि मरे हों उस दिन एक ही पिण्ड देवे ८३। बिना विवाही कन्या पिण्ड गोत्र और सूतकमें पृथक् नहीं है फिर विवाह के मन्त्रों से अपने गोत्र से पृथक् हो जाती है ॥८४॥ जिस २ वर्ण के पुरुषके संग जिस कन्या का विवाह हो उसी वर्णके समान सूतक और पिण्ड वा जलदान को प्राप्त होती है ८५ विवाह हुये पश्चात् वह कन्या चौथे दिन रात्रि में पिण्ड-गोत्र, और सूतक में पति की एकता को प्राप्त होती (अर्थात् चतुर्थी कर्म का होम होने पर कन्या पति के गोत्र में मिल जाती है) ॥ ८६ ॥ पहले दूसरे तीसरे अथवा चौथे दिन हितकारी बन्धु अस्थिसंचयन करें ॥८७॥
चतुर्थेपंचमेचैव सप्तमेनवमेतथा ।
१४ पाराशर्यसंहिता ॥
चतुर्थेपंचमेचैव सप्तमेनवमेतथा ।
अस्थिसंचयनंप्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥ ८८ ॥
एकादशाहेप्रेतस्य यस्यचोत्सृज्यतेवृषः ।
मुच्यतेप्रेतलोकात्सः स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ८६ ॥
नाभिमात्रेजलस्थित्वा हृदयेनानुचिंतयेत् ।
आगच्छंतुमेपितरो गृह्णंत्वेतान्जलांजलीन् ॥ ६०
हस्तौकृत्वातुसंयुक्तौ पूरयित्वाजलेनच ।
गोशृंगमात्रमुद्धृत्य जलमध्येजलं क्षिपेत् ॥६२ ॥
आकाशेचक्षिपेद्वारि वारिस्थोदक्षिणामुखः ।
पितॄणांस्थानमाकाशं दक्षिणादिक्कृतथैवच ॥६२॥
आपोदेवगणाःप्रोक्ता आपःपितृगणास्तथा।
तस्मादप्सुजलं देयं पितॄणांहितमिच्छता ॥६३ ॥
दिवासूर्यांशुभिस्तप्तं रात्रौनक्षत्रमारुतैः ।
चौथे-पांचवें-सातवें-नवमें-दिन क्रम से ब्राह्मण क्षत्रिय ५-वैश्यऽ-शूद्र-को अस्थि संचयन करना कहा है ॥८८॥ जिस मरे पुरुष के लिये ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्गकिया जाता है वह प्रेत, प्रेतलोक से छूट कर स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है ॥ ८९ ॥ नाभि (टूंड़ी) तक जल में घुसकर और मन से यह-चिंता (स्मरण) करे कि मेरे पितर आवें और ये जल की अंजली ग्रहण करें ॥ ९० ॥ दोनों हाथ मिलाकर और जल से भरकर गौके सींग के प्रमाण हाथ ऊंचा उठा कर जल के बीच में जल को फेंक दे ॥ ९१॥ दक्षिणदिशा की ओर मुख कर जल में खड़ा हुआ पुरुष आकाश में जल को फेंके क्यों कि आकाश और दक्षिण दिशा ये दोनों पितरों का स्थान हैं ॥ ९२॥ देवता और पितरों के गण जल रूप ही हैं उस से जो पितरों के हित की इच्छा करै वह जल में ही जल दे (तर्पण करै ) ॥ ९३ ॥ दिनमें सूर्य की किरणों से तप्त-और रात में नक्षत्र तथा पवन से और संध्या के समय इन दोनों से जल सदा
यमस्मृतिः ॥ १५
संध्ययोरप्युभाभ्यांच पवित्रंसर्वदाजलम् ॥९४ ॥
स्वभावयुक्तमव्याप्त ममेध्येनसदाशुचिः ।
भांडस्थं धरणीस्थंवा पवित्रंसर्वदाजलम् ॥९५॥
देवतानांपितॄणांच जलेदद्याज्जलांजलीन् ।
असंस्कृतप्रमीतानां स्थलेदद्याज्जलांजलीन् ॥९६ ॥
श्राद्धे हवनकालेच दद्यादेकेनपाणिना ।
उभाभ्यांतर्पणेदद्या-दितिधर्मोव्यवस्थितः ॥ ९७ ॥
इतियमप्रणीतं धर्मशास्त्रं समाप्तम्
पवित्र है ॥ ९४ ॥ अपवित्र वस्तु जिस में न मिली हो ऐसा स्वाभाविक जल सदा पवित्र है पात्र का हो अथवा भूमि पर का हो जल सदा पवित्र है॥९५॥
देवता और पितरों को तो जल में जल की अंजली दे और जो संस्कार (यज्ञोपवीत) से पूर्व ही मरगये हैं उन को स्थल में दे ॥९६ ॥
श्राद्ध और होम के समय एक हाथ से अंजली दे और तर्पण में दोनों हाथों से यह धर्म की व्यवस्था है ॥ ९७ ॥
इति यमप्रणीते धर्मशास्त्रे भाषार्थः समाप्तः ॥