अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४ भाषाथंसंहिता ॥
आत्मानंघातयेद्यस्तु रज्ज्वादिभिरुपक्रमैः ।
मृतोमेध्येनलेप्तव्यो जीवतोद्विशतंदमः ॥२०॥
दण्ड्यास्तत्पुत्रमित्राणि प्रत्येकंपणिकंदमम् ।
प्रायश्चित्तंततःकुर्यु-र्यथाशास्त्रप्रचोदितम् ॥२१॥
जलायुद्वंधनभ्रष्टाः प्रव्रज्यानाशनच्युताः ।
विषात्प्रपतनंप्रायः शस्त्रघातहताश्चये ॥ २२ ॥
नचैतेप्रत्यवसिताः सर्वलोकबहिष्कृताः ।
चांद्रायणेनशुद्ध्यंति तप्तकृच्छ्रद्वयेनवा ॥ २३ ॥
उभयावसितःपापः श्यामाच्छबलकाच्च्युतः ।
चांद्रायणाभ्यांशुद्धयेत दत्वाधेनुंतथावृषम् ॥ २४ ॥
श्वशृगालप्लवंगायै-र्मानुषैरचरतिंविना ।
दष्टःस्नात्वाशुचिःसद्यो दिवासन्ध्यासुरात्रिषु ॥ २५ ॥
अज्ञानाद्ब्राह्मणोभुक्त्वा चांडालात्नंकदाचन ।
जो पुरुष गले में फांसी लगाकर अथवा किसी अन्य प्रकार से आत्मघात करे और वह मरजाय तो उसे मलिन स्थल में गाड़ दे और न मरे तो उस पर दोसौ रुपये दंड करना चाहिये २०॥ तथा उस के पुत्र और मित्रों को भी एक २ पणिक (मुद्रा) दंडदे फिर वे सब शास्त्रविहित प्रायश्चित्त करें ॥२१॥ जलमेंडूबनेसे अथवा फांसी से जो बचगये और संन्यास धर्म के नाशक तथा उसके जो त्यागी हैं अथवाविष भक्षण से ऊंचे से गिरने से और शस्त्र के लगने से जो मरते२ बच गये हैं ॥२२॥ येपुरुष सर्व लोकों से बहिष्कृत और भोजन के योग्य नही रहते पुनः चांद्रायण अथवा तप्तकृच्छ्र व्रत से शुद्ध होते हैं ॥२३॥ उक्त पापियों के घर में भोजन करने वाला वा रहने वाला पापी पुरुष दो चान्द्रायण करे अथवा श्याम और शबल (कबरा) से भिन्न गौ वा बैल का दान करे ॥ २४ ॥ कुत्ता-सियार-वानर आदि जो मनुष्यों के संग क्रीड़ा के बिना काटें तो उसी समय दिन संध्या अथवा रात्रि में स्नान ही से शुद्ध होता है ॥ २५ ॥ कदाचित् अज्ञान से