भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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यमस्मृतिः ॥

उच्छिष्टेनचसंस्पृष्टा कदाचित्स्त्रीरजस्वला ।
कृच्छ्रेणशुद्धिमाप्नोति शूद्रादानोपवासतः ॥१४॥
अनुच्छिष्टेनसंस्पृष्टे दानंयेनविधीयते ।
तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥१५॥
ऋतौतुगर्भशंकित्वा स्नानमैथुनिनःस्मृतम् ।
अनृतौतुस्त्रियंगत्वा शौचंमूत्रपुरीषवत् ॥१६॥
उभावप्यशुचीस्यातां दंपतीशयनेगतौ ।
शयनादुत्थितानारी शुचिःस्यादशुचिःपुमान् ॥१७॥
भर्तुःशरीरशुश्रूषां दौरात्म्यादप्रकुर्वती ।
दंयाद्वादशकंनारी वर्षंत्याज्याधनंविना ॥१८॥
त्यजन्तोऽपतितान्बंधू-न्दंड्याउत्तमसाहसम् ।
पिताहिपतित कामं नतुमाताकदाचन ॥१९॥


कदाचित् जो रजस्वला स्त्री को उच्छिष्ट पुरुष स्पर्श करले तो द्विजां की स्त्री कृच्छ्र व्रत करने से और शूद्र की स्त्री दान तथा उपवास से शुद्धि को प्राप्त होती है ॥ १४ ॥ जिस अनुच्छिष्ट के स्पर्श करने से स्नान करना विधान किया है यदि वही उच्छिष्ट होकर स्पर्श करले तो प्राजापत्य व्रत प्रायश्चित्त करे ॥ १५ ॥ ऋतुकाल में गर्भ की इच्छा से जो मैथुन करता है उसे स्नान करना कहा है और ऋतु से भिन्न समय में स्त्री का संग करने से मल मूत्र के सदृश शुद्धि होती है। शय्या पर सोते हुए दोनों स्त्री और पुरुष अशुद्ध होते हैं शय्या से पृथक् होने पर स्त्री शुद्ध, और पुरुष अशुद्ध रहता है ॥१७॥ पति के शरीर की सेवा जो स्त्री कुबुद्धि से नहीं करती वह स्त्री बारह वर्ष तक धन के बिना त्याग देनी चाहिये ॥ १८॥ जो पतित हुये बिना ही बन्धु-ओं को त्याग देते हैं उन को राजा १ सहस्र पणा का दंड दे और पतित पिता भी यथेच्छ त्यागने योग्य है परन्तु माता कभी भी त्यागने योग्य नहीं ॥१९॥