अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ पाराशर्यसंहिता ॥
चतुर्थेपंचमेचैव सप्तमेनवमेतथा ।
अस्थिसंचयनंप्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥ ८८ ॥
एकादशाहेप्रेतस्य यस्यचोत्सृज्यतेवृषः ।
मुच्यतेप्रेतलोकात्सः स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ८६ ॥
नाभिमात्रेजलस्थित्वा हृदयेनानुचिंतयेत् ।
आगच्छंतुमेपितरो गृह्णंत्वेतान्जलांजलीन् ॥ ६०
हस्तौकृत्वातुसंयुक्तौ पूरयित्वाजलेनच ।
गोशृंगमात्रमुद्धृत्य जलमध्येजलं क्षिपेत् ॥६२ ॥
आकाशेचक्षिपेद्वारि वारिस्थोदक्षिणामुखः ।
पितॄणांस्थानमाकाशं दक्षिणादिक्कृतथैवच ॥६२॥
आपोदेवगणाःप्रोक्ता आपःपितृगणास्तथा।
तस्मादप्सुजलं देयं पितॄणांहितमिच्छता ॥६३ ॥
दिवासूर्यांशुभिस्तप्तं रात्रौनक्षत्रमारुतैः ।
चौथे-पांचवें-सातवें-नवमें-दिन क्रम से ब्राह्मण क्षत्रिय ५-वैश्यऽ-शूद्र-को अस्थि संचयन करना कहा है ॥८८॥ जिस मरे पुरुष के लिये ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्गकिया जाता है वह प्रेत, प्रेतलोक से छूट कर स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है ॥ ८९ ॥ नाभि (टूंड़ी) तक जल में घुसकर और मन से यह-चिंता (स्मरण) करे कि मेरे पितर आवें और ये जल की अंजली ग्रहण करें ॥ ९० ॥ दोनों हाथ मिलाकर और जल से भरकर गौके सींग के प्रमाण हाथ ऊंचा उठा कर जल के बीच में जल को फेंक दे ॥ ९१॥ दक्षिणदिशा की ओर मुख कर जल में खड़ा हुआ पुरुष आकाश में जल को फेंके क्यों कि आकाश और दक्षिण दिशा ये दोनों पितरों का स्थान हैं ॥ ९२॥ देवता और पितरों के गण जल रूप ही हैं उस से जो पितरों के हित की इच्छा करै वह जल में ही जल दे (तर्पण करै ) ॥ ९३ ॥ दिनमें सूर्य की किरणों से तप्त-और रात में नक्षत्र तथा पवन से और संध्या के समय इन दोनों से जल सदा