अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंयमस्मृतिः ॥ १३
पितामह्यापिस्वेनैव स्वेनैवप्रपितामही ॥ ८० ॥ वर्षेवर्षेतु कुर्वीत मातापित्रोस्तुसत्कृतिम् । अदैवंभोजयेच्छ्राद्धं पिंडमेकंतुनिर्वपेत् ॥ ८१ ॥ नित्यंनैमित्तिककाम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम् । पार्वणंचेतिविज्ञेयं श्राद्धंपंचविधंबुधैः ॥ ८२ ॥ ग्रहोपरागेसंक्रांतौ पर्वोत्सवेमहालये । निर्वपेत्त्रीन्नरःपिण्डा-नेकमेवमृतेहनि ॥ ८३ ॥ अनूढानपृथक्कन्या पिंडेगोत्रेचसूतके । पाणिग्रहणमन्त्राभ्यां स्वगोत्राद्भ्रश्यतेततः ॥ ८४ ॥ येनयेनतुवर्णेन याकन्यापरिणीयते । तत्समंसूतकंत्यत्ति तथापिंडोदकेपिच ॥ ८५ ॥ विवाहेचैवसंप्राप्ते चतुर्थेहनिरात्रिषु । एकत्वंसाभवेद्भर्तुः पिंडेगोत्रेचसूतके ॥ ८६ ॥ प्रथमेन्हिद्वितीयेवा तृतीयेवाचतुर्थके । अस्थिसंचयनंकार्यं बंधुभिर्हितबुद्धिभिः ॥८७ ॥
श्राद्ध को भोगती हैं ॥८०॥ (प्रतिवर्ष) माता और पिता का सत्कार (श्राद्ध) करे देवता (विश्वेदेवा) के बिना श्राद्ध जिमावे और एक पिण्ड दे ॥८१॥ नित्य नैमित्तिक काम्य वृद्धिश्राद्ध और पार्वण यह पांच प्रकार का श्राद्ध बुद्धिमान् जाने। ग्रहण-संक्रांति-पर्व-उत्सव-और महालय (कनागत) इनमें मनुष्यतीन पिण्ड दे और जिस दिन माता पिता आदि मरे हों उस दिन एक ही पिण्ड देवे ८३। बिना विवाही कन्या पिण्ड गोत्र और सूतकमें पृथक् नहीं है फिर विवाह के मन्त्रों से अपने गोत्र से पृथक् हो जाती है ॥८४॥ जिस २ वर्ण के पुरुषके संग जिस कन्या का विवाह हो उसी वर्णके समान सूतक और पिण्ड वा जलदान को प्राप्त होती है ८५ विवाह हुये पश्चात् वह कन्या चौथे दिन रात्रि में पिण्ड-गोत्र, और सूतक में पति की एकता को प्राप्त होती (अर्थात् चतुर्थी कर्म का होम होने पर कन्या पति के गोत्र में मिल जाती है) ॥ ८६ ॥ पहले दूसरे तीसरे अथवा चौथे दिन हितकारी बन्धु अस्थिसंचयन करें ॥८७॥