अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंयमस्मृतिः ॥ १९
कुड्यांतर्जलवल्मीक मूषिकोत्करवत्मसु श्मशानेशौचशेषेषु नग्राह्याःसप्तमृत्तिकाः ॥६७॥ इष्टापूर्त्तन्कर्त्तव्यं ब्राह्मणेनप्रयत्नतः । इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्त्तेमोक्षंसमश्नुते ॥६८॥ वित्तापेक्षंभवेदिष्टं तडागंपूर्त्तमुच्यते । आरामञ्चविशेषेण देवद्रोण्यस्तथैवच ॥ ६९ ॥ वापीकूपतडागानि देवतायतनानिच पतितान्युद्धरेद्यस्तु सपूर्त्तफलमश्नुते ॥ ७० ॥ शुक्लायामूत्रंगृह्णीया-त्कृष्णायागोःशकृत्तथा । ताम्रायाश्चपयोग्राह्यं श्वेतायादधिचोच्यते ॥ ७१ ॥ कपिलायाघृतंग्राह्यं महापातकनाशनम् । सर्वतीर्थेनदीतोये कुशैर्र्व्यंपृथक्पृथक् ॥ ७२ ॥ आहृत्यप्रणवेनैव उत्थाप्यप्रणवेनच । प्रणवेनसमालोड्य प्रणवेनतुसंपिबेत् ॥ ७३ ॥
दीवाल के भीतर की-जल के मध्यकी-वामीकी-मूसों की खोदी-मार्ग की-श्मशान की और शौच की बची हुई इन सात स्थानों की मट्टी शुद्धि के लिये ग्रहण नहीं करनी चाहिये ॥६७॥ इष्ट (यज्ञ आदि) और पूर्त्त (कूप आदि) ब्राह्मण को बड़े प्रयत्न से करने चाहिये। इष्ट से स्वर्ग और पूर्त्त से मोक्ष प्राप्त होता है ॥६८॥ जैसा धन होवैगा ही यज्ञ होसकता है। और तालाब और विशेष कर बाग तथा देव द्रोणी (तीर्थ वा प्याव) इन्हें पूर्त कहते हैं ॥ ६९ ॥ बावड़ी-कुआ-तालाब और देवमंदिर-इतने यदि पतित (टूटे फूटे) हों तो इनका जो उद्धार (मरम्मत) कराने वाला है वह भी पूर्त के फल (मोक्ष) को भोगता है ॥ ७० ॥ सफेद गौका मूत्र-कालीका गोबर-लालका दूध-श्वेतका दही ॥७१॥ और कपिला का घी ले तो यह पंचगव्य महापातकों को नष्ट करता है-सब तीर्थों में वा नदीके जलमें इन गोमूत्र आदि द्रव्योंको पृथक् २ कुशाओं से ॥ ७२ ॥ प्रणव का जपकर इकट्ठा करै प्रणव पढ़ पढ़के उठाये और प्रणव का उच्चारण कर के ही पीवै ॥ ७३ ॥