अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 805 में से
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भाषार्थसहिता ॥
नचेत्तान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः ।
तत्पापंशतधाभूत्वा तमेवपरिसर्पति॥६०॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्।
विंशतिंगांवृषंचैकं दद्यात्तेषांचदक्षिणाम् ॥६१॥
कृमिभिर्व्रणसंभूतैर्मक्षिकाभिश्चपातितैः ।
कृच्छ्राद्धंसंप्रकुर्वीत शक्त्यादद्याच्चदक्षिणाम् ॥६२॥
प्रायश्चित्तंचकृत्वावै भोजयित्वाद्विजोत्तमान् ।
सुवर्णमाषकंदद्यात्ततःशुद्धिर्विधीयते ॥६३॥
चंडालश्वपचैःस्पृष्टे निशिस्नानंविधीयते ।
नवसेत्तत्ररात्रौतु सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ ६४ ॥
अथवसेद्यदारात्रौ अज्ञानाद्विचक्षणः ।
तदातस्यतुतत्पापं शतधापरिवर्त्तते ॥ ६५ ॥
उद्गच्छंतिहिनक्षत्राण्युपरिष्टाच्चयेग्रहाः ।
संस्पृष्टेरश्मिभिस्तेषामुदकेस्नानमाचरेत् ॥ ६६ ॥
यदि राजा अपने मोहवश होकर उनको दण्ड न दे तो वह पाप सौगुना होकर उस राजा को लगता है ॥६०॥
फिर प्रायश्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को जिमावे और बीशगौ और एक बैल उन ब्राह्मणों को दक्षिणा दे ॥६१॥
यदि किसी मनुष्य के शरीर में मक्खी बैठने से घाव में कीड़े पड़जायं तो अर्द्धकृच्छ्र प्रायश्चित्तकरे और यथाशक्ति दक्षिणा भी दे ॥ ६२ ॥
प्रायश्चित्त करके और ब्राह्मणों को जिमा कर एकमासा सोना देने से शुद्धि होती है ॥६३॥
चांडाल अथवा श्वपच रात में यदि छूले तो स्नान करना चाहिये । वहां रात में न बसे और शीघ्र स्नानकरनेसे शुद्ध होता है जो॥६४॥
मूर्खरात्रि को अज्ञान से बसे तो उस समय वह पाप सौ गुना उसको लगता है ॥ ६५ ॥
जो तारे वा ग्रह टूटते हुए ऊपर को जाते हैं उन तारों अथवा ग्रहों की किरणों से स्पर्श हो जाय तो जल में स्नान करे ॥ ६६ ॥
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