अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६ भाषार्थसहिता ॥
अघमर्षणसूक्तंवा शुद्धयेदंतर्जलेस्थितः ॥ ३२ ॥
रजकश्चर्मकश्चैव नटोबुरुडएवच ।
कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैतेऽन्त्यजाःस्मृताः ॥३३॥
भुक्त्वाचैषांस्त्रियोगत्वा पीत्वापःप्रतिगृह्यच ।
कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञाना-दज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥ ३४ ॥
मातरंगुरुपत्नींच स्वसृर्दुहितरंस्नुषाम् ।
गत्वाताःप्रविशेद्ग्निं नान्याशुद्धिर्विधीयते ॥ ३५ ॥
राज्ञींप्रत्रजितांधात्रीं तथावर्णोत्तमामपि ।
कृच्छ्रद्वयं प्रकुर्वीत सगोत्रामभिगम्यच ॥ ३६ ॥
अन्यासूपितृगोत्रासु मातृगोत्रगतास्वपि ।
परदारेषुसर्वेषु कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ ३७ ॥
वेश्याभिगमनेपापं व्यपोहंतिद्विजातयः ।
पीत्वासकृत्सुतप्तंच पंचरात्रंकुशोदकम् ॥ ३८ ॥
गुरुतल्पव्रतंकेचि-त्केचिद्ब्रह्महणोव्रतम् ।
पर्यन्त जल में बैठ कर जप करे तो शुद्ध होता है ॥ ३२ ॥ धोबी-चमार-नट बुरह-कैवर्त्त-मेद-भील-ये सात अंत्यज कहाते हैं ॥ ३३ ॥ इन के यहां भोजन-इनकी स्त्रियों के संग गमन-इन के घर का जल पान-ज्ञान से करके अथवा इन से दान लेकर एक वर्ष भर कृच्छ्र व्रत करे और अज्ञान से दो चान्द्रायण व्रत करे ॥ ३४ ॥ माता-गुरू की स्त्री-भगिनी पुत्री लड़के की स्त्री इनके संग गमन करके अग्नि में प्रवेश करे (मर जाय) अन्य शुद्धि नहीं है ॥३५॥ राणी-संन्यासिनी-धाय-और उत्तम वर्णों की स्त्री तथा अपने गोत्र की स्त्री इन के संग गमन करके दो कृच्छ्र करे ॥ ३६ ॥ अन्य जो माता और पिता के गोत्र की स्त्री है अथवा अन्य की स्त्री, इन सब के संग गमन करके सांतपन कृच्छ्र करे ॥३७॥ वेश्या के संग गमन करने के पाप को तीनों द्विजाति अत्यन्त तपे हुए कुशा के जल को पांच दिन तक प्रतिदिन एक बार पीकर व्रत करते हुए दूर करते हैं ॥ ३८ ॥ कोई ऋषि लोग गुरुपत्नी के गमन का कोई ब्रह्म