अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४ | भाषार्थसंहिता ॥ |
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दत्वाप्रदक्षिणं कुर्याज्जलंसंस्पृष्टाविशुद्ध्यति ।
पूर्वां संध्यां सनक्षत्रा-मुपासीतयथाविधि ॥ १८ ॥
गायत्रीमभ्यसेत्तावद् यावदादित्यदर्शनम् ।
उपास्य पश्चिमां संध्यां सादित्यांचयथाविधि ॥ १९ ॥
गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावत्ताराणिपश्यति ।
ततश्चावसथंप्राप्य कृत्वाहौमंरवंयंबुधः ॥ २० ॥
सञ्चिन्तयपोषव्यवर्गस्य भरणार्थंविचक्षणः ।
ततःशिष्यहितार्थाय स्वाध्यायंकिञ्चिदाचरेत् ॥२१॥
ईश्वरंचैवकार्यार्थ मभिगच्छेद्विजोत्तमः ।
कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्वादूरंसमाहरेत् ॥२२॥
ततोमाध्यान्हिकंकुर्याच्छुचौदेशेमनोरमे ।
विधिंतस्यप्रवक्ष्यामि समासात्पापनाशनम् ॥२३॥
स्नात्वायॆनविधानेन मुच्यतेसर्वकिल्विषात् ।
देकर प्रदक्षिणा करै फिर जल का स्पर्श कर के शुद्ध होता है। प्रातःकाल की सन्ध्या का उस समय विधि से आरम्भ करे जब आकाश में नक्षत्र दीखते हों ॥१८॥ फिर सूर्य का दर्शन होने समय तक खड़े हो के गायत्री का जपकरै। सायं-काल की संध्या को सूर्य के अस्त से पूर्व ही विधि से आरम्भ करके ॥१९॥ तारा गण दीखने समय तक बैठ के गायत्री का जप करे—फिर गृह्याग्नि के पास जाकर शास्त्रोक्त विधि से ज्ञानवान् द्विज स्वयं होम करै ॥ २० ॥ विचारशील पुरुष पुत्र भृत्य आदि के खान पान के अर्थ चिन्ता करके फिर शिष्य के हित के लिये कुछ वेद पाठ करे ॥२१॥ और ब्राह्मण संसारी कार्य के लिये ईश्वर नाम राजा के यहां जाय । तथा दूर जाकर कुशा, फल, इन्धन समिधा आदि को लाया करे ॥ २२ ॥ फिर शुद्ध एकान्त देश में जाकर मध्याह्न दोपहर का सन्ध्यादि कर्म करे । उसके पाप नाशक विधान को संक्षेप से कहिं गे ॥ २३ ॥ जिस विधि से स्नान करके सब पापों से छूटता है-स्नान के लिये