भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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हारीतस्मृतिः ॥ १३

अभावे दन्तकाष्ठानां प्रतिषिद्धदिनेषु च ॥ ११ ॥
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिं समाचरेत् ।
स्नात्वा मन्त्रवदाचम्य पुनराचमनं चरेत् ॥ १२ ॥
मन्त्रवत्प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम् ।
आदित्येन सह प्रातर्मन्देहानां म राक्षसाः ॥ १३ ॥
युध्यन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उदकाञ्जलिनिक्षेपा गायत्र्या चाभिमन्त्रिताः ॥ १४ ॥
निघ्नन्ति राक्षसान् सर्वान्मन्देहाख्यान् द्विजैरीताः ।
ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणैरभिरक्षितः ॥ १५ ॥
मारीच्याद्यैर्महाभागैः सनकाद्यैश्च योगिभिः ।
तस्मान्न लङ्घयेत् सन्ध्यां सायं प्रातः समाहितः ॥ १६ ॥
उल्लङ्घयति यो मोहात् स याति नरकं ध्रुवम् ।
सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोक्ष्य सूर्यस्य चाञ्जलिम् ॥ १७ ॥


दातून के न मिलने पर तथा प्रतिपदादि निषिद्ध दिनों में ॥ ११ ॥
पानी के बारह कुल्ले करके तथा मज्जन द्वारा मुख की शुद्धि करे। मन्त्रों से आचमन करके स्नान करे और स्नान के पीछे फिर आचमन करे ॥ १२ ॥
(आपोहिष्ठादि०) मन्त्रों से देह पर मार्जन करके सूर्य को जल की अंजली देवे। सूर्यनारायण के संग प्रातःकाल में मंदेह नाम वाले राक्षस ॥ १३ ॥ अव्यक्त ब्रह्म से प्रकट हुये ब्रह्मा जी के वरदान से युद्ध करते हैं। गायत्री मन्त्र पढ़ कर सूर्यनारायण के सम्मुख द्विजों से फेंकी जल की अंजली ॥ १४ ॥ उन सब मंदेह नामक राक्षसों को नष्ट करती हैं। इस कारण ब्राह्मणों से ॥ १५ ॥ तथा बड़े भाग्यशाली मरीचि आदि ऋषियों से तथा सनकादिक योगियों से भी रक्षित हुये सूर्यनारायण आकाश में निर्विघ्न गमन करते हैं। इस से सावधान हुआ द्विज सायं प्रातःकाल की संध्या का उल्लंघन त्याग न करे ॥ १६ ॥ जो पुरुष अज्ञान से संध्या को छोड़ता है वह निश्चय कर नरक में जाता है। सायंकाल को मन्त्रों से आचमन और शरीर पर मार्जन कर के सूर्य को अंजली ॥ १७ ॥