भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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आपस्तम्बस्मृतिः ॥ ५

तेषांनक्तं प्रदातव्यं बालानांप्रहरद्वयम् ॥ ५ ॥ अशीतिर्यस्यवर्षाणि बालोवाप्यूनषोडशः । प्रायश्चित्तार्द्धमर्हन्ति स्त्रियोव्याधितएवच ॥ ६ ॥ न्यूनैकादशवर्षस्य पञ्चवर्षाधिकस्यच । चरेद्गुरुःसुहृद्वापि प्रायश्चित्तंविशोधनम् ॥ ७ ॥ अथैतैः क्रियमाणेषु येषामार्त्तिःप्रदृश्यते । शेषसंपादनाच्छुद्धि-र्विपत्तिर्नभवेद्यथा ॥ ८ ॥ क्षुधाव्याधितकायानां प्राणोयेषांविपद्यते । येनरक्षांतवक्तार-स्तेषांतत्किल्विषंभवेत् ॥ ९ ॥ पूर्णेऽपिकालनियमे नशुद्धिर्ब्राह्मणैर्विना । अपूर्णेष्वपिकालेषु शोधयन्तिद्विजोत्तमाः ॥ १० ॥ समाप्तमितिनोवाच्यं त्रिषुवर्णेषुकर्हिचित् ।


बतावे और बालकों को दो पहर का उपवास ॥ ५ ॥ अस्सी वर्ष का वृद्ध और सोलह वर्ष से न्यून अवस्था का बालक-स्त्री और रोगी-ये सब आधे प्रायश्चित्त के योग्य होते हैं ॥ ६ ॥ ग्यारह वर्ष से कम और पांच वर्ष से अधिक जिसकी अवस्था है ऐसे बालक की शुद्धि करने वाले प्रायश्चित्त को गुरु अथवा मित्र करे ॥ ७ ॥ यदि ये (बालक) ही अपना प्रायश्चित्त करें और बीच में इन को कष्ट प्रतीत होय तो शेष प्रायश्चित्त को गुरु आदि करें अथवा जैसे इन को विपत्ति दुःख विशेष न हो वैसे ही प्रायश्चित्त को ये करें ॥ ८ ॥ प्रायश्चित्त के करने से क्षुधा से पीड़ित होकर जिन का प्राण निकल जाय अर्थात् मर जावे तो जो लोग धर्म (प्रायश्चित्त आदि) के उपदेश करने वाले हैं जो उन के प्राणों की रक्षा नहीं करते अर्थात् शक्ति के अनुसार उन्हें प्रायश्चित्त नहीं बताते तो यह पाप उन उपदेश करने वालों को ही लगता है ॥ ९ ॥ यदि समय का नियम पूरा भी हो जाय तो भी ब्राह्मणों के कहे बिना शुद्धि नहीं होती और काल का नियम पूरा न भी हो तो ब्राह्मण शुद्ध कर देते हैं अर्थात् शुद्धि ब्राह्मणों के वचन में है ॥ १० ॥ क्योंकि प्राणों का संशय उत्पन्न होने पर कर्म का