अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ भाषार्थसहिता ॥
पीत्वाकूपादहोरात्रं पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ १३ ॥
क्लिन्नेभिन्नेशवेचैव तत्रस्थयदि तत्पिबेत् ।
शुद्धिश्चांद्रायणंतस्य तप्तकृच्छ्रमथापिवा ॥ १४ ॥
इत्यापस्तम्बीये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अंत्यजातिरविज्ञातो निवसेद्यस्यवेश्मनि ।
तस्यज्ञात्वातुकालेन द्विजाःकुर्वन्त्यनुग्रहम् ॥ १ ॥
चान्द्रायणंपराकोवा द्विजातीनांविशोधनम् ।
प्राजापत्यंतुशूद्रस्य शेषंतदनुसारतः ॥ २ ॥
यैर्भुक्तं तत्रपक्वान्नं कृच्छ्रंतेषांप्रदापयेत् ।
तेषामपिचयैर्भुक्तं कृच्छ्रपादंप्रदापयेत् ॥ ३ ॥
कूपैकपानैर्दुष्टानां स्पर्शसंसर्गदूषणात्।
तेषामेकोपवासेन पंचगव्येनशोधनम् ॥ ४ ॥
बालोवृद्धस्तथारोगी गर्भिणीवायुपीडिता ।
अंग टूटा हो) ऐसे मुर्दासे कूप अशुद्ध होतो उस कुए के जल को पीकर दिन १ रात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ १३ ॥ यदि रुधिर से भीगा और टूटे अंग वाला मुर्दा जिस कूप में पड़ा हो और उसके जलको पीले तो चांद्रायण अथवा तप्त कृच्छ्र से शुद्धि होती है ॥ १४॥ बिना जाना अन्त्यजाति चाण्डालादि जिस मनुष्य के घर में बसे और फिर यह जान पड़े तो ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य उस अंत्यज पर दया करें अर्थात् दंड न दें ॥ १॥ और द्विजाति चांद्रायण अथवा पराक व्रत करें और शूद्र प्राजापत्य और शेष जाति (सूत आदि) अपनी २ जातिके अनुसार प्रायश्चित्त करें ॥ २॥ और जिन्होंने वहां पक्कान्न खाया हो उनको कृच्छ्र व्रत देना चाहिये । और वहां पक्कान्न खाने वालों का जिन्होंने खाया हो उन को चौथाई कृच्छ्रव्रत करावें ॥ ३॥ नीचों के स्पर्श और समागम के दोष से तथा एक कुए का जल पीने से जो अशुद्ध हुये हैं उन का एक उपवास और पंचगव्य शोधक है ॥ ४॥ बालक, वृद्ध, रोगी, और वायु की पीड़ा वाली गर्भवती स्त्री इन को रात्रि भर व्रत