अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ भाषार्थसहिता ॥
अहोरात्रोषितोभूत्वा पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
इत्यापस्तम्बीयेचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
चांडालेनेयदास्पृष्टो द्विजवर्णःकदाचन । अनभ्युक्ष्यपिबेत्तोयं प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १ ॥
ब्राह्मणस्तुत्रिरात्रेण पञ्चगव्येनशुद्ध्यति । क्षत्रियस्तुद्विरात्रेण पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ २ ॥
अहोरात्रेणवैश्यस्तु पञ्चगव्येनशुद्ध्यति । चतुर्थस्यतुवर्णस्य प्रायश्चित्तं कथंभवेत् ॥ ३॥
व्रतं नास्तितपोनास्ति होमो नैवचविद्यते । पञ्चगव्यंनदातव्यं तस्यमंत्रविवर्जनात् ॥ ४ ॥
ख्यापयित्वाद्बिजानांतु शूद्रोदानेनशुद्ध्यति । ब्राह्मणस्ययदोच्छिष्ट-मश्नात्यज्ञानतोद्विजः ॥ ५ ॥ अहोरात्रंतुगायत्र्या जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ।
तो एक दिन रात उपवास करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ १२ ॥
॥ इत्यापस्तम्बीये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
यदि कदाचित् द्विज वर्णों को चांडाल स्पर्श करले और वह द्विज स्नान किये बिना ही जल पीले तो प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥१॥ ब्राह्मण तीन दिन में और क्षत्रिय दोदिन में क्रम से उपवास करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होते हैं ॥२॥ और वैश्य एक दिनरात उपवास करके पञ्चगव्य पीनेसे शुद्ध होता है-चौथे वर्ण (शूद्र) का प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥३॥ शूद्र को व्रत नहीं तप नहीं होम नहीं और इसको वेदका अधिकार नहोने से पञ्चगव्य भी नहीं देना चाहिये ॥४॥ परन्तु शूद्र निज अपराध को ब्राह्मणों को विदित कराकर दानदेने से शुद्ध होता है-यदि द्विज अज्ञान से ब्राह्मण के उच्छिष्ट (जूठा) को खाले ॥५॥ तो एक दिन रात गायत्री का जप करके अच्छे प्रकार शुद्ध होता है और यदि