अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआपस्तम्बस्मृतिः ॥ १३
उच्छिष्टं वैश्यजातीनां भुंक्तेऽज्ञानाद्द्विजोयदि ॥ ६ ॥
शंखपुष्पीपयःपीत्वा त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ।
ब्राह्मण्यासहयोश्नीया-दुच्छिष्टंवाकदाचन ॥ ७ ॥
नतत्रदोषं मन्यंते नित्यमेवमनीषिणः ।
उच्छिष्टमितरस्त्रीणा-मश्नीयात्स्पृशतेपिवा ॥८॥
प्राजापत्येनशुद्धिःस्या-द्भगवानंगिरोब्रवीत् ।
अंत्यानांभुक्तशेषंतु भक्षयित्वा द्विजातयः॥९॥
चांद्रायणंतदधार्धं ब्रह्मक्षत्रविशांविधिः ।
विण्मूत्रभक्षणेविप्र-स्तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ॥ १० ॥
श्वकाकोच्छिष्टगोभिन्नं प्राजापत्यविधिःस्मृतः ।
उच्छिष्टः स्पृशते विप्रो यदि कश्चिदकामतः ॥ ११ ॥
शुनःकुक्कुटशूद्रांश्च मद्यभांडंतथैव च ।
पक्षिणाधिष्ठितंयच्च यद्यमेध्यंकदाचन ॥ १२ ॥
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
वैश्यों के उच्छिष्ट को अज्ञान से द्विज खाले ॥ ६ ॥ तो शंखपुष्पी के जल को पीकर तीन दिन में शुद्ध होता है-जो कदाचित् ब्राह्मणी के संग उच्छिष्ट को ब्राह्मण खाले ॥ ७ ॥ उस में विद्वान् मनुष्य कभी भी दोष नहीं मानते-और यदि अन्य स्त्रियों के उच्छिष्ट को खाले अथवा छूले ॥८॥ तो प्राजापत्य व्रत से शुद्धि होती है यह भगवान् (ऐश्वर्य वाले) अंगिरा ऋषि ने कहा है-यदि अन्त्यजों के भोजन से बचे अन्न को द्विजाति खालें ॥९॥ तो चांद्रायण-अर्द्धकृच्छ्र-पादकृच्छ्र-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य क्रमशः करें-और विष्ठा वा मूत्र वा दोनोंके भक्षण में ब्राह्मण तप्त कृच्छ्रव्रत करें १०॥कुत्ता-काक और गौओं के उच्छिष्ट का भक्षण करले तो प्राजापत्य करना चाहिये-यदि कोई उच्छिष्ट ब्राह्मण अज्ञान से॥११॥कुत्ता मुरगा-शूद्र-मदिरा का पात्र-और जिस पर पक्षि बैठा हो ऐसे अपवित्र वस्तु इन का कदाचित्स्पर्शकरले॥१२॥ तो एकदिनरात उपवा