भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

१४ भाषार्थसहिता ॥

वैश्येनचयदास्पृष्ट उच्छिष्टेनकदाचन ॥ १३ ॥
स्नानंजप्यं चत्रैकाल्यं दिनस्यांतेविशुध्यति ।
विप्रोविप्रेणसंस्पृष्ट उच्छिष्टेनकदाचन ॥ १४ ॥
स्नानांतेचविशुद्धिःस्या-दापस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः ।

इत्यापस्तंबीये पंचमोऽध्यायः ॥

अतऊर्ध्वंप्रवक्ष्यामि नीलीवस्त्रस्ययोविधिः ।
स्त्रीणांक्रीडार्थसंभोगे शयनीयेनदुष्यति ॥ १ ॥
पालनेविक्रयेचैव तद्वृत्तेरुपजीवने ।
पतितस्तुभवेद्विप्र-स्त्रिभिःकृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥ २ ॥
स्नानंदानंजपोहोमः स्वाध्यायःपितृतर्पणम् ।
पंचयज्ञावृथास्तस्य नीलीवस्त्रस्यधारणात् ॥ ३ ॥
नीलीरक्तंयदावस्त्रं ब्राह्मणोऽगेषुधारयेत् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ४॥
रोमकूपैर्यदागच्छेदसो नील्यास्तुकर्हिचित् ।


स करके पंचगव्यपीने से शुद्ध होता है। यदि कदाचित उच्छिष्ट वैश्य ब्राह्मणको छूवे ॥१३॥ तो त्रिकाल स्नान और जप करके दिन के अंत में शुद्ध होता है और जो कदाचित ब्राह्मण को उच्छिष्ट ब्राह्मण ही छूवे ॥१४॥ तो स्नान के अंत में शुद्ध होता है यह आपस्तंब मुनिनेकहा है ॥ ५ ॥

इत्यापस्तम्बीयधर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥

अब आगे नीले वस्त्र की विधि कहते हैं-स्त्रियों के संग क्रीड़ा के लिये भोग में और शय्या पर नीले वस्त्र का दोष नहीं ॥ १ ॥ नील के पालने, वेचने, और जीविका से ब्राह्मण पतित होता है और वह तीन व्रतकृच्छ्र करने से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ जो नीले वस्त्र को धारण करे उस के-स्नान-दान-जप होम-वेद का पाठ-पितरोंका तर्पण और पंचमहायज्ञ करनेवृथा हैं॥३॥नीले रंगे वस्त्र को यदि ब्राह्मण अंगमें धारण करेतो एकदिनरात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥४॥ यदि कदाचित रोमकूपों के द्वारा नील का रस अंगमें च-

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ) · पृष्ठ 187, कुल 805 में से · BharatKosha