अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपस्तम्बस्मृतिः ॥ १५
पतितस्तुभवेद्विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
नीलीदारुयदाभिन्द्या-द्ब्राह्मणस्यशरीरकम् ।
शोणितंदृश्यतेतत्र द्विजश्चांद्रायणंचरेत् ॥ ६ ॥
नीलीमध्येयदागच्छे-त्प्रमादाद्ब्राह्मणःक्वचित् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥ ७ ॥
नीलीरक्तेनवस्त्रेण यदन्नमुपनीयते ।
अभोज्यंतद्विजातीनां भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ॥८॥
भक्षयेच्चनीलींतु प्रमादाद्ब्राह्मणःक्वचित् ।
चांद्रायणेनशुद्धिःस्या-दापस्तंबोऽब्रवीन्मुनिः ॥ ९ ॥
यावत्यांवापितानीली तावतीर्वऽशुचिर्मही ।
प्रमाणंत्द्वादशाव्दानि अलमूर्ध्वंशुचिर्भवेत् ॥ १० ॥
इत्यापस्तंबीयेषष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
स्नानंरजस्वलायास्तु चतुर्थेहनिशस्यते ।
लाजाय तो ब्राह्मण पतित होजाता है और तीन कृच्छ्रव्रत करने से शुद्ध होता है ॥ ५ ॥ यदि नील की लकड़ी ब्राह्मण के शरीर में घाव करदे और उस घाव में रुधिर निकल आवे तो चांद्रायण व्रत करे ॥ ६ ॥ यदि अज्ञान से ब्राह्मण नील के खेत के बीच में गमन करे तो एक दिनरात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है ॥ ७ ॥ नील से रंगे वस्त्र को पहन कर जो अन्न परसा जाता है वह अन्न द्विजातियों को अभोज्य है और उसे खालें तो चांद्रायणव्रत करें ॥८॥ यदि अज्ञान से ब्राह्मण कदाचित् नील को खाले तो चांद्रायणव्रत से शुद्धिहोती । है यह आपस्तम्ब मुनि ने कहा है ॥९॥ जितनी पृथ्वी में नील बोया हो उतनी पृथ्वी बारह १२ वर्ष तक अशुद्ध होजाती है बाद शुद्ध होती है ॥१०॥
इत्यापस्तम्बीये षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
रजस्वला स्त्री का स्नान चौथे दिन श्रेष्ठ है रज के निवृत्त होने पर स्त्री संग