अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ माधवार्य्यसंहिता ॥
निवृत्ते रजसिगम्यास्त्री नानिवृत्ते कथंचन । रोगेणयद्रजःस्त्रीणा-मत्यर्थंहिप्रवर्तते । अशुद्धास्तास्तु नैवैह तासां वैकारिकोमदः ॥ २ ॥ साध्वाचारानतावत्स-रजोयावत्प्रवर्त्तते । वृत्तेरजसिसाध्वीस्याद् गृहकर्मणिचेंद्रिये ॥ ३ ॥ प्रथमेऽहनिचांडाली द्वितीयॆब्रह्मघातिनी । तृतीयेरजकीप्रोक्ता चतुर्थेऽहनि शुद्ध्यति ॥ ४ ॥ अंत्यजातिश्वपाकेन संस्पृष्टावैरजस्वला । अहानितान्यतिक्रम्य प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत् ॥ ५ ॥ त्रिरात्रमुपवासः स्या-त्तपञ्चगव्यंविशोधनम् । निशां प्राप्यतुतांयोनिं प्रजाकाशांचकामयेत् ॥६॥ रजस्वलांत्यजैःस्पृष्टा शुनाचश्वपचेनच ।
के योग्य होती है रज के निवृत्त न होने पर कभी नहीं होती ॥ १ ॥ जो किसी रोग से स्त्रियों के अत्यन्त रज (रुधिर) निकलता है वे स्त्री उस रज से अशुद्ध नहीं होतीं क्योंकि वह उन का मद विकार से है ॥ २ ॥ जब तक रजोदर्शन रहे तब तक उत्तम आचरण न करे क्योंकि रजोदर्शन की निवृत्ति होने पर ही घर के काम और संग करने योग्य होती है ॥ ३ ॥ प्रथम दिन चांडाली संज्ञा द्वितीय दिन ब्रह्महत्यारी तृतीय दिन रजकी (धोबिन) होती और चौथे दिन शुद्ध होती है ॥ ४ ॥ यदि रजस्वला स्त्री को अंत्यज और श्वपाक स्पर्श करलें तो रजोदर्शन के दिनों को बिताकर प्रायश्चित्त करे ५ तीन दिन उपवास और पंचगव्य का पीना उसका प्रायश्चित्त है। फिर उसी शुद्ध होने की रात्रि में पुरुष का संग करे ॥ ६ ॥ यदि रजस्वला स्त्री को अन्त्यज-कुत्ता-और श्वपच ये स्पर्श करलें तो तीन दिन उपवास के अनन्तर पंचगव्य