भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

२२ | भाषार्थसहितः ॥

गुडस्तक्ररसाग्राह्या निवृत्तेनापिशूद्रतः ।
शाकंमांसंमृणालानि तुंबरुःसक्तवस्तिलाः ॥ १८ ॥
रसाःफलानिपिण्याकं प्रतिग्राह्याहिसर्वतः ।
आपत्कालेतुविप्रेण भुक्तं शूद्रगृहेयदि ॥ १९ ॥
मनस्तापेनशुध्येत द्रुपदांवाशतंजपेत् ।
द्रव्यपाणिंश्चशूद्रेण स्पृष्टोच्छिष्टेनकर्हिचित् ॥ २० ॥
तद्द्विजेननभोक्तव्य-मापस्तंबोऽब्रवीन्मुनिः ॥ २१ ॥

इत्यापस्तंबीयेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

भुंजानस्यतुविप्रस्य कदाचित्स्रवतेगुदम् ।
उच्छिष्टस्याशुचेरतस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ १ ॥
पूर्वं शौचंतुनिर्वर्त्य ततःपश्चादुपस्पृशेत् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुध्यति ॥ २ ॥
अशित्वासर्वमेवान्न-मकृत्वाशौचमात्मनः ।


गुड़ मट्ठा रस इन को निवृत्त पुरुष भी शूद्र से लेले-शाक (भाजी) मांस, कमल की जड़-तुंबरी-सत्तू-तिल ॥ १८ ॥ रस-फल-पिण्याक (खली) इन को सब से ले ले यदि आपत्काल में ब्राह्मण शूद्र के घर में भोजन करले ॥ १९ ॥ तो मन के पश्चात्ताप से शुद्ध होता है अथवा सौ १०० द्रुपदा मन्त्र जपै द्रव्य (अन्न आदि) है हाथ में जिस के ऐसे ब्राह्मण को यदि उच्छिष्ट शूद्र छूवे ॥ २०॥ तो उस अन्नको ब्राह्मण न खावे यह आपस्तंब मुनि ने कहा है ॥ २१ ॥

इत्यापस्तंबीये अष्टमोऽध्यायः ॥

भोजन करते हुये ब्राह्मण का यदि मलत्याग होजाय तो उच्छिष्ट और अशुद्ध हुये उस ब्राह्मण का प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ १ ॥ पहिले शौच करके आ-चमन करै पुनः एक दिनरात उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ देह को शुद्ध किये विना अज्ञान से सर्व प्रकार के भोजन को खाकर तीन दिन