अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपस्तम्बस्मृतिः ॥ २३
मोहाद्भुक्त्वात्रिरात्रंतु यवान्पीत्वाविशुद्ध्यति ॥३॥
प्रसृतयवसस्येन पलमेकंतुसर्पिषा ।
पलानिपंचगोमूत्रं नातिरिक्तवदाशयेत् ॥ ४ ॥
अलेह्यानामपेयाना-मभक्ष्याणांचभक्षणे ।
रेतोमूत्रपुरीषाणां प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ ५ ॥
पद्मोदुंबरबिल्वाश्च कुशाश्चसपलाशकाः ।
एतेषामुदकंपीत्वा षड्रात्रेणविशुद्ध्यति ॥ ६ ॥
येप्रत्यवसिताविप्रा प्रव्रज्याग्निजलादिषु ।
अनाशकनिवृत्ताश्च गृहस्थत्वंचिकीर्षवः ॥ ७ ॥
चरेयुस्त्रीणिकृच्छ्राणि त्रीणिचांद्रायणानिवा ।
जातकर्मादिभिःसर्वं पुनःसंस्कारभागिनः ॥
तेषांसांतपनंकृच्छ्रं चांद्रायणमथापिवा ॥ ८ ॥
यद्दृष्टिटं काकबलाकयोर्वा अमेध्यलिप्तंचभवंच्छरीरम्
श्रोत्रेमुखेचप्रविशेच्चसम्यक् स्नानेनलेपोपहतस्यशुद्धिः ९
ऊर्ध्वनाभेःकरौमुक्त्वा यदंगमुपहन्यते ।
जौ को पीकर सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ और वे जौ इतने तथा ऐसे पीवे कि एक पस्सा जौ एक पल भर घी और पांच पल गोमूत्र जिन में हों इन से अधिक न खावे ॥४॥ चाटने पीने और खाने के अयोग्य रेत (वीर्य) मूत्र विष्ठा इन के भक्षण में प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ ५॥ कमल-गूलर-बेल कुश और ढाक-इन के जल को छः दिन तक पीकर सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ जो ब्राह्मण पतित हों अथवा संन्यास अग्निहोत्र और तर्पण से निवृत्त हों अर्थात् इन को जिन ने त्यागा हो तथा जो उपवास व्रत से निवृत्त हों परन्तु वे गृहस्थाश्रम में रहना चाहते हों ॥ ७ ॥ वे तो तीन कृच्छ्र अथवा तीन चांद्रायण करें और जातकर्म से लेकर उन का पुनः संस्कार होना चाहिये। यद्वा सांतपन कृच्छ्र वा चांद्रायण करना ॥ ८ ॥ जो शरीर कौवा-बगुला से घेरा हो अथवा अमेध्य (विष्ठा) से लिप्त हो ॥ ९ ॥ अथवा कान वा मुख में अशुद्ध वस्तु प्रविष्ट हो जाय तो जिस में अपवित्र वस्तु लगा हो सम्यक्