भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२४ भाषाधर्मसंहिता ॥

ऊर्ध्वस्नानमधःशौच मात्रेणैवविशुद्ध्यति ॥१०॥
उपानहावमेध्यंवा यस्यसंस्पृशतेमुखम् ।
मृत्तिकाशोधनस्नानं पंचगव्यंविशोधनम् ॥ ११ ॥
दशाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो जन्महानौस्वयोनिषु ।
षड्भिस्त्रिभिस्तथैकेन क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥१२॥
उपनीतंयदात्वन्नं भोक्तारंसमुपस्थितम् ॥१३॥
अपोतवत्समुत्सृष्टं नदद्यान्नैवहोमयेत् ।
अन्ने भोजनसम्पन्नं मक्षिकाकेशदूषिते ॥१४॥
अनन्तरंस्पृशेदाप-स्त्वच्छाऽनंभस्मनास्पृशेत् ।
शुष्कमांसमथर्वान्नं शूद्रान्नंचाप्यकामतः ॥१५॥
भुक्त्वाकृच्छ्रं चरेद्विप्रो ज्ञानात्कृच्छ्रत्रयंचरेत् ।
अभुक्तोमुच्यतेयश्च भुक्तोयश्चापिमुच्यते ॥१६॥

प्रकार स्नान करने से उस शरीर की शुद्धि होती है। हाथों को छोड़ कर नाभी से ऊपर जिस अंग में अशुद्ध वस्तु स्पर्श हो जावे ॥ १० ॥ तो स्नान करने से-निचले भाग में होय तो शौच से ही शुद्धि होती है-जिस के मुख में उपानह (जूते, या अपवित्र वस्तु का स्पर्श हो जाय ॥ ११ ॥ तो वह मिट्टी शरीर पर लगावे और स्नान तथा पंचगव्य से शुद्धि होती है। ब्राह्मण अपनी जाति के जन्म और मरण के सूतक से दश दिन में शुद्ध होता है ॥१२॥ क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियों के सूतक में क्रम से क्रः ६ तीन३-एक दिन में शुद्ध होता है-भोजनार्थ भोक्ता के समीप जो अन्न लाया जाता है ॥१३॥ यदि उस अन्न को भोक्ता वैसे ही छोड़ दे तो वह अन्न मरे के अन्न के तुल्य है इस से उस अन्न को किसी को न दे और न उस से होम करे भोजन के लिये जो अन्न बनाया जाय वह अन्न यदि मक्षिका (मक्खी) या केश से दूषित होजाय ॥१४॥ तो फिर जल का स्पर्श करे और अन्न में भस्म डाल के शुद्ध करे । सूखा मांस तथा अथर्वा (बढ़ई) और शूद्र का अन्न इन को अज्ञान से ॥ १५ ॥ खाकर ब्राह्मण एक कृच्छ्र और जान कर खावे तो तीन कृच्छ्र करे—अभुक्त (खाये बिना) अथवा भुक्त (खाने पर) जो भोजन से छुटाया जाय ॥१६॥