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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

२४ भाषाधर्मसंहिता ॥

ऊर्ध्वस्नानमधःशौच मात्रेणैवविशुद्ध्यति ॥१०॥
उपानहावमेध्यंवा यस्यसंस्पृशतेमुखम् ।
मृत्तिकाशोधनस्नानं पंचगव्यंविशोधनम् ॥ ११ ॥
दशाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो जन्महानौस्वयोनिषु ।
षड्भिस्त्रिभिस्तथैकेन क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥१२॥
उपनीतंयदात्वन्नं भोक्तारंसमुपस्थितम् ॥१३॥
अपोतवत्समुत्सृष्टं नदद्यान्नैवहोमयेत् ।
अन्ने भोजनसम्पन्नं मक्षिकाकेशदूषिते ॥१४॥
अनन्तरंस्पृशेदाप-स्त्वच्छाऽनंभस्मनास्पृशेत् ।
शुष्कमांसमथर्वान्नं शूद्रान्नंचाप्यकामतः ॥१५॥
भुक्त्वाकृच्छ्रं चरेद्विप्रो ज्ञानात्कृच्छ्रत्रयंचरेत् ।
अभुक्तोमुच्यतेयश्च भुक्तोयश्चापिमुच्यते ॥१६॥

प्रकार स्नान करने से उस शरीर की शुद्धि होती है। हाथों को छोड़ कर नाभी से ऊपर जिस अंग में अशुद्ध वस्तु स्पर्श हो जावे ॥ १० ॥ तो स्नान करने से-निचले भाग में होय तो शौच से ही शुद्धि होती है-जिस के मुख में उपानह (जूते, या अपवित्र वस्तु का स्पर्श हो जाय ॥ ११ ॥ तो वह मिट्टी शरीर पर लगावे और स्नान तथा पंचगव्य से शुद्धि होती है। ब्राह्मण अपनी जाति के जन्म और मरण के सूतक से दश दिन में शुद्ध होता है ॥१२॥ क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियों के सूतक में क्रम से क्रः ६ तीन३-एक दिन में शुद्ध होता है-भोजनार्थ भोक्ता के समीप जो अन्न लाया जाता है ॥१३॥ यदि उस अन्न को भोक्ता वैसे ही छोड़ दे तो वह अन्न मरे के अन्न के तुल्य है इस से उस अन्न को किसी को न दे और न उस से होम करे भोजन के लिये जो अन्न बनाया जाय वह अन्न यदि मक्षिका (मक्खी) या केश से दूषित होजाय ॥१४॥ तो फिर जल का स्पर्श करे और अन्न में भस्म डाल के शुद्ध करे । सूखा मांस तथा अथर्वा (बढ़ई) और शूद्र का अन्न इन को अज्ञान से ॥ १५ ॥ खाकर ब्राह्मण एक कृच्छ्र और जान कर खावे तो तीन कृच्छ्र करे—अभुक्त (खाये बिना) अथवा भुक्त (खाने पर) जो भोजन से छुटाया जाय ॥१६॥

आपस्तम्बस्मृतिः ॥ २५

भोक्ताचमोचकश्चैवपश्चादुरतिदुष्कृतम् । यस्तुभुंजतिभुक्तंवा दुष्टंवापिविशेषतः ॥ १७ ॥ अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति । उदकेचोदकस्थस्तु स्थलस्थश्चस्थलेशुचिः ॥ १८ ॥ पादौस्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतःशुचिः । उत्तीर्याचामेदूदका-दवतीर्यउपस्पृशेत् ॥ १९ ॥ एवंतुश्रेयसायुक्तोवरुणेनाभिपूज्यते । अग्न्यागारेगवांगोष्ठे ब्राह्मणानांचसन्निधौ ॥ २० ॥ स्वाध्यायंभोजनेचैव पादुकानांविसर्जनम् । जन्मप्रभृतिसंस्कारे श्मशानांतेचभोजनम् ॥ २१ ॥ असर्पिंडैर्नकर्त्तव्यं चूडाकार्य्यविशेषतः । याजकानांनवश्राद्धं संग्रहेचैवभोजनम् ॥ २२ ॥ स्त्रीणांप्रथमगर्भेच भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ।

भी भोक्ता और छुटानेवाला दोनों पाप के भागी होते हैं-जो खाये हुए जूठे अथवा अत्यन्त दुष्ट वस्तु को खाता है ॥ १७ ॥ वह एकदिन उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है-जल में बैठा और स्थल में बैठा शुद्ध होता है ॥१८॥ दोनों स्थानोंपर स्थित पुरुष दोनों स्थानोंपर पग रखकर आचमन करके शुद्ध होता है यदि जल में पग हों तो तटपर निकाल कर आचमन करै प्रयोजन यह कि आधा जल में आधा बाहर बैठ आचमनादि न करे ॥१९॥ ऐसे कल्याण से युक्त पुरुष को वरुण भी पूजता है-अग्नि और गोओं की शा-ला-तथा ब्राह्मणोंके समीप॥२०॥ स्वाध्याय (वेदकापाठ) भोजन इतनेस्थानोंपर खडाउं त्यागदे-जन्म आदि संस्कार-श्मशानांत (मरेकी क्रिया) का भोजन ॥२१॥ असपिण्डों को नहीं करना चाहिये तथा चूड़ाकर्म (मुंडन) में तो विशेष कर नकरें-यज्ञ कराने वाले का अन्न नवश्राद्ध (जो मरने से ११ वें दिन होता है) संग्रह तथा (बहुत मनुष्यों के साथ) में भोजन ॥२२॥ तथा स्त्रियों के प्रथम गर्भाधान में भोजन करके चांद्रायण व्रत करै। ब्रह्मोदन (यज्ञादि जो विशेष भात

२६ | भाषार्थसहिता ॥

ब्रह्मौदनेऽवसानेच सीमंतोन्नयनेतथा ॥ २३ ॥ अन्नश्राद्धेमृतश्राद्धे भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् । अप्रजातातुनारीस्या-न्नाश्नीयाद्दैवतेऽगृहे ॥ २४ ॥ अथभुंजीतमोहाद्यः पूयसंनरकंप्रजेत् । अल्पेनापिहिशुल्केन पिताकन्यांददांतियः ॥ २५ ॥ रौरवेबहुवर्षाणि पुरीषंमूत्रमश्नुते । स्त्रीधनानितुयेमोहा-दुपजीवंतिबांधवाः ॥ २६ ॥ स्त्रीणयानानिवस्त्राणि तेपापायांत्यधोगतिम् । राजाऽन्नमोज आदत्ते शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ २७ ॥ असंस्कृतंतुयोभुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् । मृतकेसूतकेचैव गृहीते शशिभास्करे ॥ २८ ॥ हस्तिच्छायांतुयोभुंक्ते सपापःपुरुषोभवेत् ।


होताहै ) अवसान (जब ब्राह्मण जीम चुकेहों) और सीमंतोन्नयन (अठवांसा) ॥२३॥ अन्न के श्राद्ध-मरे के श्राद्ध-इन में भोजन करे तो चांदायण व्रत करना चाहिये । जिस स्त्री के संतान न हुआ हो उस के घर भोजन न करे ॥२४॥ जो अज्ञान से खालेवेतो वह पूयस [पीब] के नरक में जाता है-जो पिता कुछ भी शुल्क [मोल] लेकर कन्या को देता है ॥२५॥ वह बहुत वर्षों तक रौरव नरक में विष्ठा मूत्र खाता है-जो कन्या के भाई आदि अज्ञान से स्त्री के धनों से गुजारा करते हैं॥२६॥ तथा स्त्रियों के सोना यान [सवारी] वस्त्र आदि को वर्तते हैं। वे पापी अधोगति (नरक) में जाते हैं-राजा का अन्न बल को और शूद्र का अन्न ब्रह्मतेज को नष्ट करता है ॥ २७ ॥ जो मनुष्य असंस्कृत [ अपवित्र ] अन्न को खाता है वह पृथिवी के मल को खाता है। मरने पर वा जन्म के सूतक में तथा चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में तथा गजच्छाया * में जो पुरुष खाता है


* जब कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी हो और सूर्य हस्त नक्षत्र पर हों तथा चन्द्रमा मघा नक्षत्र पर हों उसे गजच्छाया योग कहते हैं ।

आपस्तम्बस्मृतिः ॥ २७

पुनर्भूःपुनरंताच रेतोधाकामचारिणी ॥ २९ ॥
आसांप्रथमगर्भेषु भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ।
मातृघ्नश्चपितृघ्नश्च ब्रह्मघ्नोगुरुतल्पगः ॥ ३० ॥
विशेषाद्भुक्तमेतेषां भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ।
रजकव्याधशैलूष वेणुचर्मोपजीविनः ॥ ३१ ॥
भुक्त्वैषांब्राह्मणश्चान्नं शुद्धिश्चांद्रायणेनतु ।
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः कदाचिदुपजायते ॥ ३२ ॥
सवर्णननदोत्थाय उपस्पृश्यशुचिर्भवेत् ।
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुनाशूद्रेणवाद्धिजः ॥ ३३ ॥
उपोष्यरजनीमेकां पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
ब्राह्मणस्यसदाकालं शूद्रप्रेषणकारिणः ॥ ३४ ॥
भूमावन्नंप्रदातव्यं यथैवश्वातथैवसः ।


वह पापी है। पुनर्भू (दूसरे को जो बिवाही हो) पुनरंता (जो एक से वीर्य्य लेकर दूसरे से ले) और रेतोधा जो जहां तहां से वीर्य को धारे और व्यभिचारिणी हो॥२९॥ इन स्त्रियों के प्रथम ग र्भदान संस्कार में भोजन कर चांद्रावण व्रत करे। माता, पिता, ब्राह्मण इन को मारने वाला और गुरु की स्त्री के संग भोग करने वाला ॥३०॥ इनका अन्न विशेषकर खाने से चांद्रापण व्रत करे। रजक [धोबी] व्याध, (कसाई) नट बांस और चाम से जीविका करने वाले ३१ ॥ इन के अन्न को खाकर ब्राह्मण की शुद्धि चांद्रायण व्रत से होती है । यदि कदाचित उच्छिष्ट को उसी जाति का उच्छिष्ट स्पर्श करले ॥३२॥ तो उसी समय उठ कर स्नान आचमन कर के शुद्ध होजाता है और उच्छिष्ट का जिस को स्पर्श हुआ हो उस द्विज को कुत्ता अथवा शूद्र स्पर्श करले ॥ ३३ ॥ तो एक दिन का उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है। ब्राह्मण की प्रेरणा से कार्य्यं (चिट्ठी आदि पहुंचाना) करने वाला जो शूद्र है ॥ ३४ । उस शूद्र को पृथ्वी पर ही अन्न खाने को देना चाहिये क्योंकि जैसा कुत्ता वैसा ही वह है जहां जल न हो ऐसे

९८ भाषार्थसंहिता ॥

अनूदकेष्वरण्येषु चोरव्याघ्राकुलेपथि ॥ ३५ ॥ कृत्वामूत्रंपुरीषंच द्रव्यहस्तःकथंशुचिः । भूमावन्नंप्रतिष्ठाप्य कृत्वाशौचंयथार्थतः ॥ ३६॥ उत्संगेगृह्यपक्वान्न-मुपस्पृश्यततःशुचिः । मूत्रोच्चारंद्विजःकृत्वा अकृत्वाशौचमात्मनः ॥ ३७ ॥ मोहाद्भुक्त्वात्रिरात्रंतु गव्यंपीत्वाविशुद्ध्यति । उदक्यांयदिगच्छेत्तु ब्राह्मणोमदमोहितः ॥ ३८ ॥ चांद्रायणेनशुद्ध्येत ब्राह्मणानांचभोजनैः । भुक्त्वाच्छिष्टस्त्वनाचांत-श्चांडालैःश्वपचेनवा ॥३९॥ प्रमादाद्यदिसंसृष्टो ब्राह्मणोज्ञानदुर्बलः । स्नात्वात्रिषवणंनित्यं ब्रह्मचारीधराशयः ॥ ४० ॥ सत्रिरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति । चांडालेनतुसंसृष्टो यश्चापःपिबतिद्विजः ॥ ४१ ॥ अहोरात्रोषितोभूत्वा त्रिषवणेनशुद्ध्यति ।

वनों में चोर और बाघ सिंह जिस में हों ऐसे मार्ग में॥३५॥ मल और मूत्र कर के द्रव्य [भोजन आदि] जिस के हाथ मेंहों ऐसा पुरुष कैसे शुद्ध हो।पृथिवी पर अन्न को रखकर और यथार्थ शुद्धि करके ॥३६॥ उत्संग (गोदी) में पक्वान्नको ले-कर आचमन करके शुद्ध होता है। जो द्विज मूत्र विष्ठा करके शरीर शुद्धि किये बिना ॥ ३७ ॥ अज्ञान से खाले वह तीन दिन पंचगव्य पीकर सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है। यदि काम से मोह को प्राप्त हुआ ब्राह्मण रजस्वला स्त्री के संग गमन करे ॥३८॥ तो चांद्रायण व्रत और ब्राह्मणों को भोजन करानेसे शुद्ध होता है—भोजन से उच्छिष्ट तथा कुल्ला आचमनसे पूर्व चांडाल और श्वपच॥३९॥ यदि अज्ञानी ब्राह्मणको प्रमादसे स्पर्श करलें तो त्रिकालस्नान करे ब्रह्मचारी रहे पृथिवी पर सोवे ४०॥ तीन दिन उपवास करें मय पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है । चांडालके स्पर्श करने पर जो ब्राह्मण जल पीता है ॥४१॥ वह एक दिन रात उपवास और

आपस्तम्बस्मृतिः ॥ २९

सायंप्रातस्त्वहोरात्रं पादंकृच्छ्रस्यतंविदुः॥ ४२॥
सायंप्रातस्तथैवैकं दिनद्वयमयाचितम् ।
दिनद्वयंचनाश्नीया-त्कृच्छ्राद्धं तद्विधीयते ॥ ४३॥
प्रायश्चित्तं लघुष्वेव-त्पापेषुतुयथार्हतः ।
कृष्णाजिनतिलग्राही हस्त्यश्वानांचविक्रयी ॥ ४४ ॥
प्रेतनिर्यातकश्चैव नभूयःपुरुषोभवेत् ॥

इत्यापस्तम्बीये नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

आचांतोप्यशुचिस्ताव-द्यावन्नोद्ध्रियतेजलम् ।
उद्धृतेप्यशुचिस्ताव-द्यावद्भू मिर्नलिप्यते ॥१।
भूमावपिचलिप्तायां तावत्स्यादशुचिःपुमान् ।
आसनादुत्थितस्तस्मा-द्यावन्नाक्रमतेमहीम्॥२॥
नयमंयमित्याहु-रात्मावैयमउच्यते ।


त्रिकाल स्नान करने से शुद्ध होता है । एक दिनरात सायंकाल और प्रातःकाल भोजन करे इस को पादकृच्छ्र कहते हैं ॥ ४२ ॥ और एक दिन सायंकाल तथा एक दिन प्रातःकाल खावे और दो दिन बिना मांगे जो मिले उसे भोजन करे तथा दो दिन उपवास करें इसे कृच्छ्रार्द्ध कहते हैं ॥४३ ॥ लघु [छोटे] पापों में यह प्रायश्चित्त उचित है-काली मृगछाला और तिल इन का जो दान ले और हाथी तथा घोड़े को जो बेचे ॥ ४४ ॥ और जो मुर्दों का निर्यातक [ उठाने वाला ] ये जन्मान्तर में पुरुष नहीं होते ॥ ४५ ॥

इत्यापस्तम्बीये नवमोऽध्यायः ॥९॥

आचमन करने पर भी तब तक (मनुष्य) अशुद्ध रहता है जबतक भूमिपर गिरा हुआ अशुद्ध जल न उलीचा जावे और उस जल के उठाने पर भी तब तक अशुद्ध रहता है जब तक वह पृथिवी न लीपी जाय ॥१॥ तथा पृथ्वी के लीपने पर भी तब तक अशुद्ध रहता है जब तक आचमन के आसन से उठ कर उस लीपी हुई पृथ्वी पर न बैठे ॥ २ ॥ यमराज को यम नहीं कहते हैं किन्तु अपने शरीर

३० पाराशर्यसंहिता ॥

आत्मासंयमितोयेन तंयमःकिंकरिष्यति ॥३ ॥ नतथासिस्तथातीक्ष्णः सर्पोवादुरधिष्ठितः । यथाक्रोधोहिजंतूनां शरीरस्थोविनाशकः ॥ ४ ॥ क्षमागुणोहिजंतूना मिहामुत्रसुखप्रदः । एकःक्षमावतांदोषो द्वितीयोनोपपद्यते ॥ यदेनंक्षमयायुक्त-मशक्तं मन्यतेजनः ॥५॥ नशब्दशास्त्राभिगतस्यमोक्षो, नचैत्ररम्यावसथप्रियस्य । नभोजनाच्छादनतत्परस्य, नलोकचित्तग्रहणेरतस्य ॥६ ॥ एकान्तशीलस्यदृढव्रतस्य, मोक्षोभवेत्प्रीतिनिवर्तकस्य । आध्यात्मयोगैकरतस्यसम्यक्, मोक्षोभवेन्नित्यमहिंसकस्य स्वाध्याययोगागतमानसस्य ॥७॥ क्रोधयुक्तोयद्यजते यज्जुहोतियदर्चति


को ही यम कहते हैं जिस मनुष्य ने अपने को वश में करलिया उस का यम-राज क्या करेगा ? ॥३॥ खड्ग भी ऐसा तीक्ष्ण [ तीखा वा पैना ] नहीं और सर्प भी ऐसा ( विकराल वा भयानक ) नहीं जैसा मनुष्यों के शरीर में क्रोध नाश करने वाला है ॥ ४ ॥ क्षमा जो गुणहै वह मनुष्य को इस लोक और परलोक में सुख देने वाला है। और क्षमा वालों में एक ही दोष है दूसरा नहीं वह यह कि क्षमा वाले पुरुष को मनुष्य असमर्थ मानतेहैं ५ शब्द शास्त्र (व्याकरण) ही पढ़ने पढ़ाने वाले पुरुषका, घर के प्रेमी का तथा भोजन वस्त्रमेंतत्पर हुये का और जो जगत् के मनको वश करनेमें तत्पर हैं उनका मोक्ष नहीं हो सकता ॥६॥ किंतु एकान्त वासी, दृढ़व्रत वाले प्रीति से पृथक् रहने वाले का मोक्ष होताहै । तथा अध्यात्मयोग में तत्पर हुये अहिंसक और स्वाध्याय रूप योग में प्रवृत्त हुये मनवाले का नित्य सम्यक् प्रकार मोक्ष होता है ॥ ७ ॥ क्रोध युक्त मनुष्य जो यज्ञ होम पूजा करता है वह सब उसका इस

आपस्तम्बस्मृतिः ॥ ३१

सर्वंहरतितत्तस्य आमकुंभइवोदकम् ॥८॥ अपमानात्तपोवृद्धिः संमानात्तपसःक्षयः । अर्चितःपूजितोविप्रो दुग्धागौरिवसीदति ॥ ९ ॥ आप्यायतेयथाधेनुस्तृणैरमृतसंभवैः । एवंजपैश्चहोमैश्च पुनराप्यायतेद्विजः ॥ १० ॥ मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणिलोष्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि यःपश्यतिसपश्यति ॥ ११ ॥ रजकव्याधशैलूष-वेणुचर्मोपजीविनाम् । योभुंक्ते भुक्तमंतेषां प्राजापत्यंविशोधनम् ॥ १२ ॥ अगम्यागमनंकृत्वा अभक्ष्यस्यचभक्षणम् । शुद्धिश्चांद्रायणंकृत्वा अथर्वान्नेतथैवच ॥ १३ ॥ अग्निहोत्रंत्यजेद्यस्तु स नरोदेवहाभवेत् ।


प्रकार नष्ट होता है जैसे कच्चे घड़े में जल (कच्चे घड़े में जल भरने से घड़ा नष्ट हो जाता है ) ॥८॥ अपमान से तप की वृद्धि और सत्कार से तप का नाश होता है अर्चित और पूजित ब्राह्मण दुही हुई गौके समान दुःखी होता है ॥९॥ फिर वही गौ जैसे अमृत ( जल ) से पैदा हुए तृणों से पुष्ट होती वैसे ही यह ब्राह्मण भी जप तथा होम से पुनः पुष्ट होता है ॥१०॥ जो पराई स्त्रियों को माता के समान और पराये धन को लोष्ट ( ढेला ) के समान तथा सब प्राणियों को अपने समान देखता है वही देखता है ॥ ११ ॥ धोबी-व्याध नट-तथा बांस और चमड़े से जो जीविका करते; इन के अन्न को जो खाता है वह प्राजापत्य व्रत प्रायश्चित्त करे ॥ १२ ॥ गमन करने के अयोग्य स्त्री के संग गमन तथा अभक्ष्य का भक्षण कर और बढ़ई का अन्न खाकर चांद्रायण व्रत से शुद्ध होता है ॥ १३ ॥ जो अग्निहोत्र को त्यागदेता है वह देवताओं की

६२भाषार्थसहितः ॥

तस्यशुद्धिर्विधातव्या नान्याचांद्रायणादृते ॥ १४ ॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु अंतरामृतसूतके ।
सद्यःशुद्धिर्विजानीया-त्पूर्वसंकल्पितंचतत् ॥ १५ ॥
देवद्रोण्यांविवाहेच यज्ञेषुप्रततेषुच ।
कल्पितंसिद्धमन्नाद्यं नाशौचंमृतसूतके ॥ १६ ॥
इत्यापस्तम्बीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
समाप्तेयं स्मृतिः


हत्या वाला है उसकी शुद्धि चान्द्रायण व्रत के बिना नहीं होती ॥ १४ ॥ विवाह-उत्सव और यज्ञ में यदि मरण यद्वा जन्म मृतक हो जावे तो उसीकाल में शुद्धि होती है क्योंकि वह पूर्व संकल्प किया है ॥ १५ ॥ देव द्रोणी (तीर्थ वा ध्वज) विवाह तथा बड़े यज्ञों में मरण और जन्म के मृतक में बनाहुआ सिद्ध अन्न (पक्वान्न आदि) अशुद्ध नहीं होता ॥ १६ ॥

इत्यापस्तम्बीये दशमोऽध्यायः समाप्तः ॥

अथ संवर्त्तस्मृतिप्रारम्भः ॥

संवर्त्तमेकमासीनं सर्ववेदांगपारगम् ।
ऋषयस्तमुपागम्य पप्रच्छुर्धर्मकांक्षिणः ॥ १ ॥
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामो द्विजानांधर्मसाधनम् ।
यथावद्धर्ममाचक्ष्व शुभाशुभविचेचनम् ॥ २ ॥
वामदेवाद्यः सर्वे तंपृच्छंतिमहौजसम् ।
तानब्रवीन्मुनीन्सर्वा-न्प्रीतात्माश्रूयतामिति ॥ ३ ॥
स्वभावाद्धिचरेद्यत्र कृष्णसारःसदामृगः ।
धर्म्मदेशःसविज्ञेयो द्विजानांधर्मसाधनम् ॥ ४ ॥
उपनीतोद्विजोनित्यं गुरवेहितमाचरेत् ।
स्रग्गंधमधुमांसानि ब्रह्मचारीविवर्जयेत् ॥ ५ ॥
संध्यांप्रातःसनक्षत्रा-मुपासीतयथाविधि ।


एकाकी बैठे संपूर्ण वेद वेदाङ्गों के पारंगत वाले संवर्त ऋषि के समीप आकर धर्म के अभिलाषी ऋषियों ने पूछा ॥ १॥ हे भगवन् ! द्विजों के धर्मका साधन (हेतु) हम सुना चाहते हैं शुभ अशुभ का जिससे पृथक्कार ज्ञान हो ऐसे यथार्थ धर्म को कहो ॥ २ ॥ ऐसे वामदेवादि ऋषियों ने उन बड़े तेजस्वी संवर्त्त से पूछा उन संपूर्ण मुनियों से प्रसन्न मन होकर यह बोले कि तुम सुनो ॥ ३॥ जिस देश में काला मृग स्वभाव से सदा विचरे उसको ही धर्म का देश जानना चाहिये और वही द्विजों के धर्मका साधक है ॥ ४ ॥ यज्ञोपवीत होने पर द्विज प्रति दिन गुरुके हितका आचरण करै और माला-गंध-सहत-मांस इनको ब्रह्मचारी त्याग दे ॥ ५ ॥ प्रातःकाल की संध्या उस समय विधि से आरम्भ करे जिस समय आकाश में नक्षत्र (तारे) दीखते हों तथा सायंकाल की संध्या का उस समय आरम्भ करे जिस समय सूर्य नारायण आधे अस्त

२ भाषाप०संहिता ॥

सादित्यां पश्चिमां संध्या-मर्द्धास्तमितभास्करे ॥ ६ ॥ तिष्ठन्पूर्वांजपंस्कुर्या-त्सावित्रोमार्कदर्शनात् । आसीनः पश्चिमां संध्यां सम्यगृक्षविभावनात् ॥ ७ ॥ अग्निकार्यंचकुर्वीत मेधावीतदनन्तरम् । ततोऽधीयीत वेदंतु वीक्षमाणोगुरोर्मुखम् ॥ ८ ॥ प्रणवंप्राक्प्रयुंजीत व्याहतीस्तदनंतरम् । गायत्रींचानुपूव्येण ततोवेदंसमारभेत् ॥ ९ ॥ हस्तौतु संयतौधार्यौ जानुभ्यामुपरिस्थितौ गुरोरनुमतंकुर्या-त्पठन्नान्यमतिर्भवेत् ॥ १० ॥ सायंप्रातस्तुभिक्षेत ब्रह्मचारीसदाव्रती । निवेद्यगुरवेऽश्नीया-त्प्राङ्मुखोवाग्यतः शुचिः ॥ ११ ॥ सायंप्रातर्द्विजातीना-मशनंश्रुतिनोदितम् । नांतराभोजनंकुर्या-दग्निहोत्रीसमाहितः ॥ १२ ॥


हो चुके हों ॥ ६ ॥ खड़ा होकर सूर्य के दर्शन पर्यन्त प्रातः काल में गायत्री का जप करे और सायंकाल में बैठकर सम्यक् प्रकार नक्षत्रों के उदय पर्यन्त गायत्री का जप करे ॥ ७ ॥ तदनन्तर ज्ञानी पुरुष कुछ नित्य होम करे। फिर पुनः गुरु के मुख को देखता हुआ वेद को पढ़े ॥ ८ ॥ प्रथम प्रणव * को पढ़े तत्पश्चात् तीन व्याहृति पढ़े पुनः क्रम से गायत्री को पढ़े तदनन्तर वेद पढ़ने का आरम्भ करे ॥ ९ ॥ सावधानतया दोनों घोंटू के ऊपर हाथ रख कर सदा गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिये और पढ़ते समय अन्यत्र बुद्धि को न लगावे ॥ १० ॥ व्रत करने वाला ब्रह्मचारी सदैव सायंकाल तथा प्रातःकाल को भिक्षा मागे और उस भिक्षा को गुरु को निवेदन कर पूर्वाभिमुख होकर भोजन करे ॥ ११ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल में द्विजातियों को भोजन करना वेद में कहा है-इस से सावधान हो अग्निहोत्री बीच में भोजन न करे ॥ १२ ॥


* ओंभूः । ओंभुवः । ओंस्वः । ओंत्ससवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्यधीमहि । धियोयोनःप्रचोदयात् ॥

सम्वर्त्तस्मृतिः ॥ ३

आचम्यैवतुभुंजीत भुक्त्वाचोपस्पृशेद्विजः । अनाचांतस्तुयोश्नीया-त्प्रायश्चित्तीयतेतुसः ॥ १३ ॥ अनाचांत पिबेद्यस्तु योपिवाभक्षयेद्विजः । गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपंकुर्व्वन्विशुद्ध्यति ॥ १४ ॥ अकृत्वापादशौचंतु तिष्ठन्मुक्तशिखोपिवा । विनायज्ञोपवीतेन त्वाचांतोप्यशुचिर्भवेत् ॥ १५ ॥ आचामेद्ब्रह्मतीर्थेन चोपवीतोह्युदङ्मुखः । उपवीतीद्विजोनित्यं प्राङ्मुखोवाग्यतःशुचिः । वहिरंतश्चआचांत एवंशुद्धिमवाप्नुयान् ॥ १७ ॥ आमणिबंधाद्धस्तौच पादावद्विर्विशोधयेत् । परिमृज्यद्विरास्यंतु द्वादशांगानिचस्पृशेत् ॥ १८ ॥ स्नात्वापीत्वात्तथाक्षुत्वा भुक्त्वास्पृष्ट्वा द्विजोत्तमः ।


आचमन करने पश्चात् भोजन करे पुनः भोजन करके भी आचमन करे और जो आचमन किये बिना भोजन करता है वह प्रायश्चित्त का भागी होता है॥१३ जो द्विज आचमन किये बिना ही जल पीता है अथवा भोजन करता है वह आठ हजार गायत्री का जप करके सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है॥१४॥ पगों के धोये बिना चोटी में गांठ दिये बिना यज्ञोपवीत के बिना और खड़े हुए आचमन करके भी अशुद्ध होता है ॥१५॥ यज्ञोपवीत को धारण करके उत्तराभिमुख होकर ब्रह्मतीर्थ से आचमन करे अथवा यज्ञोपवीत को धारे हुये और पूर्वाभिमुख बैठाहूआ मौनी द्विज नित्य शुद्ध होता है ॥१६॥ जल में बैठा जलमें और स्थल में बैठा स्थल में आचमन करे इस प्रकार बाहिर और अंतः (जल में) आचमन करके शुद्धि को प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ मणि बंध (गट्टे) तक हाथों और पगों को जल से धोवे दो बार मुख को पोंछ कर बारह १२ (नेत्र आदि) अंगों का स्पर्श करे ॥ १८ ॥ स्नान-जलपान-छींक-भोजन-अपवित्र वस्तु का स्पर्श करके इस विधि से सम्यक् प्रकार आचमन करने से ब्रा-

४ भाषार्थसहिता ॥

अनेनविधिनासम्य गाचांतःशुचितामियात् ॥ १९ ॥ शूद्रःशुद्ध्यतिहस्तेन वैश्योदंतेषुवारिभिः । कंठगतैःक्षत्रियस्तु आचांतःशुचितामियात् ॥ २० ॥ आसनारूढपादस्तु कृतावसक्थिकस्तथा । आरूढपादुकोवापि नशुद्ध्यतिकदाचन ॥ २१ ॥ उपासीतनचेत्संध्या-मग्निकार्य्यं नचाकृतम् । गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपेत्स्नात्वासमाहितः ॥ २२ ॥ सूतकान्नंनवश्राद्धं मासिकाश्राद्धमेवच । ब्रह्मचारीतुयोऽश्नीया-त्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥ २३ ॥ ब्रह्मचारीतुयोगच्छे-त्स्त्रियंकामप्रपीडितः । प्राजापत्यंचरेत्कृच्छ्र-मथत्वेकंसुयंत्रितः ॥ २४ ॥ ब्रह्मचारीतुयोऽश्नीया-न्मधुमांसंकथंचन । प्राजापत्यंतु कृत्वासौ मौञ्जीहोमेनशुद्ध्यति ॥ २५ ॥


चरण शुद्ध होता है ॥१९॥ शूद्र होंठों पर जल का स्पर्श करके वैश्य दांतोंतक जलके स्पर्श से क्षत्रिय कंठ तक जाने वाले आचमन से शुद्ध होता है ॥२०॥ आसन पर पग रखके और अवसक्थिक (गोड़ों को उठाये हुए) होकर तथा खड़ाऊँपर चढ़कर आचमन करने से कभी भी शुद्ध नहीं होता ॥ २१ ॥ जिसने संध्या और अग्निहोत्र न किया हो वह स्नान करके सावधानी से आठ हजार गायत्री का जप करे ॥२२॥ सूतक का अन्न नवश्राद्ध और मासिक श्राद्ध का अन्न जो ब्रह्मचारी खाता है वह तीन दिन रात व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ २३ ॥ कामदेव से सताया हुआ जो ब्रह्मचारी स्त्री का भोग करता है वह सावधान होकर एक प्राजापत्यकृच्छ्र व्रत करे ॥२४॥ जो ब्रह्मचारी कदाचित् शहद और मांस को खाता है वह प्राजापत्यव्रत करके मौञ्जी मेखला का होम करके शुद्ध होता है ॥ २५ ॥

संवर्त्तस्मृतिः ॥ ५

निर्वपेत्तुपुरोडाशं ब्रह्मचारीतुपर्वणि ।
मन्त्रैःशाकलहोमांगै रगनावाज्यंचहोमयेत् ॥२६॥
ब्रह्मचारीतुयःस्कन्दे-त्कामतःशुक्रमात्मनः ।
अवकीर्णीव्रतं कुर्यात्-स्नात्वाशुद्ध्येदकामतः ॥२७॥
भिक्षाटनमटित्वातु स्वस्थोयै कान्नमश्नुते ।
अस्नात्वाचैवयोभुंक्ते गायत्र्यष्टशतंजपेत् ॥२८॥
शूद्रहस्तेनयोश्नीयात् पानीयंवापिबेत्क्वचित् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥२९॥
भुक्त्वापर्युषितोच्छिष्टं भुक्त्वाऽन्नंकेशदूषितम् ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥३०॥
शूद्राणांभाजनेभुक्त्वा भुक्त्वावाभिन्नभाजने ।
अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥३१॥
दिवास्वपितियःस्वस्थो ब्रह्मचारीकथंचन ।
स्नात्वासूर्य्यंसमीक्षेत गायत्र्यष्टशतंजपेत् ॥३२॥


ब्रह्मचारी पर्व के दिन पुरोडाश से होम करे और शाकल होम के ( वैश्वानरो० ) इत्यादि कः मन्त्रों से घृत का होम करे ॥ २६ ॥ यदि ब्रह्मचारी जान कर अपने वीर्य को निकाले तो अवकीर्णी के प्राय-श्चित्त से, और अज्ञान से वीर्य निकल जाय तो स्नान करके शुद्ध होता है ॥ २७ ॥ जो भिक्षा मांग कर अपनी स्वस्थ अवस्था में एक का अन्न खा ता है अथवा जो बिना स्नान किये खाता है वह आठ सौ ८०० गायत्री का जप करे ॥२८॥ जो शूद्र के हाथ का भोजन अथवा पानी पीता है वह एक दिन रात उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥२९॥ बासा उच्छिष्ट और जिस में केश पड़े हों ऐसे अन्न को खाकर एक दिन रात उपवास कर पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ ३० ॥ शूद्रों के बरतनों में अथवा फूटे बरतन में भोजन कर एक दिन रात उपवास कर पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥३१॥ जो ब्रह्मचारी स्वस्थ अवस्था में दिन में कदाचित् सोवे तो स्नान करके सूर्य का दर्शन करे और आठ सौ ८०० गायत्री का जप करे । ३२ ॥ यह धर्म प्रथम आश्रमवासि

६ भाषाधर्मसंहिता ॥

एषधर्मःसमाख्यातः प्रथमाश्रमवासिनाम् । एवंसंवर्त्तमानस्तु प्राप्नोतिपरमांगतिम् ॥३३॥ अतोद्विजःसमावृत्तः सवर्णांस्त्रियमुद्वहेत् । कुलेमहतिसम्भूतां लक्षणैःतुसमन्विताम् ॥३४॥ ब्राह्मेणैवविवाहेन शीलरूपगुणान्विताम् । अतःपंचमहायज्ञा-न्कुर्यादहरहर्द्विजः ॥३५॥ नहापयेत्तुतान्शक्तः श्रेयस्कामःकदाचन । हानिंतेषांतुदुर्वीत सदामरणजन्मनोः ॥ ३६ ॥ विप्रोदशाहमासीत दानाध्ययनवर्जितः । क्षत्रियोद्वादशाहानि वैश्यःपंचदशैवतु ॥ ३७ ॥ शूद्रःशुद्ध्येन्निमासेन संवर्त्तवचनंयथा । प्रेतायान्नंजलंदेयं स्नात्वात्तद्गोत्रजैःसह ॥ ३८ ॥


(ब्रह्मचारी) यों का कहा जो इस के अनुसार आचरण करता है वह परम-गति को प्राप्त होता है ॥३३॥ इस ब्रह्मचर्य आश्रम से समावर्त्तन संस्कार किया द्विज ऐसी स्त्री के साथ विवाह करे जो अपने वर्ण की हो तथा अच्छे कुल में उत्पन्न हुई हो-और शुभ लक्षणों से युक्त हो ॥ ३४ ॥ तथा शीलरूप गुण इन से भी युक्त हो उस स्त्री के साथ ब्राह्म (१) विवाह करे और इस के अनन्तर प्रतिदिन द्विज पञ्चमहायज्ञ करे ॥ ३५ ॥ अपना कल्याण चाहने वाला द्विज इन पञ्च महायज्ञों को कदाचित् भी न त्यागे परन्तु जन्म और मरण सूतक में उनको कभी न करे ॥३६॥ उक्त सूतकों में दान और वेद पढ़ने से रहित दश दिन तक ब्राह्मण क्षत्रिय बारह दिन तक वैश्य पंद्रह दिन तक रहे ॥३७॥ और संवर्त्त ऋषि के वचन के अनुसार शूद्र एक महीने में शुद्ध होता है और संपूर्ण सगोत्री मिल कर प्रेत को अन्न और जल दें ॥ ३८ ॥


(१) उत्तम वस्त्र तथा भूषण पहनाकर विद्वान् और सुशील लड़के को बुलाकर कन्या को देना-यह ब्राह्म विवाह कहलाता है ॥

प्रथमेऽह्नितृतीयेच सप्तमेनवमेतथा ।

संवर्त्तस्मृतिः ॥ ७

प्रथमेऽह्नितृतीयेच सप्तमेनवमेतथा । चतुर्थेऽहनि कर्त्तव्य-मस्थिसंचयनंद्विजैः ॥ ३९ ॥ ततःसंचयनादूर्ध्व-मंगस्पर्शोविधीयते । चतुर्थेऽहनि विप्रस्य षष्ठेवैक्षत्रियस्यच ॥ ४० ॥ अष्टमे दशमे चैव स्पर्शःस्याद्वैश्यशूद्रयोः । जातस्यापिविधिर्दृष्ट एषएवमहर्षिभिः ॥ ४१ ॥ दशरात्रेणशुद्ध्येत विप्रोवेदविवर्जितः । जातेपुत्रेपितुःस्नानं सचैलंतुविधीयते ॥ ४२ ॥ माताशुद्ध्येद्दशाहेन स्नानात्तुस्पर्शनंपितुः । होमंत्रप्रकुर्वीत शुष्कान्नेनफलेनवा ॥ ४३ ॥ पंचयज्ञविधानंतु नकुर्यान्मृत्युजन्मनोः । दशाहात्तुपरंसम्य-ग्विप्रोधीयोतधर्मवित् ॥ ४४ ॥ दानंतुविविधंदेय-मशुभानांविनाशनम् । यद्यदिष्टतमंलोके यच्चास्यदयितंभवेत् ॥ ४५ ॥


प्रथम तृतीय चतुर्थ तथा नवमे दिन द्विज अस्थि संचयन करै ॥ ३९ ॥ पुनः अस्थि संचयन के अनन्तर किसी के शरीर का स्पर्श करे चतुर्थ दिन ब्राह्मणका तथा छठें दिन क्षत्रिय का ॥४०॥ आठ वे दिन वैश्य का और दशवें दिन शूद्र का स्पर्शकहा है-और महर्षियों ने जन्मसूतक में यही विधि देखी है ॥४१॥ जिसने वेद न पढ़ा हो ऐसा ब्राह्मण दशदिन में शुद्ध होता है पुत्र के पैदा होने पर पिता को सचैल स्नान विहित है ॥४२॥ माता दश दिन में शुद्ध होती है और पिता का स्नान करने से भी स्पर्श करना उचित है और जन्म सूतक में सूखे अन्न या फल से होम करै ॥ ४३ ॥ मरण-और जन्म सूतक में पांचयज्ञों की विधि न करै दशदिन के अनंतर धर्म का जानने वाला ब्राह्मण सम्यक् प्रकार वेद पढ़े॥४४॥अशुभों (पापों) का नाश करने वाला अनेक प्रकार का दान दे और जो २ जगत् में इस मनुष्य को इष्ट और प्यारा हो ॥ ४५ ॥

८ माधवर्षसंहिता ॥

तत्तद्गुणवतेदेयं तदेवाक्षयमिच्छता । नानाविधानिद्रव्याणि धान्यानिसुबहूनिच ॥ ४६ ॥ समुद्रेयानिरत्नानि नरोविगतकल्मषः । दत्वागुणाढ्यविप्राय महतींश्रियमश्नुयात् ॥ ४७ ॥ गंधमाभरणंमाल्यं यःप्रयच्छतिधर्मवित् । ससुगंधःसदाहृष्टो यत्रतत्रोपजायते ॥ ४८ ॥ श्रोत्रियायकुलीनाया-भ्यर्थिनेहिविशेषतः । यद्दानंदीयतेभक्त्या तद्भवेत्सुमहत्फलम् ॥ ४९ ॥ आहूयशीलसंपन्नं श्रुतेनाभिजनेनच । शुचिंविप्रंमहाप्राज्ञं हव्यकव्यैःसुपूजयेत् ॥ ५० ॥ नानाविधानिद्रव्याणि रसवन्तीप्सितानिच। श्रेयस्कामेनदेयानि यद्वेवाक्षयमिच्छता ॥ ५१ ॥ वस्त्रदातासुवेषःस्याद्रूप्यदोरूपमेवच । हिरण्यदःसमृद्धिंच तेजश्चायुश्चविंदति ॥ ५२ ॥


अपने अक्षय पुण्य की इच्छा करने वाले पुरुष को वही २ वस्तु गुणवान् पुरुष को देनी चाहिये नाना प्रकार के द्रव्य और बहुत से अन्न॥४६॥ मुद्रा और रत्न इन को पाप रहित मनुष्य गुणवाले ब्राह्मण को देकर बड़ी लक्ष्मी को प्राप्त होता है॥४७॥ गंध-भूषण-फूल इन को धर्म का ज्ञाता पुरुषदेकर सुगंध सहित और सदा प्रसन्न जहां तहां उत्पन्न होता है ॥ ४८ ॥ जो दान वेदपाठी तथा कुलीन और विशेष कर अभ्यागत को दिया जाता है वह बड़े फल को देता है ॥ ४९ ॥ सुशील वेद के ज्ञाता कुलीन तथा शुद्ध और अत्यंत बुद्धिमान् ब्राह्मण को बुलाकर हव्य (देवताओं के अन्न) से और कव्य (पितरों के अन्न से पूजे ॥५०॥ नाना प्रकार के द्रव्य जो रसवाले हों और लेने वाले को जो वांछित हों वेही कल्याण और अक्षय फल के चाहने वाले पुरुष को देने चाहिये ॥ ५१ ॥ वस्त्र के दाता का उत्तम वेष और चांदी के दाता का सुन्दर रूप होता है और सोने के दाता को धन की वृद्धि तथा आयुः (अवस्था) मिलती है ॥ ५२ ॥

संवर्त्तस्मृतिः॥ ९

भूताभयप्रदानेन सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
दीर्घमायुश्चलभते सुखीचैवसदाभवेत् ॥ ५३ ॥
धान्योदकप्रदायीच सर्पिदःसुखमेधते ।
अलंकृतस्त्वलंकारं दाताप्नोतितत्फलम् ॥ ५४ ॥
फलमूलानिविप्राय शाकानिविविधानिच ।
सुरभीणिचपुष्पाणि दत्वाप्राज्ञस्तुजायते ॥ ५५ ॥
तांबूलंचैवयोदद्याद्-ब्राह्मणेभ्योविचक्षणः ।
मेधावीसुभगःप्राज्ञो दर्शनीयश्चजायते ॥५६॥
पादुकोपानहौछत्रं शयनान्यासनानिच ।
विविधानिचयानानि दत्वाद्व्रव्यपतिर्भवेत् ॥५७॥
दद्याद्यःशिशिरेवन्हिं बहुकाष्ठंप्रयत्नतः ।
कायाग्निदीप्तिप्राज्ञत्वं रूपंसौभाग्यमाप्नुयात् ॥५८॥
औषधंस्नेहमाहारं रोगिणोरोगशान्तये ।
दत्त्वास्याद्रोगरहितः सुखीदीर्घायुरेवच ॥५९॥


प्राणियों को अभयदान देने से संपूर्ण कामना प्राप्त होतीं बड़ी अवस्था और सदा सुख मिलते हैं ॥५३॥ अन्न जल और घी का दान देने वाला सुख भोगता है और जो भूषण वाला हो वह भूषण को देकर बड़े फल को प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥ फलमूल नाना प्रकार के शाक (भाजी) और सुगन्ध वाले फूल इन्हें ब्राह्मण को देकर पंडित होता है ॥५५॥ जो विद्वान् पुरुष ब्राह्मणों को पान देता है वह बुद्धिमान् पंडित तथा दर्शनीय और भाग्यशाली होता है॥५६॥ खड़ाउं-जूता-छाता-शय्या आसन और नाना प्रकारके यान (सवारी) इनको देकर द्रव्यपति (धनी) होता है ॥५७॥ जो शिशिर(जाड़े)में बहुत सी लकड़ी सहित अग्निप्रयत्न से देता है वह जठराग्नि की दीप्ति वाला, पंडित. रूपवान् और भाग्यवान् होता है ॥५८॥ औषध स्नेह [ घी ] मिला भोजन इन को रोगियोंके रोग दूर करने के लिये देकर रोग रहित तथा सुखी और बड़ी अवस्था वाला होता है ॥ ५९ ॥ जो

१० भाषार्थसहिता ॥

इन्धनानिचयोदद्या-द्विप्रेभ्यःशिशिरागमे । नित्यंजयतिसंग्रामे श्रियायुक्तस्तुदीव्यते ॥६०॥ अलंकृत्यतुयःकन्यां वरायसदृशायवै । ब्राह्मेणतुविवाहेन दद्यात्तांसुसुपूजिताम् ॥६१॥ सकन्यायाःप्रदानेन श्रेयोविन्दतिपुष्कलम् । साधुवादंसवैसद्भिः कीर्त्तिंप्राप्नोतिपुष्कलाम् ॥६२॥ ज्योतिष्टोमातिरात्राणां शतंशतगुणीकृतम् । प्राप्नोतिपुरुषोदत्वा होममन्त्रैश्चसंस्कृताम् ॥६३॥ तांदत्त्वातुपिताकन्यां भूषणाच्छादनाशनैः । पूजयन्स्वर्गमाप्नोति नित्यमुत्सववृद्धिषु ॥६४॥ रोमकालेतुसम्प्राप्ते सोमोभुंक्तेऽथकन्यकाम् । रजोहृष्ट्वातुगन्धर्वा कुचौदृष्ट्वा तु पावकः ॥६५॥ अष्टवर्षाभवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी ।


पुरुष जाड़े के दिनों में ब्राह्मणों को इन्धन देता है वह युद्ध में शत्रुओं को जीतता और लक्ष्मी युक्त होकर देदीप्यमान होता है ॥६०॥ जो सम्यक् प्रकार कन्या को भूषण और वस्त्र पहना कर कन्या के समान वर को ब्राह्मविवाह-विधि से सत्कार करके देता है ॥ ६१॥ वह कन्याके देनेसे महान् श्रेय (कल्याण) को प्राप्त होता है और सज्जनों में साधुवाद [ भलाई ] तथा बड़ी कीर्त्ति को प्राप्त होता है ॥६२॥ होम के मन्त्रों से संस्कार को प्राप्त हुई कन्या को देकर दश सहस्र ज्योतिष्टोम और अतिरात्र यज्ञ के फल को प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥ भूषण और वस्त्रों से कन्या को उत्सव तथा वृद्धि ( पुत्र जन्म ) में नित्य पूजा करता हुआ पिता स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥६४॥ रोम फूटने के समय कन्या को चन्द्रमा रजोधर्शनके समय गन्धर्व और कुचाओं को देखकर अग्नि भोगता है (यहां रोम रज और कुच बाहर निकले लेने इष्ट नहीं किन्तु भीतर शरीर में पहिले अंकुरित हुए लेने हैं क्योंकि रजोधर्शन से पहिले विवाह न हो तो पाप होता यह सब धर्मशास्त्रोंकी एकसम्मति है) ॥६५॥ आठ वर्ष की कन्या गौरी नौ वर्ष

संवर्त्तस्मृतिः ॥ ११

दशवर्षाभवेत्कन्या अतऊर्ध्वंरजस्वला ॥ ६६ ॥
माताचैवपिताचैव ज्येष्ठोभ्रातातथैवच ।
त्रयस्तेनरकंयान्ति दृष्ट्वाकन्यांरजस्वलाम् ॥६७॥
तस्माद्विवाहयेत्कन्यां यावन्नर्त्तुमतीभवेत् ।
विवाहोह्यष्टवर्षायाः कन्यायास्तुप्रशस्यते ॥ ६८ ॥
तैलामलकदाताच स्नानाभ्यंगप्रदायकः ।
नरःप्रहृष्टश्चासीत सुभगश्चोपजायते ॥ ६९ ॥
अनड्वाहौतुयोदद्याद् द्विजेसीरेणसंयुतौ ।
अलंकृत्ययथाशक्त्या धूर्वहौशुभलक्षणौ ॥ ७० ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा सर्वकामसमन्वितः ।
वर्षाणिवसतेस्वर्गे रोमसंख्याप्रमाणतः ॥ ७१ ॥
धेनुंचयोद्विजेदद्याद् लंकृत्यपयस्विनीम् ।
कांस्यवस्त्रादिभिर्युक्तां स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ७२ ॥
भूमिसस्यवतीं श्रेष्ठां ब्राह्मणेवेदपारगे ।


को रोहिणी दश वर्ष की कन्या और इस के पश्चात् रजस्वला होती है ॥ ६६ ॥
माता पिता और जेठा भाई ये तीनों रजस्वला कन्या को देखकर नरक में जाते हैं ॥ ६७ ॥ इस लिये जब तक रजस्वला न हो तब तक ही कन्या का विवाह करदे और आठ वर्ष की कन्या का विवाह श्रेष्ठ कहा है ॥ ६८ ॥ तेल आंवले स्नान का जल और उबटना इन को जो देता है वह मनुष्य सदा आनंद में मग्न रहता है और भाग्यवान् होता है ॥ ६९ ॥ जो पुरुष जोतने के योग्य अच्छे लक्षण वाले दो बैल यथाशक्ति सजाकर इलमंडित ब्राह्मण को देता है ॥ ७० ॥ सब पापों से शुद्ध होकर सर्व कामना सहित वह पुरुष उतने वर्ष तक स्वर्ग में बसता है जितने रोम बैलों के देहपर हों ॥ ७१ ॥ जो दूध देती तथा कांसे का पात्र (लोटा) और वस्त्र सहित गौ को भूषित (सजा करके) ब्राह्मण को देता है वह स्वर्गलोक में महत्व को प्राप्त होता है ॥ ७२ ॥ अन्न जिस में खड़ा हो ऐसी श्रेष्ठ पृथ्वी और आधी