अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपस्तम्बस्मृतिः ॥ २५
भोक्ताचमोचकश्चैवपश्चादुरतिदुष्कृतम् । यस्तुभुंजतिभुक्तंवा दुष्टंवापिविशेषतः ॥ १७ ॥ अहोरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति । उदकेचोदकस्थस्तु स्थलस्थश्चस्थलेशुचिः ॥ १८ ॥ पादौस्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतःशुचिः । उत्तीर्याचामेदूदका-दवतीर्यउपस्पृशेत् ॥ १९ ॥ एवंतुश्रेयसायुक्तोवरुणेनाभिपूज्यते । अग्न्यागारेगवांगोष्ठे ब्राह्मणानांचसन्निधौ ॥ २० ॥ स्वाध्यायंभोजनेचैव पादुकानांविसर्जनम् । जन्मप्रभृतिसंस्कारे श्मशानांतेचभोजनम् ॥ २१ ॥ असर्पिंडैर्नकर्त्तव्यं चूडाकार्य्यविशेषतः । याजकानांनवश्राद्धं संग्रहेचैवभोजनम् ॥ २२ ॥ स्त्रीणांप्रथमगर्भेच भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् ।
भी भोक्ता और छुटानेवाला दोनों पाप के भागी होते हैं-जो खाये हुए जूठे अथवा अत्यन्त दुष्ट वस्तु को खाता है ॥ १७ ॥ वह एकदिन उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है-जल में बैठा और स्थल में बैठा शुद्ध होता है ॥१८॥ दोनों स्थानोंपर स्थित पुरुष दोनों स्थानोंपर पग रखकर आचमन करके शुद्ध होता है यदि जल में पग हों तो तटपर निकाल कर आचमन करै प्रयोजन यह कि आधा जल में आधा बाहर बैठ आचमनादि न करे ॥१९॥ ऐसे कल्याण से युक्त पुरुष को वरुण भी पूजता है-अग्नि और गोओं की शा-ला-तथा ब्राह्मणोंके समीप॥२०॥ स्वाध्याय (वेदकापाठ) भोजन इतनेस्थानोंपर खडाउं त्यागदे-जन्म आदि संस्कार-श्मशानांत (मरेकी क्रिया) का भोजन ॥२१॥ असपिण्डों को नहीं करना चाहिये तथा चूड़ाकर्म (मुंडन) में तो विशेष कर नकरें-यज्ञ कराने वाले का अन्न नवश्राद्ध (जो मरने से ११ वें दिन होता है) संग्रह तथा (बहुत मनुष्यों के साथ) में भोजन ॥२२॥ तथा स्त्रियों के प्रथम गर्भाधान में भोजन करके चांद्रायण व्रत करै। ब्रह्मोदन (यज्ञादि जो विशेष भात
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