अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ | भाषार्थसहिता ॥
ब्रह्मौदनेऽवसानेच सीमंतोन्नयनेतथा ॥ २३ ॥ अन्नश्राद्धेमृतश्राद्धे भुक्त्वाचांद्रायणंचरेत् । अप्रजातातुनारीस्या-न्नाश्नीयाद्दैवतेऽगृहे ॥ २४ ॥ अथभुंजीतमोहाद्यः पूयसंनरकंप्रजेत् । अल्पेनापिहिशुल्केन पिताकन्यांददांतियः ॥ २५ ॥ रौरवेबहुवर्षाणि पुरीषंमूत्रमश्नुते । स्त्रीधनानितुयेमोहा-दुपजीवंतिबांधवाः ॥ २६ ॥ स्त्रीणयानानिवस्त्राणि तेपापायांत्यधोगतिम् । राजाऽन्नमोज आदत्ते शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ २७ ॥ असंस्कृतंतुयोभुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् । मृतकेसूतकेचैव गृहीते शशिभास्करे ॥ २८ ॥ हस्तिच्छायांतुयोभुंक्ते सपापःपुरुषोभवेत् ।
होताहै ) अवसान (जब ब्राह्मण जीम चुकेहों) और सीमंतोन्नयन (अठवांसा) ॥२३॥ अन्न के श्राद्ध-मरे के श्राद्ध-इन में भोजन करे तो चांदायण व्रत करना चाहिये । जिस स्त्री के संतान न हुआ हो उस के घर भोजन न करे ॥२४॥ जो अज्ञान से खालेवेतो वह पूयस [पीब] के नरक में जाता है-जो पिता कुछ भी शुल्क [मोल] लेकर कन्या को देता है ॥२५॥ वह बहुत वर्षों तक रौरव नरक में विष्ठा मूत्र खाता है-जो कन्या के भाई आदि अज्ञान से स्त्री के धनों से गुजारा करते हैं॥२६॥ तथा स्त्रियों के सोना यान [सवारी] वस्त्र आदि को वर्तते हैं। वे पापी अधोगति (नरक) में जाते हैं-राजा का अन्न बल को और शूद्र का अन्न ब्रह्मतेज को नष्ट करता है ॥ २७ ॥ जो मनुष्य असंस्कृत [ अपवित्र ] अन्न को खाता है वह पृथिवी के मल को खाता है। मरने पर वा जन्म के सूतक में तथा चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में तथा गजच्छाया * में जो पुरुष खाता है
* जब कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी हो और सूर्य हस्त नक्षत्र पर हों तथा चन्द्रमा मघा नक्षत्र पर हों उसे गजच्छाया योग कहते हैं ।