अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ माधवर्षसंहिता ॥
तत्तद्गुणवतेदेयं तदेवाक्षयमिच्छता । नानाविधानिद्रव्याणि धान्यानिसुबहूनिच ॥ ४६ ॥ समुद्रेयानिरत्नानि नरोविगतकल्मषः । दत्वागुणाढ्यविप्राय महतींश्रियमश्नुयात् ॥ ४७ ॥ गंधमाभरणंमाल्यं यःप्रयच्छतिधर्मवित् । ससुगंधःसदाहृष्टो यत्रतत्रोपजायते ॥ ४८ ॥ श्रोत्रियायकुलीनाया-भ्यर्थिनेहिविशेषतः । यद्दानंदीयतेभक्त्या तद्भवेत्सुमहत्फलम् ॥ ४९ ॥ आहूयशीलसंपन्नं श्रुतेनाभिजनेनच । शुचिंविप्रंमहाप्राज्ञं हव्यकव्यैःसुपूजयेत् ॥ ५० ॥ नानाविधानिद्रव्याणि रसवन्तीप्सितानिच। श्रेयस्कामेनदेयानि यद्वेवाक्षयमिच्छता ॥ ५१ ॥ वस्त्रदातासुवेषःस्याद्रूप्यदोरूपमेवच । हिरण्यदःसमृद्धिंच तेजश्चायुश्चविंदति ॥ ५२ ॥
अपने अक्षय पुण्य की इच्छा करने वाले पुरुष को वही २ वस्तु गुणवान् पुरुष को देनी चाहिये नाना प्रकार के द्रव्य और बहुत से अन्न॥४६॥ मुद्रा और रत्न इन को पाप रहित मनुष्य गुणवाले ब्राह्मण को देकर बड़ी लक्ष्मी को प्राप्त होता है॥४७॥ गंध-भूषण-फूल इन को धर्म का ज्ञाता पुरुषदेकर सुगंध सहित और सदा प्रसन्न जहां तहां उत्पन्न होता है ॥ ४८ ॥ जो दान वेदपाठी तथा कुलीन और विशेष कर अभ्यागत को दिया जाता है वह बड़े फल को देता है ॥ ४९ ॥ सुशील वेद के ज्ञाता कुलीन तथा शुद्ध और अत्यंत बुद्धिमान् ब्राह्मण को बुलाकर हव्य (देवताओं के अन्न) से और कव्य (पितरों के अन्न से पूजे ॥५०॥ नाना प्रकार के द्रव्य जो रसवाले हों और लेने वाले को जो वांछित हों वेही कल्याण और अक्षय फल के चाहने वाले पुरुष को देने चाहिये ॥ ५१ ॥ वस्त्र के दाता का उत्तम वेष और चांदी के दाता का सुन्दर रूप होता है और सोने के दाता को धन की वृद्धि तथा आयुः (अवस्था) मिलती है ॥ ५२ ॥