भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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संवर्त्तस्मृतिः॥ ९

भूताभयप्रदानेन सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
दीर्घमायुश्चलभते सुखीचैवसदाभवेत् ॥ ५३ ॥
धान्योदकप्रदायीच सर्पिदःसुखमेधते ।
अलंकृतस्त्वलंकारं दाताप्नोतितत्फलम् ॥ ५४ ॥
फलमूलानिविप्राय शाकानिविविधानिच ।
सुरभीणिचपुष्पाणि दत्वाप्राज्ञस्तुजायते ॥ ५५ ॥
तांबूलंचैवयोदद्याद्-ब्राह्मणेभ्योविचक्षणः ।
मेधावीसुभगःप्राज्ञो दर्शनीयश्चजायते ॥५६॥
पादुकोपानहौछत्रं शयनान्यासनानिच ।
विविधानिचयानानि दत्वाद्व्रव्यपतिर्भवेत् ॥५७॥
दद्याद्यःशिशिरेवन्हिं बहुकाष्ठंप्रयत्नतः ।
कायाग्निदीप्तिप्राज्ञत्वं रूपंसौभाग्यमाप्नुयात् ॥५८॥
औषधंस्नेहमाहारं रोगिणोरोगशान्तये ।
दत्त्वास्याद्रोगरहितः सुखीदीर्घायुरेवच ॥५९॥


प्राणियों को अभयदान देने से संपूर्ण कामना प्राप्त होतीं बड़ी अवस्था और सदा सुख मिलते हैं ॥५३॥ अन्न जल और घी का दान देने वाला सुख भोगता है और जो भूषण वाला हो वह भूषण को देकर बड़े फल को प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥ फलमूल नाना प्रकार के शाक (भाजी) और सुगन्ध वाले फूल इन्हें ब्राह्मण को देकर पंडित होता है ॥५५॥ जो विद्वान् पुरुष ब्राह्मणों को पान देता है वह बुद्धिमान् पंडित तथा दर्शनीय और भाग्यशाली होता है॥५६॥ खड़ाउं-जूता-छाता-शय्या आसन और नाना प्रकारके यान (सवारी) इनको देकर द्रव्यपति (धनी) होता है ॥५७॥ जो शिशिर(जाड़े)में बहुत सी लकड़ी सहित अग्निप्रयत्न से देता है वह जठराग्नि की दीप्ति वाला, पंडित. रूपवान् और भाग्यवान् होता है ॥५८॥ औषध स्नेह [ घी ] मिला भोजन इन को रोगियोंके रोग दूर करने के लिये देकर रोग रहित तथा सुखी और बड़ी अवस्था वाला होता है ॥ ५९ ॥ जो