अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१० भाषार्थसहिता ॥
इन्धनानिचयोदद्या-द्विप्रेभ्यःशिशिरागमे । नित्यंजयतिसंग्रामे श्रियायुक्तस्तुदीव्यते ॥६०॥ अलंकृत्यतुयःकन्यां वरायसदृशायवै । ब्राह्मेणतुविवाहेन दद्यात्तांसुसुपूजिताम् ॥६१॥ सकन्यायाःप्रदानेन श्रेयोविन्दतिपुष्कलम् । साधुवादंसवैसद्भिः कीर्त्तिंप्राप्नोतिपुष्कलाम् ॥६२॥ ज्योतिष्टोमातिरात्राणां शतंशतगुणीकृतम् । प्राप्नोतिपुरुषोदत्वा होममन्त्रैश्चसंस्कृताम् ॥६३॥ तांदत्त्वातुपिताकन्यां भूषणाच्छादनाशनैः । पूजयन्स्वर्गमाप्नोति नित्यमुत्सववृद्धिषु ॥६४॥ रोमकालेतुसम्प्राप्ते सोमोभुंक्तेऽथकन्यकाम् । रजोहृष्ट्वातुगन्धर्वा कुचौदृष्ट्वा तु पावकः ॥६५॥ अष्टवर्षाभवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी ।
पुरुष जाड़े के दिनों में ब्राह्मणों को इन्धन देता है वह युद्ध में शत्रुओं को जीतता और लक्ष्मी युक्त होकर देदीप्यमान होता है ॥६०॥ जो सम्यक् प्रकार कन्या को भूषण और वस्त्र पहना कर कन्या के समान वर को ब्राह्मविवाह-विधि से सत्कार करके देता है ॥ ६१॥ वह कन्याके देनेसे महान् श्रेय (कल्याण) को प्राप्त होता है और सज्जनों में साधुवाद [ भलाई ] तथा बड़ी कीर्त्ति को प्राप्त होता है ॥६२॥ होम के मन्त्रों से संस्कार को प्राप्त हुई कन्या को देकर दश सहस्र ज्योतिष्टोम और अतिरात्र यज्ञ के फल को प्राप्त होता है ॥ ६३ ॥ भूषण और वस्त्रों से कन्या को उत्सव तथा वृद्धि ( पुत्र जन्म ) में नित्य पूजा करता हुआ पिता स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥६४॥ रोम फूटने के समय कन्या को चन्द्रमा रजोधर्शनके समय गन्धर्व और कुचाओं को देखकर अग्नि भोगता है (यहां रोम रज और कुच बाहर निकले लेने इष्ट नहीं किन्तु भीतर शरीर में पहिले अंकुरित हुए लेने हैं क्योंकि रजोधर्शन से पहिले विवाह न हो तो पाप होता यह सब धर्मशास्त्रोंकी एकसम्मति है) ॥६५॥ आठ वर्ष की कन्या गौरी नौ वर्ष