भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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संवर्त्तस्मृतिः ॥ ७

प्रथमेऽह्नितृतीयेच सप्तमेनवमेतथा । चतुर्थेऽहनि कर्त्तव्य-मस्थिसंचयनंद्विजैः ॥ ३९ ॥ ततःसंचयनादूर्ध्व-मंगस्पर्शोविधीयते । चतुर्थेऽहनि विप्रस्य षष्ठेवैक्षत्रियस्यच ॥ ४० ॥ अष्टमे दशमे चैव स्पर्शःस्याद्वैश्यशूद्रयोः । जातस्यापिविधिर्दृष्ट एषएवमहर्षिभिः ॥ ४१ ॥ दशरात्रेणशुद्ध्येत विप्रोवेदविवर्जितः । जातेपुत्रेपितुःस्नानं सचैलंतुविधीयते ॥ ४२ ॥ माताशुद्ध्येद्दशाहेन स्नानात्तुस्पर्शनंपितुः । होमंत्रप्रकुर्वीत शुष्कान्नेनफलेनवा ॥ ४३ ॥ पंचयज्ञविधानंतु नकुर्यान्मृत्युजन्मनोः । दशाहात्तुपरंसम्य-ग्विप्रोधीयोतधर्मवित् ॥ ४४ ॥ दानंतुविविधंदेय-मशुभानांविनाशनम् । यद्यदिष्टतमंलोके यच्चास्यदयितंभवेत् ॥ ४५ ॥


प्रथम तृतीय चतुर्थ तथा नवमे दिन द्विज अस्थि संचयन करै ॥ ३९ ॥ पुनः अस्थि संचयन के अनन्तर किसी के शरीर का स्पर्श करे चतुर्थ दिन ब्राह्मणका तथा छठें दिन क्षत्रिय का ॥४०॥ आठ वे दिन वैश्य का और दशवें दिन शूद्र का स्पर्शकहा है-और महर्षियों ने जन्मसूतक में यही विधि देखी है ॥४१॥ जिसने वेद न पढ़ा हो ऐसा ब्राह्मण दशदिन में शुद्ध होता है पुत्र के पैदा होने पर पिता को सचैल स्नान विहित है ॥४२॥ माता दश दिन में शुद्ध होती है और पिता का स्नान करने से भी स्पर्श करना उचित है और जन्म सूतक में सूखे अन्न या फल से होम करै ॥ ४३ ॥ मरण-और जन्म सूतक में पांचयज्ञों की विधि न करै दशदिन के अनंतर धर्म का जानने वाला ब्राह्मण सम्यक् प्रकार वेद पढ़े॥४४॥अशुभों (पापों) का नाश करने वाला अनेक प्रकार का दान दे और जो २ जगत् में इस मनुष्य को इष्ट और प्यारा हो ॥ ४५ ॥