अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ भाषाधर्मसंहिता ॥
एषधर्मःसमाख्यातः प्रथमाश्रमवासिनाम् । एवंसंवर्त्तमानस्तु प्राप्नोतिपरमांगतिम् ॥३३॥ अतोद्विजःसमावृत्तः सवर्णांस्त्रियमुद्वहेत् । कुलेमहतिसम्भूतां लक्षणैःतुसमन्विताम् ॥३४॥ ब्राह्मेणैवविवाहेन शीलरूपगुणान्विताम् । अतःपंचमहायज्ञा-न्कुर्यादहरहर्द्विजः ॥३५॥ नहापयेत्तुतान्शक्तः श्रेयस्कामःकदाचन । हानिंतेषांतुदुर्वीत सदामरणजन्मनोः ॥ ३६ ॥ विप्रोदशाहमासीत दानाध्ययनवर्जितः । क्षत्रियोद्वादशाहानि वैश्यःपंचदशैवतु ॥ ३७ ॥ शूद्रःशुद्ध्येन्निमासेन संवर्त्तवचनंयथा । प्रेतायान्नंजलंदेयं स्नात्वात्तद्गोत्रजैःसह ॥ ३८ ॥
(ब्रह्मचारी) यों का कहा जो इस के अनुसार आचरण करता है वह परम-गति को प्राप्त होता है ॥३३॥ इस ब्रह्मचर्य आश्रम से समावर्त्तन संस्कार किया द्विज ऐसी स्त्री के साथ विवाह करे जो अपने वर्ण की हो तथा अच्छे कुल में उत्पन्न हुई हो-और शुभ लक्षणों से युक्त हो ॥ ३४ ॥ तथा शीलरूप गुण इन से भी युक्त हो उस स्त्री के साथ ब्राह्म (१) विवाह करे और इस के अनन्तर प्रतिदिन द्विज पञ्चमहायज्ञ करे ॥ ३५ ॥ अपना कल्याण चाहने वाला द्विज इन पञ्च महायज्ञों को कदाचित् भी न त्यागे परन्तु जन्म और मरण सूतक में उनको कभी न करे ॥३६॥ उक्त सूतकों में दान और वेद पढ़ने से रहित दश दिन तक ब्राह्मण क्षत्रिय बारह दिन तक वैश्य पंद्रह दिन तक रहे ॥३७॥ और संवर्त्त ऋषि के वचन के अनुसार शूद्र एक महीने में शुद्ध होता है और संपूर्ण सगोत्री मिल कर प्रेत को अन्न और जल दें ॥ ३८ ॥
(१) उत्तम वस्त्र तथा भूषण पहनाकर विद्वान् और सुशील लड़के को बुलाकर कन्या को देना-यह ब्राह्म विवाह कहलाता है ॥