भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२ भाषाप०संहिता ॥

सादित्यां पश्चिमां संध्या-मर्द्धास्तमितभास्करे ॥ ६ ॥ तिष्ठन्पूर्वांजपंस्कुर्या-त्सावित्रोमार्कदर्शनात् । आसीनः पश्चिमां संध्यां सम्यगृक्षविभावनात् ॥ ७ ॥ अग्निकार्यंचकुर्वीत मेधावीतदनन्तरम् । ततोऽधीयीत वेदंतु वीक्षमाणोगुरोर्मुखम् ॥ ८ ॥ प्रणवंप्राक्प्रयुंजीत व्याहतीस्तदनंतरम् । गायत्रींचानुपूव्येण ततोवेदंसमारभेत् ॥ ९ ॥ हस्तौतु संयतौधार्यौ जानुभ्यामुपरिस्थितौ गुरोरनुमतंकुर्या-त्पठन्नान्यमतिर्भवेत् ॥ १० ॥ सायंप्रातस्तुभिक्षेत ब्रह्मचारीसदाव्रती । निवेद्यगुरवेऽश्नीया-त्प्राङ्मुखोवाग्यतः शुचिः ॥ ११ ॥ सायंप्रातर्द्विजातीना-मशनंश्रुतिनोदितम् । नांतराभोजनंकुर्या-दग्निहोत्रीसमाहितः ॥ १२ ॥


हो चुके हों ॥ ६ ॥ खड़ा होकर सूर्य के दर्शन पर्यन्त प्रातः काल में गायत्री का जप करे और सायंकाल में बैठकर सम्यक् प्रकार नक्षत्रों के उदय पर्यन्त गायत्री का जप करे ॥ ७ ॥ तदनन्तर ज्ञानी पुरुष कुछ नित्य होम करे। फिर पुनः गुरु के मुख को देखता हुआ वेद को पढ़े ॥ ८ ॥ प्रथम प्रणव * को पढ़े तत्पश्चात् तीन व्याहृति पढ़े पुनः क्रम से गायत्री को पढ़े तदनन्तर वेद पढ़ने का आरम्भ करे ॥ ९ ॥ सावधानतया दोनों घोंटू के ऊपर हाथ रख कर सदा गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिये और पढ़ते समय अन्यत्र बुद्धि को न लगावे ॥ १० ॥ व्रत करने वाला ब्रह्मचारी सदैव सायंकाल तथा प्रातःकाल को भिक्षा मागे और उस भिक्षा को गुरु को निवेदन कर पूर्वाभिमुख होकर भोजन करे ॥ ११ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल में द्विजातियों को भोजन करना वेद में कहा है-इस से सावधान हो अग्निहोत्री बीच में भोजन न करे ॥ १२ ॥


* ओंभूः । ओंभुवः । ओंस्वः । ओंत्ससवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्यधीमहि । धियोयोनःप्रचोदयात् ॥