अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्वर्त्तस्मृतिः ॥ ३
आचम्यैवतुभुंजीत भुक्त्वाचोपस्पृशेद्विजः । अनाचांतस्तुयोश्नीया-त्प्रायश्चित्तीयतेतुसः ॥ १३ ॥ अनाचांत पिबेद्यस्तु योपिवाभक्षयेद्विजः । गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपंकुर्व्वन्विशुद्ध्यति ॥ १४ ॥ अकृत्वापादशौचंतु तिष्ठन्मुक्तशिखोपिवा । विनायज्ञोपवीतेन त्वाचांतोप्यशुचिर्भवेत् ॥ १५ ॥ आचामेद्ब्रह्मतीर्थेन चोपवीतोह्युदङ्मुखः । उपवीतीद्विजोनित्यं प्राङ्मुखोवाग्यतःशुचिः । वहिरंतश्चआचांत एवंशुद्धिमवाप्नुयान् ॥ १७ ॥ आमणिबंधाद्धस्तौच पादावद्विर्विशोधयेत् । परिमृज्यद्विरास्यंतु द्वादशांगानिचस्पृशेत् ॥ १८ ॥ स्नात्वापीत्वात्तथाक्षुत्वा भुक्त्वास्पृष्ट्वा द्विजोत्तमः ।
आचमन करने पश्चात् भोजन करे पुनः भोजन करके भी आचमन करे और जो आचमन किये बिना भोजन करता है वह प्रायश्चित्त का भागी होता है॥१३ जो द्विज आचमन किये बिना ही जल पीता है अथवा भोजन करता है वह आठ हजार गायत्री का जप करके सम्यक् प्रकार शुद्ध होता है॥१४॥ पगों के धोये बिना चोटी में गांठ दिये बिना यज्ञोपवीत के बिना और खड़े हुए आचमन करके भी अशुद्ध होता है ॥१५॥ यज्ञोपवीत को धारण करके उत्तराभिमुख होकर ब्रह्मतीर्थ से आचमन करे अथवा यज्ञोपवीत को धारे हुये और पूर्वाभिमुख बैठाहूआ मौनी द्विज नित्य शुद्ध होता है ॥१६॥ जल में बैठा जलमें और स्थल में बैठा स्थल में आचमन करे इस प्रकार बाहिर और अंतः (जल में) आचमन करके शुद्धि को प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ मणि बंध (गट्टे) तक हाथों और पगों को जल से धोवे दो बार मुख को पोंछ कर बारह १२ (नेत्र आदि) अंगों का स्पर्श करे ॥ १८ ॥ स्नान-जलपान-छींक-भोजन-अपवित्र वस्तु का स्पर्श करके इस विधि से सम्यक् प्रकार आचमन करने से ब्रा-