अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ संवर्त्तस्मृतिप्रारम्भः ॥
संवर्त्तमेकमासीनं सर्ववेदांगपारगम् ।
ऋषयस्तमुपागम्य पप्रच्छुर्धर्मकांक्षिणः ॥ १ ॥
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामो द्विजानांधर्मसाधनम् ।
यथावद्धर्ममाचक्ष्व शुभाशुभविचेचनम् ॥ २ ॥
वामदेवाद्यः सर्वे तंपृच्छंतिमहौजसम् ।
तानब्रवीन्मुनीन्सर्वा-न्प्रीतात्माश्रूयतामिति ॥ ३ ॥
स्वभावाद्धिचरेद्यत्र कृष्णसारःसदामृगः ।
धर्म्मदेशःसविज्ञेयो द्विजानांधर्मसाधनम् ॥ ४ ॥
उपनीतोद्विजोनित्यं गुरवेहितमाचरेत् ।
स्रग्गंधमधुमांसानि ब्रह्मचारीविवर्जयेत् ॥ ५ ॥
संध्यांप्रातःसनक्षत्रा-मुपासीतयथाविधि ।
एकाकी बैठे संपूर्ण वेद वेदाङ्गों के पारंगत वाले संवर्त ऋषि के समीप आकर धर्म के अभिलाषी ऋषियों ने पूछा ॥ १॥ हे भगवन् ! द्विजों के धर्मका साधन (हेतु) हम सुना चाहते हैं शुभ अशुभ का जिससे पृथक्कार ज्ञान हो ऐसे यथार्थ धर्म को कहो ॥ २ ॥ ऐसे वामदेवादि ऋषियों ने उन बड़े तेजस्वी संवर्त्त से पूछा उन संपूर्ण मुनियों से प्रसन्न मन होकर यह बोले कि तुम सुनो ॥ ३॥ जिस देश में काला मृग स्वभाव से सदा विचरे उसको ही धर्म का देश जानना चाहिये और वही द्विजों के धर्मका साधक है ॥ ४ ॥ यज्ञोपवीत होने पर द्विज प्रति दिन गुरुके हितका आचरण करै और माला-गंध-सहत-मांस इनको ब्रह्मचारी त्याग दे ॥ ५ ॥ प्रातःकाल की संध्या उस समय विधि से आरम्भ करे जिस समय आकाश में नक्षत्र (तारे) दीखते हों तथा सायंकाल की संध्या का उस समय आरम्भ करे जिस समय सूर्य नारायण आधे अस्त