अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३० पाराशर्यसंहिता ॥
आत्मासंयमितोयेन तंयमःकिंकरिष्यति ॥३ ॥ नतथासिस्तथातीक्ष्णः सर्पोवादुरधिष्ठितः । यथाक्रोधोहिजंतूनां शरीरस्थोविनाशकः ॥ ४ ॥ क्षमागुणोहिजंतूना मिहामुत्रसुखप्रदः । एकःक्षमावतांदोषो द्वितीयोनोपपद्यते ॥ यदेनंक्षमयायुक्त-मशक्तं मन्यतेजनः ॥५॥ नशब्दशास्त्राभिगतस्यमोक्षो, नचैत्ररम्यावसथप्रियस्य । नभोजनाच्छादनतत्परस्य, नलोकचित्तग्रहणेरतस्य ॥६ ॥ एकान्तशीलस्यदृढव्रतस्य, मोक्षोभवेत्प्रीतिनिवर्तकस्य । आध्यात्मयोगैकरतस्यसम्यक्, मोक्षोभवेन्नित्यमहिंसकस्य स्वाध्याययोगागतमानसस्य ॥७॥ क्रोधयुक्तोयद्यजते यज्जुहोतियदर्चति
को ही यम कहते हैं जिस मनुष्य ने अपने को वश में करलिया उस का यम-राज क्या करेगा ? ॥३॥ खड्ग भी ऐसा तीक्ष्ण [ तीखा वा पैना ] नहीं और सर्प भी ऐसा ( विकराल वा भयानक ) नहीं जैसा मनुष्यों के शरीर में क्रोध नाश करने वाला है ॥ ४ ॥ क्षमा जो गुणहै वह मनुष्य को इस लोक और परलोक में सुख देने वाला है। और क्षमा वालों में एक ही दोष है दूसरा नहीं वह यह कि क्षमा वाले पुरुष को मनुष्य असमर्थ मानतेहैं ५ शब्द शास्त्र (व्याकरण) ही पढ़ने पढ़ाने वाले पुरुषका, घर के प्रेमी का तथा भोजन वस्त्रमेंतत्पर हुये का और जो जगत् के मनको वश करनेमें तत्पर हैं उनका मोक्ष नहीं हो सकता ॥६॥ किंतु एकान्त वासी, दृढ़व्रत वाले प्रीति से पृथक् रहने वाले का मोक्ष होताहै । तथा अध्यात्मयोग में तत्पर हुये अहिंसक और स्वाध्याय रूप योग में प्रवृत्त हुये मनवाले का नित्य सम्यक् प्रकार मोक्ष होता है ॥ ७ ॥ क्रोध युक्त मनुष्य जो यज्ञ होम पूजा करता है वह सब उसका इस