अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपस्तम्बस्मृतिः ॥ २९
सायंप्रातस्त्वहोरात्रं पादंकृच्छ्रस्यतंविदुः॥ ४२॥
सायंप्रातस्तथैवैकं दिनद्वयमयाचितम् ।
दिनद्वयंचनाश्नीया-त्कृच्छ्राद्धं तद्विधीयते ॥ ४३॥
प्रायश्चित्तं लघुष्वेव-त्पापेषुतुयथार्हतः ।
कृष्णाजिनतिलग्राही हस्त्यश्वानांचविक्रयी ॥ ४४ ॥
प्रेतनिर्यातकश्चैव नभूयःपुरुषोभवेत् ॥
इत्यापस्तम्बीये नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
आचांतोप्यशुचिस्ताव-द्यावन्नोद्ध्रियतेजलम् ।
उद्धृतेप्यशुचिस्ताव-द्यावद्भू मिर्नलिप्यते ॥१।
भूमावपिचलिप्तायां तावत्स्यादशुचिःपुमान् ।
आसनादुत्थितस्तस्मा-द्यावन्नाक्रमतेमहीम्॥२॥
नयमंयमित्याहु-रात्मावैयमउच्यते ।
त्रिकाल स्नान करने से शुद्ध होता है । एक दिनरात सायंकाल और प्रातःकाल भोजन करे इस को पादकृच्छ्र कहते हैं ॥ ४२ ॥ और एक दिन सायंकाल तथा एक दिन प्रातःकाल खावे और दो दिन बिना मांगे जो मिले उसे भोजन करे तथा दो दिन उपवास करें इसे कृच्छ्रार्द्ध कहते हैं ॥४३ ॥ लघु [छोटे] पापों में यह प्रायश्चित्त उचित है-काली मृगछाला और तिल इन का जो दान ले और हाथी तथा घोड़े को जो बेचे ॥ ४४ ॥ और जो मुर्दों का निर्यातक [ उठाने वाला ] ये जन्मान्तर में पुरुष नहीं होते ॥ ४५ ॥
इत्यापस्तम्बीये नवमोऽध्यायः ॥९॥
आचमन करने पर भी तब तक (मनुष्य) अशुद्ध रहता है जबतक भूमिपर गिरा हुआ अशुद्ध जल न उलीचा जावे और उस जल के उठाने पर भी तब तक अशुद्ध रहता है जब तक वह पृथिवी न लीपी जाय ॥१॥ तथा पृथ्वी के लीपने पर भी तब तक अशुद्ध रहता है जब तक आचमन के आसन से उठ कर उस लीपी हुई पृथ्वी पर न बैठे ॥ २ ॥ यमराज को यम नहीं कहते हैं किन्तु अपने शरीर