अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ भाषार्थसहिता-
तेप्यनावृष्टिमिच्छन्ति महद्वाजायतेभयम् ॥२३॥
ब्राह्मणान्वेदविदुषः सर्वशास्त्रविशारदान् ।
तत्रवर्षतिपर्जन्यो यत्रैतान्पूजयेन्नृपः ॥२४॥
त्रयोलोकास्त्रयोवेदा आश्रमाश्चत्रयोऽग्नयः ।
एतेषांरक्षणार्थाय संसृष्टाब्राह्मणाःपुरा ॥२५॥
उभेसंध्येसमाधाय मौनंकुर्वन्तियेद्विजाः ।
दिव्यवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥२६॥
यएवंकुरुतेराजा गुणदोषपरीक्षणम् ।
यशःस्वर्गनृपत्वंच पुनःकोशंसअर्जयेत् ॥२७॥
दुष्टस्यदण्डःसुजनस्यपूजा न्यायेनकोशस्यचसंप्रवृद्धिः ।
अपक्षपातोर्थिषुराष्ट्ररक्षा पंचैवयज्ञाःकथितानृपाणाम् ॥२८॥
देश भी वृष्टि के अभाव की इच्छा करते हैं अथवा उन में महान् भय उत्पन्न होता है ॥ २३ ॥
भा०-साङ्गोपाङ्ग वेद को जानने वाले और संपूर्ण शास्त्रों में कुशल ब्राह्मणों की पूजा जिस देश में राजा करता है वहां मेघ ठीक २ वर्षता है ॥ २४ ॥ तीनों लोक तीनों वेद आश्रम और तीनों अग्नि इन की रक्षा के लिये सृष्टि के आरम्भ में ब्राह्मण रचे गये हैं ॥ २५॥ जो दोनों सन्ध्याओं के समय एकाग्रचित्त होके मौन हुए जप करते हैं वे द्विज देवताओं के हजार वर्ष तक स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ जो राजा इस प्रकार गुण दोष की परीक्षा करता है वह यश स्वर्ग, राज्य और कोश का ( क्षीण वा नष्ट होने पर भी ) फिर संचय करता है ॥ २७ ॥ ये पांच यज्ञ राजाओं के लिये कहे हैं कि दुष्ट को दण्ड-श्रेष्ठ जन की पूजा, न्याय से कोश का बढ़ाना-मांगने वालों के लिये पक्षपात का न करना. और अपने देश की रक्षा ॥ २८ ॥
( २४ ) विद्वान् ब्राह्मणों का ठीक आदर से सत्कार किया जाय तो वे लोग अग्निहोत्रादि वेदोक्त कर्म ठीक २ करें जिस से देवता लोग प्रसन्न होकर ठीक २ समय पर वर्षा करें इसी रीति से त्रिलोकी की रक्षादि हो सकती है ॥