भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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अत्रिस्मृतिः ॥ ७

यत्प्रजापालनेपुण्यं प्राप्नुवतीहपार्थिवाः ।
नतुक्रतुसहस्रेण प्राप्नुवंतिद्विजोत्तमाः ॥ २९ ॥

अलाभेदेवखातानाम् ह्रदेषुसरसीषुच ।
उद्धृत्यचतुरःपिण्डान् पारक्येस्नानमाचरेत् ॥३०॥

वसाशुक्रमसृङ्‌मज्जा मूत्रंविट्कर्णविण्‍नखाः ।
श्लेष्मास्थिदूपिकास्वेदोद्वादशैतेनृणांमलाः ॥३१॥

षण्णांषण्णांक्रमेणैव शुद्धिरुक्तामनीषिभिः ।
मृद्वारिभिश्चपूर्वेषा-मुत्तरेषांतुवारिणा ॥ ३२ ॥

शौचंमंगलमायास * अनसूयास्पृहादमः ।


भा०-प्रजा के ठीक पालन करने से इस संसार में जिस पुण्यसुख को राजा प्राप्त होते हैं—उस पुण्य को हज़ार यज्ञ करने से भी ब्राह्मण लोग नहीं प्राप्त हो सक्ते ॥ २९ ॥ देवताओं के खोदे तीर्थों (गंगा आदि) के अभाव में दूसरे कुंड अथवा तालाबों में से मिट्टी के चार पिंड (डेले) निकाल कर स्नान करे ॥ ३० ॥ वसा-वीर्य-रुधिर-मज्जा-मूत्र-विष्ठा-कानकामैल-नख, कफ-हाड़-नेत्रों का मल और पसीना ये बारह मनुष्यों के मल हैं ॥ ३१ ॥ विद्वान् लोगों ने पहिले वसादि छः अंगों की शुद्धि मिट्टी और जल से तथा पिछले छः अंगों की शुद्धि केवल जल से क्रमशः वर्णन की है ॥ ३२ ॥ शुद्ध रहना-मंगलकाम-परिश्रम करना-दूसरे के गुणों में दोषों को न देखना-तृष्णालोभ

( २९ ) राजा में यदि १८ प्रकार के दोष न हों और ठीक धर्मानुकूल प्रजा की रक्षा करे तो अवश्य वैसा पुण्य होगा परन्तु ब्राह्मण विरक्त जितेंद्रिय होके योगाभ्यास सहित तप करे तो उसका पुण्य राजा से भी बहुत बड़ा अवश्य होगा ( ३३ ) जैसे अग्नि का लक्षण गर्मी जलका लक्षण शीतलता दीपक का लक्षण प्रकाश द्वारा अन्धकार की निवृत्ति होती है । दीप ज्योति न दीखने पर भी प्रकाश के देखने मात्र से दीपक का होना मानने पड़ता है वैसे उत्तम कक्षा के शौचादि को देख कर जाति से ब्राह्मण होना प्रत्यक्ष न होने पर भी उस को ब्राह्मण ही मानना चाहिये । क्यों कि उक्त गुण असली ब्राह्मण पन को सिद्ध करते हैं ॥ * चिन्त्यमेतत् ।