अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ भाषाथसहिता-
लक्षणानिचविप्रस्य तथादानंदयापिच ॥ ३३ ॥
नगुणान्गुणिनोहन्ति स्तौतिचान्यान्गुणानपि ।
नहसेच्चान्यदोषांश्च सानसूयाप्रकीर्तिता ॥३४॥
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः ।
आचारेष्वव्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते ॥ ३५ ॥
प्रशस्ताचरणंनित्यमप्रशस्तविवर्जनम् ।
एतद्विमंगलंप्रोक्त मृषिभिर्धर्मवादिभिः ॥ ३६ ॥
शरीरंपीड्यतेयेन शुभेनह्यशुभेनवा ।
अत्यन्तंतन्नकुर्वीत अनायासःसउच्यते ॥ ३७ ॥
यथोत्पन्नेनकर्तव्यः संतोषःसर्ववस्तुषु ।
नस्पृहेत्परदारेषु साऽस्पृहापरिकीर्तिता । ३८ ॥
न करना-इन्द्रियों को विषयों से रोकना-दान देना-और दया करना ये ब्राह्मणों के लक्षण हैं इन का विशेष व्याख्यान ग्रन्थकार ने आगे स्वयं किया है॥३३॥
भा०-गुण वाले के उत्तम गुणों को न छिपावे किन्तु अन्य के गुणों की स्तुति करे और अन्य के दोषों की हँसी न करे उसे अनसूया कहते हैं ॥ ३४ ॥ अभक्ष्य वस्तु का त्याग और सज्जनों का संग--और उत्तम आचरणों से न विचलना इसे शौच कहते हैं ॥३५॥ प्रतिदिन उत्तम आचरण का करना और निन्दित आचरण को त्याग देना धर्म को कहने वाले ऋषियों ने इसे मंगल कहा है ॥ ३६ ॥ जिस शुभ वा अशुभ कर्म से शरीर विशेष पीडित हो उस को अधिक न करना उसे अनायास कहते हैं ॥ ३७ ॥ धर्मानुकूल परिश्रम से जो कुछ अन्न धनादि प्राप्त हो उसी में संतोष करना और पराई स्त्रियों में भोग की इच्छा न करना उस को अस्पृहा कहते हैं ॥ ३८ ॥
( ३७ ) शरीर पीड़ा से मतलब यह है कि शरीर को ऐसी बाधा न पहुंचे जिस से नष्ट हो सके अर्थात् अच्छे काम में भी अधिक श्रम न करे । शरीर बना रहा तो इसी जन्म में अधिक पुण्य कर सकेगा । इस से तपादि में भी उतना कष्ट सहे जिस से शरीर को धक्का न लगे । अर्थात् क्रमशः जप तपादि को बढ़ावे ( आत्मानं सततं रक्षेत् ) - अपने जीवन की रक्षा निरन्तर करे ॥