अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअत्रिस्मृतिः ॥
ग्राह्यमाध्यात्मिकंवापि दुःखमुत्पाद्यतेपरैः । नकुप्यतिनचाहन्ति दमइत्यभिधीयते ॥ ३९ ॥ अहन्यहनिदातव्य-मदीनेनान्तरात्मना । स्तोकादपिप्रयत्नेन दानमित्यभिधीयते ॥ ४० ॥ परेस्मिन्बन्धुवर्गेवा मित्रेद्वेष्येरिपौतथा । आत्मवद्वर्त्तितव्यंहि दयैषापरिकीर्तिता ॥ ४१ ॥ यश्चैतैर्लक्षणैर्युक्तो गृहस्थोपिभवेद्द्विजः । सगच्छतिपरंस्थानं जायतेनेहवैपुनः ॥ ४२ ॥ इष्टापूर्तंचकर्त्तव्यं ब्राह्मणेनैवयत्नतः । इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्तंमोक्षोविधीयते ॥ ४३ ॥ अग्निहोत्रंतपःसत्यं वेदानांचैवपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवश्च इष्टमित्यभिधीयते ॥ ४४ ॥ वापीकूपतडागादि देवतायतनानिच । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ॥ ४५ ॥
भा०—अन्य लोग भीतरी वा बाहिरी कैसा ही दुःख पहुंचावें तौभी उन पर न क्रोध करे और न उन को तंग करे इस को दम कहते हैं ॥ ३९ ॥ यदि अपने पास थोड़ा ही निर्वाह मात्र अन्न धनादि हो तौभी उसी में से कुछ प्रसन्न चित्त से नित्य २ किसी को दिया करे इस को दान कहते हैं ॥ ४० ॥ कुटुंबी में—मित्र में द्वेष करने योग्य और शत्रु इन सब में अपने आत्मा के समान जो बर्त्ताव करना है उसे दया कहते हैं ॥ ४१ ॥ जो गृहस्थी भी द्विज इन लक्षणों से युक्त होता है वह उत्तम स्थान ब्रह्मलोक वा मोक्ष को प्राप्त हो जाता है और फिर इस लोक में उत्पन्न नहीं होता ॥ ४२ ॥ इष्ट और पूर्त कर्म के करने में ब्राह्मण ही को यत्न करना उचित है इष्ट से स्वर्ग मिलता है और पूर्त से मोक्ष होता है ॥ ४३ ॥ अग्निहोत्र—तप—सत्यभाषण—वेदों की रक्षा—अतिथि का सत्कार और बलिवैश्वदेव करना इन्हें इष्ट कहते हैं ॥ ४४ ॥ बावड़ी कूप, तालाब—देवताओं के मंदिर बनवाना—अन्न का दान करना आराम (बाग) लगवाना इन्हें पूर्त कहते हैं ॥ ४५ ॥
२